घर में बंद दो ज़िंदा लाशें

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अभी दिल्ली के पास नोएडा में मिली दो बहनों की ख़बरें पुरानी नहीं हुई हैं जिन्होंने ख़ुद को अपने घर में क़ैद कर लिया था कि पटना में ऐसे ही भाई-बहन की दारुण कथा सामने आ गई है.

गत 16 मई को जबरन अस्पताल पहुंचाए जाने से पहले सुजाता और बाबू विक्षिप्त और मरणासन्न स्थिति में कई महीनों से पटना के शिवपुरी मोहल्ले में अपने घर में बंद थे.

डॉक्टरों का कहना है कि भाई-बहन दोनों मानसिक रोगी हैं.

इन दोनों को एक सामाजिक संस्था की मदद से बचाया गया है.

एकाकी जीवन

तीन साल पहले पिता गुज़र गए और फिर विक्षिप्त हो चुकी माँ भी घर छोड़कर कहीं चली गईं. इस सदमे के बाद इनके एक भाई और एक बहन ने भी दम तोड़ दिया.

लोगों का कहना है कि इसके बाद परिवार में ज़िंदा बची 32 वर्षीया सुजाता और 35 वर्षीय बाबू का भी मानसिक संतुलन बिगड़ गया.

दोनों भूखे रहकर और घर के खिड़की-दरवाजे बंद कर या तो सोए रहते या कहीं खोए रहते.

सुजाता कभी-कभार घर से निकलती भी तो 'पगली लड़की' की तरह लोगों से उलझते-खीजते हुए बदहवास स्थिति में घर लौट आती.

फिर अँधेरे और सड़ांध भरे अपने कमरे में ख़ुद को क़ैद कर लेती.

इस तरह मौत के काफ़ी क़रीब पहुँच चुके ये दोनों भाई-बहन एक जुझारू समाज सेविका की मदद से अब पटना के अस्पताल में हैं.

डोक्टर इन्हें सिज़ोफ्रेनिया के रोगी बता रहे हैं.

पुरानी पत्रकार

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सुजाता कुछ दिनों तक यहाँ के एक हिंदी दैनिक में पत्रकार के रूप में काम कर चुकी है. लेकिन अब वह ठीक से बोल भी नहीं पाती.

अब वह सिर्फ रह-रह कर चिल्ला उठती है.

उसका भाई बाबू तो नरकंकाल-सा दिखता है.

'प्रयास भारती' नाम की संस्था चला रही समाज-सेविका सुमन लाल ने पुलिस से गुहार लगाई थी कि इन दोनों भाई-बहनों को बचाने में पुलिस और प्रशासन सहयोग करे.

उल्लेखनीय है कि पिछले महीने ही में राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में भी एक घर से दो बहनों के बारे में पता चला था जिन्होंने सात महीनों से ख़ुद को घर के भीतर क़ैद कर रखा था.

इन बहनों को भी एक समाजसेवी संस्था की मदद से निकालकर अस्पताल पहुँचाया गया था जहाँ एक बहन की मौत हो गई थी.

दूसरे का इलाज करके भाई के साथ घर भेज दिया गया है.

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