विधानसभा चुनाव परिणामः विश्लेषण

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चार अप्रैल से 10 मई के बीच, सात दिन, पाँच राज्यों में - जहाँ कुल मिलाकर संसद के दोनों सदनों की 20 प्रतिशत से अधिक सीटें हैं – वहाँ की विधानसभाओं के लिए चुनाव हुए.

इस लंबी चुनाव प्रक्रिया ने सबको – प्रत्याशी, मतदाता और चुनाव में दिलचस्पी रखनेवाले लोग – इसका अंत जानने के लिए बेसब्र कर दिया था. 13 मई को जब मतगणना शुरू हुई, और नतीजे किसी ऐसे खेल की तरह सामने आने लगे जिसमें घटनाएँ बड़ी तेज़ी से बदलती हैं.

विश्लेषकों को परिणामों का विश्लेषण करने में अधिक जुगत नहीं करनी पड़ी क्योंकि उनका संदेश बिल्कुल साफ़ है. पश्चिम बंगाल में वामपंथ का सफ़ाया होना, जो कि उसका गढ़ समझा जाता था, ऐसी नाटकीय घटना थी कि उसके सामने सारे संदेश छिप गए. इसके सामने केरल का संदेश भी छिप गया जहाँ कि चमत्कार होता-होता रह गया और वामपंथी पार्टियाँ पिछले सात विधानसभा चुनावों के उस नियम को लगभग तोड़ते-तोड़ते रह गईं जिसके अनुसार सत्ताविरोधी लहर हमेशा शासन बदल देती है.

पश्चिम बंगाल में अपने 34 वर्षों के निर्बाध शासन के दौरान कई बार ख़ारिज कर दिया गया वाममोर्चा, एक के बाद एक जीत की कहानी लिखने में कामयाब होता रहा था. वह लगभग एक चौथाई सदी तक ज्योति बसु के नेतृत्व में रहने के बाद, बड़ी सुगमता से आगे बढ़ा, और उनके उत्तराधिकारी की अगुआई में दो-दो चुनाव जीता. मगर जब चीज़ें बिखरनी शुरू हुईं, तो बड़ी तेज़ी से हुईं और लगभग प्रलयंकारी सिद्ध हुईं.

अब आगे जब समीक्षा होगी तो वाममोर्चे की अगुआ पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट), ज़रूर सोचेगी कि आख़िर क्या ग़लती हुई. पार्टी के रूप में, सीपीआई-एम पाँच साल के भीतर आसमान से ज़मीन पर आ गिरी है. मई 2006 में, जब इन पाँचों राज्यों में चुनाव हुआ था, वाममोर्चे ने दो में जीत हासिल की थी. तब संसद के निचले सदन लोकसभा में इसके पास 58 सीटें थीं. और केंद्र का यूपीए गठबंधन इसके समर्थन पर निर्भर था.

कमज़ोर वाममोर्चा

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Image caption मतगणना के दिन सीपीआई-एम कार्यालय में पसरा सन्नाटा

आज किसी भी बड़े राज्य में वाममोर्चे का नियंत्रण नहीं है. त्रिपुरा में उसकी सरकार है लेकिन दो लोकसभा सीटों वाले त्रिपुरा का राष्ट्रीय राजनीति में अधिक महत्व नहीं. संसद में वाममोर्चे के प्रतिनिधियों की संख्या घटकर 24 रह गया और यूपीए को भी उसकी कोई ज़रूरत नहीं.

वाममोर्चे ने पश्चिम बंगाल में कृषि क्षेत्र में सुधार करके अपनी बुनियाद निर्मित की जिसमें सबसे महत्वपूर्ण था – भूमि सुधार. मगर ज्योति बासु के शासन के अंतिम वर्षों में ये उपलब्धि अपना प्रभाव खोने लगी थी. पर बावजूद इसके वाममोर्चा विरोधियों के बँटे होने और कमज़ोर होने के कारण सत्ता में बना रहा. तब कांग्रेस को बीजेपी से ख़तरा लग रहा था और उसने वाम दलों को अपना मित्र समझा. ऐसे में राज्य में कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता ममता बनर्जी अलग-थलग पड़ती गईं और अंततः बीजेपी के साथ हो गईं.

विरोधियों की इन्हीं कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाते हुए ज्योति बासु के उत्तराधिकारी बुद्धदेब भट्टाचार्य 2001 में भारी जीत के साथ सत्ता में आए. वे बदलाव के लिए बेसब्र थे और आर्थिक विकास के लिए तीव्र औद्योगीकरण करना चाहते थे. धारा बदलने के ही इस क्रम में उनकी पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को ऐसे बड़े व्यवासायियों के लिए ज़मीन उपलब्ध करवाने के लिए ज़मीन के अधिग्रहण को सफल बनाने में लगा दिया जिनका साथ उन्हें बहुत ज़रूरी लगने लगा था.

मगर 2008 में कांग्रेस की दोहरी भूमिका का अंत हो गया जब वाममोर्चा एक ऐसे मुद्दे पर केंद्र से अलग हो गया जिसे अधिकतर मतदाता समझ नहीं पाए. अब कांग्रेस के पास ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के साथ जाने का रास्ता खुला था जो कि पश्चिम बंगाल में एक बड़ी पार्टी बन चुकी थी.

राज्य में वाममोर्चे की अंतिम हार की भविष्यवाणी 2009 के लोकसभा चुनाव के परिणाम और उसके बाद हुए स्थानीय निकायों के चुनाव से ही हो चुकी थी. और जब निर्णय की घड़ी आई तो ये हार किसी के भी अनुमान से अधिक करारी हार साबित हुई.

केरल के प्रदर्शन से मोर्चे को कुछ राहत मिली है. 1964 में सीपीआई से अलग होकर सीपीआई-एम बनानेवाले अंतिम बचे हुए नेता वी एस अच्युतानंदन की अगुआई वाले लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट को इस चुनाव में सब ख़ारिज कर चुके थे. एलडीएफ़ पिछले पाँच वर्षों में अंदरूनी गुटबाज़ी से जूझता रहा जो मुख्यतः सीपीआई-एम के कारण उपजी थी.

मगर मीडिया में ये बात उभरकर नहीं आई – कि एलडीएफ़ ने एक ऐसा चुस्त प्रशासन दिया है जो इस प्रदेश ने वर्षों से नहीं देखा. और इसके लिए केरल के लोग अच्युतानंदन के नेतृत्व को ज़िम्मेदार मान रहे थे. और सीपीआई-एम नेतृत्व कैसे लोगों की नब्ज़ को नहीं परख पा रहा था इसका एक उदाहरण इस बात से मिलता है कि पार्टी नेतृत्व ने पहले अच्युतानंदन को अलग-थलग करने की कोशिश की और अंततः हारकर उनको दोबारा चुनाव टिकट दिया.

राष्ट्रीय दल

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Image caption तमिलनाडु में जयललिता को डीएमके के ख़िलाफ़ मिली जीत इस बार विशेष है

वैसे ये विडंबना है कि देश की दोनों प्रमुख पार्टियों की इन पाँचों राज्यों में कोई भूमिका नहीं है. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों की गाड़ी पर सवार कांग्रेस को एक में जीत मिली है तो दूसरे में शर्मनाक हार.

तमिलनाडु का फ़ैसला प्रदेश में 1991 से जारी उस रवायत के अनुरूप रहा जिसके तहत दोनों मुख्य राजनीतिक गठबंधन बारी-बारी से सत्ता में आते-जाते रहते हैं. मगर इस बार पलड़े का झुकाव बहुत एकतरफ़ा रहा. हार के कई कारण थे जिनमें एम करूणानिधि का परिवारवाद एक बहुत बड़ा कारण था. 1969 में पहली बार मुख्यमंत्री बननेवाले करूणानिधि ने 87 साल की उम्र में शायद अपना अंतिम चुनाव लड़ा और उन्हें अब शायद उन्हें एक ऐसी अकर्मण्य परिवार की राजनीतिक विरासत छोड़नेवाले नेता के रूप में याद रखा जाएगा जो पद का ग़लत लाभ उठाने के लिए कलह करते रहे.

केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट की आसानी से जीत की आशाएँ ध्वस्त हो गईं और सीटों की संख्या के हिसाब से कांग्रेस का प्रदर्शन अपने सहयोगियों की तुलना में बहुत बुरा रहा है. यूडीएफ़ के छोटे सहयोगी – मुस्लिम लीग और केरल कांग्रेस – का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है और वे सरकार में अधिक हिस्सेदारी की माँग करेंगे. कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार के लिए ये कोई बहुत राहत भरी जीत नहीं कही जा सकती.

एकमात्र असम में कांग्रेस कुछ उपलब्धि का दावा कर सकती है जहाँ उसे दो-तिहाई सीटों पर अभूतपूर्व जीत मिली है. उसके मुख्य विरोधी, बीजेपी और असम गण परिषद, एक समय राज्य में सहयोगी थे. मगर इस बार वे एक-दूसरे का मुक़ाबला कर रहे थे और एक अवैध आप्रवासियों के ऐसे मुद्दे का लाभ उठाना चाह रहे थे जो ज़रूरत से अधिक इस्तेमाल हो चुका है और राजनीतिक रूप से काफ़ी संवेदनशील है.

एक समय में तमिलनाडु, असम और पश्चिम बंगाल में अपने पैर जमाने की क्षमता दिखा चुकी बीजेपी ने इस चुनाव में 800से अधिक सीटों में से कई में चुनाव लड़ा. मगर उनके जीते हुए सीटों की संख्या दो अंकों में नहीं पहुँच पाएगी.2011 का चुनाव एक बार फिर ये दर्शाता है कि बीजेपी एक संकीर्ण भौगोलिक दायरे में ही टिकी रह गई है. कुछ राज्यों में जहाँ उसकी सरकार है, वहाँ उसकी राजनीति का एक अहम हिस्सा - अल्पसंख्यकों के बारे में उसकी सोच – जिससे कि उसे उन राज्यों में लाभ होता है, वही हिस्सा दूसरे राज्यों में उसके संभावित सहयोगियों को उनसे दूर भी रखता है.

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