ये जो पब्लिक है

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वोटर कोई खिलौना नहीं है, इस देश का राजा है. उसे नकदी या उपहारों से खरीदा-बेचा नहीं जा सकता, झूठे वादों से बहलाया-फुसलाया नहीं जा सकता, डरा-धमका कर बंधक नहीं बनाया जा सकता, आसानी से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता.

यह एक सूत्र है जो चार राज्यों के चार अलग-अलग मिजाज वाले जनादेशों को बांधता है.

सरसरी निगाह से देखें तो चार राज्यों के नतीजों का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है. पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चा भले ही हारा हो, लेकिन हार का चरित्र, उसके कारण और दूरगामी परिणाम में कोई संबंध नहीं है.

तमिलनाडु: राजनीति की लय

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Image caption तमिलनाडू में जनता ने रंगीन टीवी लिया, हो सकता है वोट से पहले नोट भी ले लिया हो, लेकिन बूथ में घुसने के बाद वोट उसी को दिया जहां उसकी जमीर ने कहा.

तमिलनाडु की चुनावी राजनीति अपनी अलग ही लय में चलती रही है. सुदूर असम में क्या होता है, इसकी न तो बाकी देश को जानकारी रहती है, न ही देश की बडी घटनाओं से असम का कोई सीधा रिश्ता है.

हर राज्य के चुनाव परिणाम को केंद्र की राजनीति से जोडना अखबारों और चैनलों की मजबूरी भले ही हो, हक़ीक़त में अकसर यह दूर की कौडी ही साबित होती है. लेकिन अलग-अलग राज्य की अपनी-अपनी पदचाप के पीछे कहीं एक लय और ताल गूंजती सुनाई देती है.

इसकी गूंज तमिलनाडु में सबसे बुलंद होकर उभरती है.

सत्ताधारी द्रमुक के नेता मान कर बैठे थे कि गंठबंधन की तिकड़म और खरीद-फरोख़्त से चुनाव 'मैनेज' किया जा सकता है. करुणानिधि का ऊंचा कद, राज्य सरकार का ठीक-ठाक कामकाज और मुफ्त टीवी के दम पर द्रमुक का आत्मविश्वास बुलंदी पर था.

जीत को सुनिश्चित करने के लिए जाति-विशेष की क्षेत्रीय पार्टियों से सांठगांठ हो गयी थी. आखिरी दिनों में वोटर की 'सेटिंग' के इंतजाम भी पुख़्ता थे. अगर आप द्रमुक के नेता से भ'ष्टाचार की बात उठाते, तो उलटे वो आपको पाठ पढाता था कि ऐसे सवाल आप बुद्धिजीवियों को नाहक परेशान करते हैं. गांव की जनता और गरीब को इन ऊंची बातों से कोई मतलब नहीं है.

उसी गंवई और गरीब जनता ने द्रमुक को ठेंगा दिखा दिया.

रंगीन टीवी लिया, हो सकता है वोट से पहले नोट भी ले लिया हो, लेकिन बूथ में घुसने के बाद वोट उसी को दिया जहां उसकी जमीर ने कहा. द्रविड आंदोलन को करुणानिधि खानदान की संपत्ति बनाने के खिलाफ आपत्ति दर्ज की.

उसकी मजबूरी थी कि उसके पास द्रमुक को उसकी कारगुजारियों की सजा देने के लिए विकल्प अन्ना द्रमुक का ही था. भ'ष्टाचार के मामले में जयललिता का दामन भी साफ नहीं है.

भाई-भतीजावाद से भी उन्हें परहेज नहीं है. लेकिन मतदाता ने रोटी को पलट कर सेंकना ही मुनासिब समझा.

असम: जातीय बंदरबांट

असम में काफी समय से सभी पार्टियां जातीय बंदरबांट और भय की राजनीति कर रही थीं. असम गण परिषद ने अहोमिया समुदाय की असुरक्षा को आवाज दी, तो भाजपा राज्य में बंगाली हिंदू की तरफदारी करने उतरी.

उसके बदरुद्दीन अजमल ने बंगाली मुसलमान के अधिकार की ताल ठोंकी. हितेश्वर सैकिया के जमाने से ही कांग'ेस ने तमाम किस्म के छोटे-बडे अल्पसं'यकों के भय की राजनीति करनी शुरू की.

ऐसे में तरुण गोगोई ने एक नये किस्म की राजनीति का जोखिम उठाया.

पिछले पांच साल में उन्होंने किसी जाति विशेष के भय और स्वार्थ की राजनीति करने की बजाय पूरे प्रदेश में राजकाज की बेहतरी और शांति की राजनीति की. केंद्र की मदद से सरकारी योजनाओं में काफी खर्च हुआ और उसका कुछ फल आम व्यक्ति तक भी पहुंचा.

उल्फा से बातचीत शुरू हुई और हिंसा के दौर का खात्मा होता नजर आया. बेशक इस दौरान बडे घोटाले भी हुए और एक स्तर पर तरुण गोगोई ने परोक्ष रूप से असमिया भाषी समुदाय के ज'मों पर मलहम लगाने में खास दिलचस्पी ली.

लेकिन कुल मिलाकर असम के वोटर ने इस सकारात्मक राजनीति पर मोहर लगायी और खुद कांग्रेंस के दावों से भी ज्यादा बहुमत उसे थमा दिया.

केरल: नैतिक विजय

केरल का परिणाम तकनीकी रूप से भले ही कांग्रेस गंठबंधन की विजय हो, लेकिन राजनैतिक ह्ष्टि से इसे वाम मोर्चे और खास तौर पर अच्युतानंदन की नैतिक विजय कहा जाएगा.

दो साल पहले लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पिटने के बाद हर किसी ने वाम मोर्चे की हार को तय मान लिया था. केरल का कांग्रेस नेतृत्व इस मुगालते में था कि जो भी हो जीत तो उसकी झोली में ही पडेगी.

इस पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने चुनाव प्रचार में कांग्रेस को नाकों-चने चबवा दिये. भ्रष्टाचार के सवाल पर संवेदनहीन हो चुके यूडीएफ नेतृत्व के कच्चे चिट्ठे खोल कर कांग्रेस को हार के कगार पर ला खडा किया.

अच्युतानंदन ने ये भी साबित किया कि जिस सरकार ने ठीक-ठाक कामकाज किया हो, उसे उखाडना आसान नहीं है. अगर उनकी अपनी पार्टी अच्युतानंदन के साथ शुरू से खडी होती तो केरल का चुनावी इतिहास चक्र टूट सकता था.

बंगाल का कमाल

बंगाल में गरीब की लाठी बनकर शुरुआत करने वाला वाम मोर्चा उनका माई-बाप बन बैठा था. बेशक वाम मोर्चे के राज ने बटाईदार को सुरक्षा दी और मजदूर को इज्जत दी, लेकिन धीरे-धीरे पार्टी सर्वज्ञानी, सर्वव्यापी और सर्व शक्तिमान हो गयी.

लोकसभा चुनाव की हार से भी पार्टी ने सही सबक नहीं लिया. बेशक पार्टी ने कुछ भ'ष्ट नेताओं और थके-हारे उम्मीदवारों को बदला, लेकिन न तो पार्टी का तंत्र बदला और न ही उसका अहंकार कम हुआ.

बंगाल के मतदाता ने राजसत्ता के इस अहंकार के खिलाफ बटन दबाया. इसलिए नहीं कि उसे ममता बनर्जी से किसी चमत्कार की उम्मीद है, इसलिए भी नहीं कि उसे केवल बुद्‌धदेव भट्टाचार्य के राज से शिकायत है.

सिर्फ इसलिए भी नहीं कि उसे सिंगूर, नंदीग्राम और निताई की घटनाओं पर गुस्सा है. बंगाल का मतदाता एक बार उस अधिकार का प्रयोग करना चाहता था जो देश के बाकी राज्यों के नागरिक हर पांच साल में करते हैं.

अपने भाग्य से खिलवाड कर रहे शासनतंत्र को ध्वस्त कर वह खुद अपना भाग्य विधाता बनना चाहता है. ममता बनर्जी इस आस्था का एक निमित्त मात्र हैं.

ये संभव है कि वोटर की यह आस मृगतृष्णा ही साबित हो. लेकिन माई-बाप के साये तले जीने की बजाय अपनी गलतियों से खुद सीखने की इसी जीत को ही शायद लोकतंत्र कहते हैं.

जब वाम मोर्चा बंगाल की सत्ता पर काबिज हुआ था, उन दिनों एक फिल्मी गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था - ये जो पब्लिक है, वो सब जानती है. चार राज्यों के मतदाताओं ने मानो इस भूले-बिसरे गीत के रिकॉर्ड को झाड-पोंछ कर इस देश के सत्ताधीशों को सुना दिया है.

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