भोपाल गैस के फ़ैसले पर फिर से विचार नहीं

भोपाल में यूनियन कार्बाइड का कारखाना
Image caption यूनियन कार्बाइड का कारखाना अभी भी भोपाल में ज़हरीले पदार्थों से साथ खड़ा हुआ है

सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल गैस मामले में फिर से सुनवाई करने से इनकार कर दिया है.

वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में भोपाल गैस त्रासदी मामले में अभियुक्तों के ख़िलाफ़ लगाई गई 'ग़ैर इरादतन हत्या' की कड़ी धारा को बदलकर "लापरवाही से मौत' की धारा कर दिया था.

सीबीआई ने इसी फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी.

सीबीआई की इस क्यूरेटिव पीटिशन यानी उपचारात्मक या सुधारात्मक याचिका को ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीबीआई ने 14 साल पुराने फ़ैसले को लेकर याचिका दायर करने के पर्याप्त कारण नहीं बताए हैं.

पीड़ितों के वकील संजय पारिख के मुताबिक़ अब पीड़ितों के लिए न्याय का एक रास्ता और बचा है. उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 1996 का उसका फ़ैसला अंतिम फ़ैसला नहीं है और पिछले 14 साल में आए नए सुबूतों के साथ पीड़ित निचली अदालत में फ़ैसले पर पुनर्विचार मांग कर सकते हैं."

पिछले साल भोपाल की एक निचली अदालत ने सात अभियुक्तों को दोषी करार देते हुए दो साल की सज़ा सुनाई थी.

उल्लेखनीय है कि दो और तीन दिसंबर, 1984 की दरम्यानी रात को भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से रिसी मिथाइल आइसो साइनेट (मिक) गैस की वजह से हज़ारों लोग मारे गए थे और हज़ारों लोग स्थाई रूप से विकलांग हो गए थे.

गैस पीड़ितों के लिए काम कर रहे लोगों का कहना है कि इसकी वजह से अभी भी विकलांगता हो रही है और मौतें हो रही हैं.

याचिका

'ग़ैर इरादतन हत्या' की धारा के तहत दोषी पाए जाने पर ज़्यादा से ज़्यादा 10 साल की सज़ा का प्रावधान है जबकि 'लापरवाही से मौत' की धारा के तहत दो साल से ज़्यादा सज़ा नहीं दी जा सकती.

Image caption केशब महिन्द्रा सहित दोषी ठहराए गए सभी सात लोगों को फ़िलहाल ज़मानत दे दी गई है

सीबीआई ने 1996 के फैसले के खिलाफ सुधारात्मक याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से सातों अभियुक्तों की सज़ा पर पुनर्विचार करने और उसे आईपीसी की धारा 304 के दूसरे भाग ('ग़ैर इरादतन हत्या') में बदलने की अपील की थी.

सीबीआई ने पिछले साल 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में ये सुधारात्मक याचिका दाखिल की थी.

इसके बाद 3 दिसंबर को रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने गैस पीड़ितों को दिए गए मुआवज़े की राशि बढ़ाने के लिए एक अन्य सुधारात्मक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी.

इसमें मुआवज़े की राशि 750 करोड़ रुपए से 7,700 करोड़ रुपए करने की मांग की गई थी.

इसपर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया की अध्यक्षता वाली पीठ ने अभी अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा है.

न्याय की उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट में मौजूद भोपाल गैस त्रासदी के एक पीड़ित जय प्रकाश ने इस फैसले पर अफसोस जताया.

उन्होंने कहा, "1996 में ही भोपाल गैस पीड़ितों के हमारे संगठन ने निचली अदालत में एक पुनर्विचार याचिका दायर की थी, लेकिन कोर्ट ने बिना सुने ही उसे खारिज कर दिया था."

प्रकाश ने ये भी बताया कि पिछले साल आए फ़ैसले के बाद उन्होंने सीजेएम की अदालत में एक बार फिर याचिका दायर कर सज़ा की धारा बढ़ाए जाने की मांग की थी, लेकिन सीजेएम ने उसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि 1996 के सुप्रीम कोर्ट का फैसल बाध्यकारी है.

लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट के साफ तौर पर इससे इनकार करने के बाद, जय प्रकाश ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अब निचली अदालत नए सबूतों के आधार पर सज़ा बढ़ाने पर विचार करेगी.

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