अयोध्या मामला: हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक

  • 9 मई 2011
बाबरी मस्जिद
Image caption छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई थी

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले में मालिकाना हक़ पर पिछले साल सितंबर में आए इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी भी की है. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को अजीब और चकित करने वाला बताया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के फ़ैसले को लागू करने पर रोक रहेगी और विवादित स्थल पर सात जनवरी 1993 वाली यथास्थिति बहाल रहेगी. यानी विवादित स्थल पर पूजा-अर्चना जारी रहेगी.

लेकिन विवादित स्थल के आसपास अधिग्रहित 67 एकड़ ज़मीन पर पूजा नहीं होगी. अदालत ने ये भी कहा कि किसी भी पार्टी ने ज़मीन के बँटवारे की मांग नहीं की थी, तो हाई कोर्ट ने इसे विभाजित करने का फ़ैसला कैसे किया.

रामलला विराजमान की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए भारतीय जनता पार्टी के नेता और वकील रविशंकर प्रसाद ने कहा, "अदालत ने कई पक्षों की अपील को स्वीकार कर लिया है और अंतरिम आदेश दिया है कि सात जनवरी 1993 की स्थिति बहाल रहेगी."

निर्मोही अखाड़ा, अखिल भारतीय हिंदू महासभा, जमीयत उलेमा ए हिंद और सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में अयोध्या के 'विवादित स्थल' को राम जन्मभूमि मानते हुए इसे तीन हिस्सों में बाँटने का आदेश दिया था.

वकीलों का कहना है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई जुलाई में होगी और ये पूरा मामला निपटने में दो साल से अधिक का समय लग सकता है.

फ़ैसला

हाईकोर्ट ने बहुमत से फ़ैसला किया था कि विवादित भूमि जिसे राम जन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए. वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा.

लेकिन अदालत ने यह भी पाया कि चूंकि कुछ हिस्सों पर, जिसमें सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है, निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा.

अदालत के दो जजों न्यायमूर्ति एसयू ख़ान और न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने यह फ़ैसला भी दिया है कि इस भूमि के कुछ हिस्सों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए ज़मीन का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए.

हालाँकि न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा इस फ़ैसले से सहमत नहीं थे और उन्होंने कहा था कि पूरी ज़मीन हिंदू संगठनों को दे दी जानी चाहिए.

लेकिन वक़्फ़ बोर्ड और जमीयत उलेमा के हिंद का कहना है कि ये फ़ैसला सबूतों पर नहीं आस्था पर आधारित है और इसे ख़ारिज कर देना चाहिए.

दूसरी ओर अखिल भारतीय हिंदू महासभा की मांग है कि हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को ख़ारिज किया जाए, जिसमें एक तिहाई ज़मीन मुसलमानों को देने का फ़ैसला किया गया है.

संबंधित समाचार