बर्मा के 'विद्रोही' हुए रिहा

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Image caption बर्मा के ये विद्रोही पिछले 12 साल से भारतीय जेलों में बंद थे

भारत की एक जेल से गुरुवार को बर्मा के वो 31 'विद्रोही' रिहा कर दिए गए हैं जिन्हें 1998 में सेना के एक 'विशेष अभियान' में अंडमान द्वीप पर गिरफ़्तार किया गया था.

जेल से रिहा होते समय इन सभी ने सफ़ेद रंग की टीशर्ट पहनी थी जिस पर बर्मा के संघर्ष से जुड़ा लोगो लगा हुआ था.

भारत ने इन सभी नागरिकों को 12 साल से अधिक समय तक जेल में रखने के बाद रिहा करने का फ़ैसला इसी वर्ष सात अप्रैल को लिया था और इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग को जानकारी दी थी.

सरकार ने इन सभी क़ैदियों को भारत में रहने का परमिट दिया है. ये सभी अगले एक साल तक दिल्ली में रहेंगे जिसके बाद उन्हें उनकी पसंद के किसी तीसरे देश में भेज दिया जाएगा.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग ने क़ैदियों की रिहाई के भारत सरकार के क़दम का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि इसी समूह के जो तीन लोग अभी भी जेल में हैं उन्हें भी जल्दी ही रिहा किया जा सकेगा.

यह मामला काफ़ी पेचीदा है और इसमें आतंकवाद, भारत बर्मा संबंध, अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप और जासूसी के मामले भी शामिल हैं.

ऑपरेशन लीच

मामला नौ फरवरी 1998 का है जब भारतीय सेना के तीनों अंगों ने मिलकर अंडमान के लैंडफॉल द्वीप पर आपरेशन लीच के नाम से एक संयुक्त अभियान किया और 73 लोगों को गिरफ़्तार किया. इस अभियान को ऑपरेशन लीच नाम दिया गया था.

अभियान में छह लोग मारे गए और एक साल के बाद पता चला कि गिरफ्तार 73 में से 37 तो मछुआरे हैं. इन्हें बाद में छोड़ दिया गया.

बाकी बचे 34 लोग जो बर्मा के नागरिक थे. इन पर बांग्लादेश और कॉक्स बाज़ार के ज़रिए भारतीय सीमा में हथियार लाने और उत्तर पूर्व के चरमपंथी संगठनों को हथियार की आपूर्ति करने का आरोप लगाया गया था.

ये आरोप गिरफ़्तारी के छह वर्ष बाद लगाए गए यानी ये सभी छह साल बिना किसी मामले के जेल में रहे.

इन विद्रोहियों ने आगे चलकर भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से उन्हें रिहा करने की अपील की थी और ब्रिटेन के हथियार सौदागर पीटर ब्लीच का उदाहरण दिया था जिन्हें भारत में सिर्फ़ दो साल की सज़ा के बाद छोड़ दिया गया था.

2007 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए इन क़ैदियों को कोलकाता लाने और सुनवाई शुरु करने का आदेश दिया.

सुनवाई शुरु हुई और सेशन कोर्ट में मामले में फ़ैसला 10 जुलाई 2010 को सुनाया गया. फ़ैसले में इन सभी 34 नागरिकों को विदेशी अधिनियम का उल्लंघन करने के आरोप में तीन साल की सज़ा दी गई थी.

पेचीदा मामला

सुनवाई के दौरान कई नई जानकारियां सामने आईं और पता चला कि ये सभी विद्रोही मूलत भारत की खुफ़िया संस्था रॉ को मदद किया करते थे. विद्रोही अपनी गिरफ्तारी के बाद शुरु से ही भारत सरकार पर डबल क्रासिंग का आरोप लगाते रहे थे.

रॉ के पूर्व अधिकारियों ने अख़बारों में लेख लिख कर साबित करने की कोशिश की कि ये विद्रोही मूलत स्वतंत्रता सेनानी हैं और भारत के मददगार भी.

ये सभी विद्रोही नागरिक बर्मा के अराकान प्रांत के अलगाववादी सगंठन नेशनल यूनिटी पार्टी ऑफ अराकान के सदस्य हैं

इन्हीं 34 में से 31 को आज रिहा किया गया है.

सुनवाई के दौरान ही संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग ने इसमें हस्तक्षेप भी किया और 2009 में इन सभी के लिए सर्टिफिकेट जारी कर कहा कि ये 34 लोग अब शरणार्थी आयोग की निगरानी में हैं.

इस वर्ष जनवरी में आयोग ने भारत सरकार से अनुमति लेकर इन सभी लोगों से इंटरव्यू किया और उनके शरणार्थी स्टेटस को और बेहतर किया जा सके.

अप्रैल महीने में जब आयोग ने इन सभी को पूर्ण रुप से शरणार्थी का दर्जा दे दिया तो भारत ने इनको रिहा करने का निर्णय लेते हुए इसकी जानकारी आयोग को दे दी थी.

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