सलवा जुडूम से सबने पल्ला झाड़ा

  • 20 मई 2011
सलवा जुडुम कैंप

छत्तीसगढ़ में हथियारबंद समूह सलवा जुडूम पर ज्यादतियों के इलज़ाम लगते रहे हैं. इन पर आरोप है कि इनको राजनीतिक या यूँ कहें कि प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त था.

ये सशस्त्र जमात है उन लोगों की जो कथित रूप से नक्सलवादियों की हिंसा के पीड़ित थे और इनमें से 20 हज़ार से ज़्यादा लोगों को वर्ष 2005 में विशेष पुलिस अधिकारी यानी एसपीओ के तौर पर भर्ती किया गया था.

इनका काम था पुलिस को माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान में मदद देना और कई जगहों पर ये अपने आप भी अभियान चलाया करते थे. इसके लिए इन्हें अब भी लगभग 3000 रुपए प्रति माह का भत्ता दिया जाता है

आज हैं अलग-थलग, सभी ने हाथ खींचा

लेकिन आज ये लोग अपने आपको अलग-थलग महसूस कर रहे हैं. कारण यह कि जिन लोगों नें इसके गठन या इसको संरक्षण देने का काम किया उन सभी ने अब अपने हाथ खींच लिए हैं.

अब इस समूह को इसके अपने भाग्य के सहारे छोड़ दिया गया है. विवादों में घिरे रहे सलवा जुडूम पर समाज के कई तबकों में अब भी बहस छिड़ी हुई है.

कुछ इसके औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं तो प्रमुख राजनितिक दल अब इससे अपना पल्ला झाड़ रहे हैं.

नक्सलियों से कथित तौर पर सताए हुए इन लोगों के पुनर्वास के लिए इन्हें बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों के राहत शिविरों में रखा गया है.

ये कैंप प्रमुख रूप से इन्जावरम, मराईगुडा, एर्राबोर, पोल्लमपल्ली, जगरगुंडा, और कांकेरलंका में स्थित हैं.

इनमें से ज़्यादातर आदिवासी माओवादियों के डर से अपने गावों को छोड़कर इन शिविरों में आकर रहने लगे थे. पहले सरकार इन शिविरों में रहने वालों को मुफ़्त अनाज उपलब्ध कराया करती थी. अब परिस्थितियां बदल गई हैं और इन शिविरों में रहने वालों को अपने लिए खाद्य सामग्री ख़ुद खरीदनी पड़ती है.

कोरसा सन्नु की कहानी

Image caption सलवा जुडुम के नेता कोरसा सन्नु कहते हैं अब दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

दंतेवाड़ा के कोंटा ब्लाक में स्थित सलवा जुडूम का एक ऐसा ही राहत शिविर है जहाँ अधिकतर झोपड़ियों में ताले लटके हुए हैं.

सलवा जुडूम के नेता कोरसा सन्नू का कहना है कि यहाँ के बाशिंदे जंगलों में महुआ और तेंदू पत्ता तोड़ने गए हुए हैं.

वो कहते हैं, "अब तो परिस्थितियां बदल गई हैं. अब दो वक़्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. पहले सरकार चावल देती थी. अब खरीदना पड़ रहा है. खरीदने के लिए पैसे चाहिए और पैसों के लिए काम चाहिए. ना पैसे हैं ना काम. इसलिए सलवा जुडूम के कैम्पों में रहने वालों को मज़दूरी का सहारा लेना पड़ रहा है."

वहीं सलवा जुडूम के दूसरे कैंप में रहने वाले लक्ष्मी नारायण का कहना है कि सरकारी उदासीनता के कारण सलवा जुडूम के शिविरों में रहने वाले 70 प्रतिशत लोग या तो अपने गांव वापस चले गए हैं या फिर उन्होंने नक्सलियों से समझौता कर लिया है और उनके साथ शामिल हो गए हैं.

इसी कैंप में रह रहे एक बाशिंदे, जो नाम देने से घबराते हैं, कहते हैं, "सलवा जुडूम जब शुरू हुआ था तो हमें लग रहा था कि एक दिन नक्सली समस्या का हल निकल आएगा और हम अपने गाँव में वापस जाकर रहने लगेंगे. मगर ऐसा हुआ नहीं. नक्सली और मज़बूत हो गए हैं. अब हमारे पास कोई चारा नहीं है."

कोरसा सन्नू अपने गाँव के सरपंच थे. मगर अचानक एक दिन उन्हें माओवादियों का फरमान मिला कि वह इलाका छोड़ दें. सलवा जुडूम के शुरू होने से पहले ही वह भाग कर कोंटा आ गए और कई सालों तक यहाँ रहने लगे.

बाद में जब सलवा जुडूम शुरु हुआ तो वह इसमें शामिल हो गए. आज उनकी दुविधा है कि वह जाएँ तो जाए कहाँ.

आपराधिक मामले

मगर सलवा जुडूम का एक बड़ा पहलु रहा है उसके द्वारा की गई कथित ज्यादतियों के आरोप. इन कार्यकर्ताओं पर आरोप है कि वह सडकों पर आने जाने वाले मालवाहकों से सामग्री लूट लेते हैं. लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और वहां काम कर रहे ठेकेदारों से पैसे वसूलते हैं.

कहा जा रहा है कि इनमें से कई सलवा जुडूम के ऐसे कार्यकर्ता भी हैं जिनपर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं.

वैसे तो ये कार्यकर्ता पुलिस और अदालत के रिकार्ड में फ़रार घोषित किए जा चुके हैं मगर वह शान के साथ इस इलाके में घूमते फिरते हैं.

कुछ तो शान के साथ पुलिस के बैरकों में रह रहे हैं और सरकारी रिकार्ड के हिसाब से अपनी ड्यूटी भी कर रहे हैं. तनख्वाह भी ले रहे हैं. सरकार उनसे अपना पल्ला झाड देती है मगर वो हथियार लेकर घूमते हैं.

उदहारण के तौर पर कर्तम सूर्या और किच्चे नंदा नामक सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं पर बलात्कार जैसे गंभीर आपराधिक मामले भी चल रहे हैं.

दंतेवाड़ा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत नें इन दोनों के ही खिलाफ स्थायी गिरफ़्तारी का वारंट जारी किया हुआ है.

पुलिस नें अदालत को बताया है कि यह दोनों ही लोग फ़रार हैं और इनका कोई सुराग नहीं है. यही वजह है कि अदालत को इनके खिलाफ़ स्थायी गिरफ़्तारी का वारंट जारी करना पड़ा. यह हाल की बात नहीं है बल्कि यह वारंट 2009 से ही जारी किया गया है.

चिंतलनार की घटना

चिंतलनार में सुरक्षा बलों द्वारा कथित तौर पर की गई आगज़नी, महिलाओं से दुर्व्यवहार और कुछ ग्रामीणों को सोच-समझकर मारने के आरोपों के बाद जब सरकारी अधिकारी राहत लेकर ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिमापुरम जा रहे थे तो उस काफ़िले पर ना केवल हमला किया बल्कि राहत सामग्री लूट ली गई.

राहत लेकर जा रहे सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश और आर्ट आफ़ लिविंग के आचार्य मिलिंद के काफ़िले पर भी हमला किया गया और वह भी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डीएस मरावी की मौजूदगी में.

हाल ही में 13 सामजिक कार्यकर्ताओं के एक दल नें पीड़ित गावों का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट में तिमापुरम गाँव के आदिवासियों के हवाले से लिखा है कि उन्होंने केचे नंदा और कर्तम सूर्य की अगवाई में सैकड़ों सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं को कथित रूप से अपने घर जलाते हुए और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करते हुए देखा है.

सरकार कहती है कि सलवा जुडूम से उसका अब कोई नाता नहीं रहा है. यह बयान छत्तीसगढ़ की सरकार नें सुप्रीम कोर्ट में दिया है.

संस्थापक महेंद्र कर्मा भी दरकिनार

सरकार का यह भी कहना था कि सलवा जुडूम अब ख़त्म हो चूका है. वहीं इस आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे कांग्रेस के नेता महेंद्र कर्म को भी उनकी पार्टी ने दरकिनार कर दिया है.

पिछले विधान सभा के चुनाव के बाद वह सदन में विपक्ष के नेता थे. मगर इस बार उन्हें पार्टी नें बस्तर लोकसभा के उपचुनाव में टिकट तक नहीं दिया. कांग्रेस और भाजपा नें अब इस आंदोलन से अपना पल्ला झाड़ लिया है.

अत्याचारों के आरोपों के बाबत पूछे जाने पर सलवा जुडूम के नेता दुलाल साहा की दलील है कि एक जांच समिति बना ली जाए.

उनसे पूछा गया कि सलवा जुडूम के लोगों पर आरोप लगते रहे हैं कि वह बंदूकें लेकर आतंक फैलाते हैं.

जवाब में साहा कहते हैं, "यह बातें माओवादियों ने फैलाई हैं. माओवादी इस इलाक़े में लूटपाट करते हैं. यहां तक कि सुरक्षाबलों के लिए ले जाई जा रही सामग्री को भी लूट लेते हैं. हम पर आरोप बेबुनियाद हैं. हम में से केवल गिने चुने लोगों के पास ही हथियार हैं."

सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जंगली इलाकों में जब आदिवासियों को नक्सली मारते हैं तो उसकी रिपोर्ट थाने तक में दर्ज नहीं की जाती है.

कोरसा सन्नू का कहना है, "नक्सली जब मारे जाते है तो खूब हाय तौबा मचती है. मगर जब सुदूर जंगली और ग्रामीण आँचल में नक्सली निर्दोष लोगों को मारते हैं तो उसकी कोई रिपोर्ट भी थाने में दर्ज नहीं होती. कई दिनों तक लाश ऐसे ही पड़ी रहती है."

सलवा जुडूम के लोगों को मलाल है कि जब उन पर नक्सलियों के हमले हुए हैं तो किसी भी सामजिक संगठन नें आगे आकर उसकी निंदा नहीं की है.

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