महज़ सरकार ही नहीं है दांव पर

पश्चिमी बंगाल में चुनाव इमेज कॉपीरइट AP

तमिलनाडु, असम, केरल, पुद्दुचेरी से पश्चिम बंगाल के चुनाव कई मामलों में अलग हैं. पश्चिम बंगाल में दुनिया में प्रजातांत्रिक तरीके से चुनी हुई वामपंथियों की सबसे लंबी चलने वाली सरकार है.

यहाँ पर 34 साल से भी ज़्यादा समय से काबिज़ वाम मोर्चा और खास तौर पर प्रमुख दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) महज़ सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं.

पश्चिम बंगाल में सीपीएम की एक पूरी पीढ़ी के नेता अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. राज्य में मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य सहित नेताओं कार्यकर्ताओं का एक बहुत बड़ा तबका है जिसने अपना पूरा या आधे से ज़्यादा जीवन सत्ता में रहते हुए काट दिया है.

बुद्धदेब भट्टाचार्य 33 साल की उम्र में मंत्री बने थे और बीच में एक दो साल छोड़ के लगभग पूरे समय ही वो राज्य सरकार का हिस्सा रहे हैं.

सत्ता पर ख़तरा

वरिष्ठ पत्रकार सैन्य बंधोपाध्याय कहते हैं, "हालात की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वाम मोर्चा में फॉरवर्ड ब्लॉक और सीपीआई जैसे जो घटक दल हैं वो लंबे समय से सबसे बड़े दल सीपीएम के खिलाफ़ बोलते रहे हैं. वो सत्ता पर ख़तरा मंडराता देखकर एक हो गए हैं. लगभग साढ़े तीन दशक में पहली बार गैर वामपंथी पार्टियों और आम लोगों को सत्ता में बदलाव संभव लग रहा है". बंधोपाध्याय मानते हैं कि अगर वामपंथी हारे तो राज्य में सीपीएम जिसके पास अभी अकेले विधानसभा की 294 में से 175 सीटें हैं उसके अंदर एक बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है.

बंधोपाध्याय की मानें तो ऐसी भी संभवना है कि राज्य इकाई केन्द्रीय नेतृत्व की बात को सुनना कम कर एक नए किस्म का वामपंथी मोर्चा बनाए. यह काम पार्टी टूटने के बाद होता है बिना टूटे ये कहा नहीं जा सकता पर बदलाव निश्चित आएगा. कोलकत्ता पुलिस के पूर्व आयुक्त तुषार तालुकदार कहते हैं, "अगर आप आंकड़े उठा कर देखें तो पाएगें कि 90 प्रतिशत वामपंथी कार्यकर्ताओं ने 1977 में सरकार बनने के बाद वामपंथी पार्टियों की सदस्यता ली है. इन लोगों ने केवल सत्ता का मज़ा देखा है. इन लोगों ने ना कोई कष्ट उठाया है न इनकी कभी जवाबदेही रही है." तालुकदार कहते हैं कि सीपीएम के नेता हर चुनाव के पहले शुद्धीकरण की बात करते हैं. इसलिए अब जब बुद्धदेब भट्टाचार्य कहते हैं कि पार्टी में कुछ लोग अहंकारी हो गए हैं और ईमानदार नहीं रहे हैं जिनसे पार्टी निजात पा लेगी तो लोग हँसते हैं.

पक्ष और विपक्ष

तालुकदार कहते हैं कि पिछले कई चुनावों से लोग ये सुनते आ रहे हैं पर कुछ बदलता नहीं. भारतीय पुलिस सेवा का अपना पूरा कार्यकाल पश्चिम बंगाल में बिताने वाले तालुकदार कहते हैं, "अपने पूरे सेवा काल में मैंने राज्य में किसी ग्रामीण या शहरी थाने में किसी आम आदमी को थाने में घुस कर बिनी किसी प्रभावशाली व्यक्ति की मदद के एक एफआईआर दर्ज कराते नहीं देखा". भारत के किसी और राज्य में पूरा समाज इस तरह सत्ताधारी दल के पक्ष में और विपक्ष में नहीं बनता हैं जिस तरह से इस राज्य में.

सड़कों गावों के दादाओं से लेकर राशन की दुकान चलाने वालों, सरकारी नौकरियां करने वालों से लेकर राज्य के अखबार, टीवी चैनल तक सभी या तो वामपंथी समर्थक खेमे में हैं या विरोधी खेमे में. कलकत्ता की सड़कों पर टैक्सी चलने वाले निमाई घोष कहते हैं, "सीपीएम ने भूमिहीनों को ज़मीन दी, ग़रीब को आवाज़ दी, मज़दूर का पैसा हड़पकर कोई भाग नहीं सकता और यहाँ बुद्धो बाबू के ऊपर कोई पैसा खाने का आरोप नहीं लगा सकता. कभी दंगा नहीं होता विकास का काम भी हो ही रहा है. कभी कोई बाहर से आने वाला यहाँ पीटा नहीं जाता. फिर क्या गलत है इस सरकार में बताइए."

निमाई सीपीएम से समबंधित एक टैक्सी एसोसिएशन के सदस्य हैं. तमाम ज़ोर और दबाव से अपनी बात कहने के बाद भी निमाई ये तो मानते हैं कि इतनी कड़ी चुनौती राज्य में वाम मोर्चा को इसके पहले कभी नहीं मिली थी.

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