'सू ची, सेन और श्याबाओ अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष के प्रतीक'

एमनेस्टी इंटरनेश्नल की रिपोर्ट जारी
Image caption एमनेस्टी इंटरनेश्नल भारत प्रशासित कश्मीर, ईरान और दूसरे कई देशों में कथित मानवाधिकार हनन की रिपोर्ट भी प्रकाशित करता रहता है.

लंदन स्थित मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेश्नल का कहना है कि दक्षिण एशिया में कई सरकारें अपने आलोचकों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के ख़िलाफ़ विद्वेष से काम कर रहीं हैं.

संगठन का कहना है कि जो इन सरकारों की कार्यशैली के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है या इनकी आलोचना करता है, उसे झूठे मुक़दमों में जेल भेजा जाता है या उन्हें डराया धमकाया जाता है या फिर उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है.

संगठन का मानना है कि ऐसा प्रचलन दक्षिण एशिया के कुछ देशों में आम है.

एमनेस्टी इंटरनेश्नल की रिपोर्ट शुक्रवार को जारी की गई है जिसमे अन्य देशों के अलावा भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और अफ़गानिस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चिंता जताई गई है.

एशिया पैसिफ़िक क्षेत्र की चर्चा करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि बर्मा की आन सान सू ची ,चीन के लू श्याबाओ और भारत के बिनायक सेन अन्याय और तिरस्कार के ख़िलाफ़ संघर्ष का प्रतीक बन गए हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह वह लोग हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है, मगर उस अंतर राष्ट्रीय पहचान से इन्हें कोई लाभ नहीं मिला अलबत्ता इन्हें और इनके परिवार वालों को धमकियों और यातनाओं का सामना करना पड़ा है.

रिपोर्ट में कहा गया है, "देखा जाए तो इनकी विडम्बना हज़ारों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से अलग नहीं है जो एशिया पैसिफ़िक क्षेत्र में सरकारी उत्पीड़न का सामना कर रहें हैं. इन लोगों पर ना तो सुर्ख़ियां लिखने वालों या नीति तय करने वालों नें कभी ध्यान दिया है."

बिनायक सेन

अमनेस्टी का कहना है कि पेशे से डाक्टर, बिनायक सेन नें माओवादियों के ज़रिए की जा रही हिंसा और सरकार के अत्याचारों के ख़िलाफ़ एक साथ आवाज़ उठायी है.

संगठन का मानना है कि सेन के ख़िलाफ़ अभियोग राजनीति से प्रेरित था जिसमे सबूतों का आभाव तो था ही साथ ही साथ वह न्यायसंगत भी नहीं था.

इसी वजह से इसकी निंदा भारत और विदेशों में भी हुई.

वर्ष 2011 की अपनी रिपोर्ट में एमनेस्टी नें कहा,"छत्तीसगढ़ के एक सत्र न्यायलय ने बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सज़ा उसी राजद्रोह के क़ानून के तहत सुनाई जिस क़ानून का इस्तेमाल ब्रितानी साम्राज्य ने महात्मा गांधी के ख़िलाफ़ किया था"

एमनेस्टी ने बिनायक सेन को सज़ा सुनाए जाने की निंदा करते हुए माओवादियों और सरकार के बीच चल रहे संघर्ष की भी निंदा की है.

संगठन का कहना है कि पिछले एक साल में इस संघर्ष के दौरान छत्तीसगढ़, झारखण्ड और उड़ीसा में 350 लोग मारे गए हैं. संगठन का मानना है कि ग़रीबी, भेदभाव और कॉरपोरेट लालच ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी हैं जिससे सुरक्षा बल और हथियारबंद गुटों में संघर्ष चल रहा है. इसमें सबसे ज्यादा नुक़सान आम लोगों का हो रहा है.

संगठन ने उड़ीसा के आदिवासी इलाक़ो में अलमूनियम के खनन पर रोक लगाए जाने के सरकार के फ़ैसले की प्रशंसा की है.

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