एक कोशिश हिम्मत भरी...

  • 7 मई 2011
Image caption सिटीज़न रिपोर्टर तारा अहलुवालिया

बीबीसी की खास पेशकश सिटीज़न रिपोर्ट के ज़रिए हर हफ्ते हम आपको एक ऐसे आम नागरिक से मिलवाते हैं जिसके बदलाव के जज़्बे और असाधारण कोशिशों ने उसे खास बना दिया है.

सिटीज़न रिपोर्ट की इस कड़ी में पेश है राजस्थान से तारा अहलुवालिया की ये रिपोर्ट.

''मेरा नाम तारा अहलुवालिया है और मेरी लड़ाई है समाज की उस सोच के खिलाफ़ जो लड़कियों से उनके जीने के हक छीन लेती है.

अपनी इस मुहिम की शुरुआत मैंने 2007 में राजस्थान के भीलवाड़ा शहर से की. मैंने देखा कि डॉक्टर्स सोनोग्राफी मशीनों का दुरुपयोग कर रहे हैं और उनकी मदद से किस तरह अजन्मी बच्चियों को मौत के घाट उतारा जा रहा है. ये लोग महिला को उसके गर्भस्थ शिशु का लिंग बता देते हैं और लड़की होने पर महिला गर्भपात करा देती है.

भीलवाड़ा की रहने वाली कुसुम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, वो बताती हैं, ''पहली बार बेटी होने के बाद जब मैं दूसरी बार गर्भवती हुई तो परिवार वालों ने मुझ पर लिंग जांच कराने का दबाव बनाया. मेरे मना करने पर मुझसे कहा गया कि मुझे घर से निकाल दिया जाएगा या मेरे पति की दूसरी शादी कर दी जाएगी. लेकिन मैंने हार नहीं और अपनी बेटी को जन्म दिया.''

अस्पतालों का पर्दाफ़ाश

कुसुम ने तो हिम्मत दिखाई लेकिन गांव-कस्बों में रहने वाली महिलाएं अक्सर परिवार से लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाती हैं.

भारत सरकार ने लिंग जांच पर रोक लगाने के लिए 'पीसीपीएनडीटी एक्ट' बनाया. इस कानून के तहत गर्भ में शिशु के लिंग की जांच करना और कराना दोनों गैर-कानूनी हैं. कानून तो बना लेकिन सरकार इसे कड़ाई से लागू नहीं करा सकी.

अधिकारियों और डॉक्टरों की मिलीभगत से ये काम चोरी-छिपे होने लगा है.

ऐसे में मैंने अपनी कुछ साथिनों के साथ मिलकर इस कानून का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों का पर्दाफ़ाश करने का बीड़ा उठाया.

हमने गर्भवती महिलाओं को बोगस ग्राहक के रुप में उन नर्सिंग होम में भेजा जहां चोरी-छिपे लिंग जांच की जा रही थी.

कई डॉक्टर न सिर्फ जांच के लिए तैयार हो गए बल्कि उन्होंने इसके लिए मोटी रकम भी ली.

'रंगे हाथों पकड़वाया'

हम एक गर्भवती महिला को लेकर भीलवाड़ा के एक नर्सिंग में पहुंचे और डॉक्टर से लिंग जांच करने को कहा. डॉक्टर ने हमसे कहा कि क़ानूनी पेंचीदगियों के चलते पैसे ज़्यादा लगेंगे और दस हज़ार रुपए में वो जांच करने को तैयार हो गई. यहां तक की जांच में बेटी पाए जाने के बाद वह पांच हज़ार रुपए और लेकर गर्भपात के लिए भी तैयार हो गई.

लेकिन हमारी टीम ने बाहर आकर पुलिस से संपर्क किया और डॉक्टर को रंगे हाथों पकड़वाया.

मेरी शिकायत पर भारत सरकार के पीसीपीएनडीटी निदेशक स्वंय भीलवाड़ा आए और ऐसी तीन अस्पतालों को सील कराया.

इसके बावजूद इन अस्पतालों पर कार्रवाई के लिए हमें सरकारी दफ़्तरों और अदालतों के कई चक्कर काटने पड़े. चार साल बाद आखिरकार कोर्ट ने इन अस्पतालों के खिलाफ़ कार्रवाई के आदेश दिए.

भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाली महिलाओं से मेरी अपील है कि वो अपने-अपने इलाकों में एकजुट हों और इस अपराध के खिलाफ़ बोलें. बेटियों को बचाना हमारी ज़रूरत है और इसकी शुरुआत हमारे अपने घर से होनी चाहिए.''

अगर आप भी तारा अहलुवालिया की इस मुहिम से जुड़ना चाहते हैं या आपके पास भी बदलाव की ऐसी ही कोई कहानी है तो आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं parul.agrawal@bbc.co.uk पर.

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