टूट सकता है महात्मा गांधी सेतु

पुल
Image caption गंगा नदी पर बना यह पुल पटना को वैशाली ज़िले से जोड़ता है..

पटना के पास गंगा नदी पर लगभग तीन दशक पहले बना यह साढ़े पांच किलोमीटर लम्बा सड़क-पुल टूट कर गिर जाने की स्थिति में पहुँच गया है.

अरबों रूपए की लागत पर निर्माण के नौ साल बाद से ही इसे मरम्मत की सख्त ज़रुरत पड़ने लगी थी. फिर मरम्मत के नाम पर करोड़ों रूपए ख़र्च दिखा दिए गए लेकिन पुल की हालत और बिगड़ती गई.

'महात्मा गाँधी सेतु' के नाम के साथ इसका उदघाटन मार्च 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने किया था.

उस समय इसे एशिया का सबसे लम्बा सड़क-पुल बताया गया था. इंदिरा जी ने कहा था कि यह महासेतु ना सिर्फ उत्तर और दक्षिण बिहार के बीच आवागमन की जीवन-रेखा बनेगा, बल्कि देश के आर्थिक विकास में भी बड़ी भूमिका निभाएगा.

वही पुल आज सिर्फ 29 साल की उम्र में चरमरा कर टूटने जैसी हालत में ' त्राहि माम' कर रहा है.

बिहार सरकार कहती है कि इसमें उसका कोई क़सूर नहीं क्योंकि भारत सरकार ने अपने विभाग के इस पुल को बचाने के लिए राज्य सरकार द्वारा लगाई जा रही गुहार अनसुनी कर दी है.

आरोप प्रत्यारोप

राज्य के पथ निर्माण मंत्री नन्द किशोर यादव ने बीबीसी से कहा, '' गंगा सेतु की ऐसी दुर्दशा इसलिए हुई क्योंकि केंद्र ने इसकी पूरी मरम्मत के लिए ज़रूरी एकमुश्त रक़म ना देकर टुकड़े-टुकड़े में राशि दी. अब पुल के पूरे उपरी ढांचे यानी ' सुपर स्ट्रक्चर ' को बदलने के लिए 167 करोड़ रूपए का जो विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट भेजी गई है, वो मंजूरी के लिए केंद्र के पास लंबित है.इस पर बातचीत केलिए केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री मुझे समय भी नहीं दे रहे हैं.''

उधर केंद्र सरकार का कहना है कि इस पुल की क़िस्तों में ही मरम्मत के लिए राज्य सरकार ने जो राशि मांगी, उनमें वर्ष 2010 तक कुल मिलाकर 122 करोड़ की मंजूरी मिल भी गई.

Image caption इस पुल पर छिटपुट मरम्मत का काम वर्षों से चल रहा है लेकिन पूरी मरम्मत नहीं होती है.

बिहार कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता प्रेमचंद मिश्र कहते हैं, ''इस मामले में राज्य सरकार अपनी विफलता और मरम्मत में भ्रष्टाचार को छिपाकर सारा दोष केंद्र पर मढने की ओछी राजनीति कर रही है. पहले केंद्र से पुल की मरम्मत के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) नहीं मिलने का बेमतलब बहाना बनाया गया और अब एकमुश्त राशि नहीं मिलने की बात कही जा रही है.''

एक-दूसरे पर दोषारोपण के इसी चक्कर में दो लेन वाले इस महासेतु के सिर्फ एक ही लेन पर यातायात जारी है और दूसरे लेन को लम्बे समय से बंद रखा हुआ है.

पुल के स्पैन ज्वाइंट(जोड़) कई जगहों पर टूट कर लटक रहे हैं और ' हिन्ज बेयरिंग्स ' की ख़राबी ने पुल में कहीं-कहीं दो से ढाई फ़ीट की दरारें पैदा कर दी हैं. ये टूटे हिस्से बड़े खौफ़नाक लगते हैं.

पुल से गुज़रते हुए मेरी मुलाक़ात वहाँ तैनात एक सरकारी कर्मचारी से हुई. नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर उन्होंने मरम्मत के नाम पर राशि की कथित लूट और भ्रष्टाचार के कई चौंकाने वाले हालात बयान किए.

मसलन उन्होंने कहा कि ठेकेदार-इंजीनियर-अफ़सर की मिलीभगत से पुल को दुरुस्त करने का नहीं, बल्कि भारी टूट-फूट दिखाकर ज़्यादा-से-ज़्यादा राशि हड़पने का खेल हुआ.

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इस बातचीत में हो सकता है क़ि कुछ बातें अतिरंजित हों, लेकिन जो हालात वहाँ दिख रहे हैं, उनसे ये समझना क़तई मुश्किल नहीं है क़ि करोड़ों रूपए ख़र्च होने जैसी मरम्मत पर सवाल क्यों उठ रहे हैं.

पैदल पुल पार करते हुए एक स्थानीय नागिक ने मुझ से कहा,''पुल पर मरम्मत का नाटक पिछले पंद्रह वर्षों से चल रहा है, और मुझे अभी भी समझ में नहीं आ रहा क़ि पुल को सुधारा जा रहा है क़ि और बिगाड़ा जा रहा है. इतने बड़े मसले पर केंद्र और राज्य की सरकारें एक-दूसरे पर दोषारोपण में लगी हुई हैं और बीच में पिस रही है जनता.''

इस पुल पर खड़ा हुआ या वहाँ से गुजरने वाला आदमी उस समय बिलकुल भयभीत हो जाता है, जब वहाँ भारी वाहनों की धमक से पुल का ऊपरी हिस्सा भूकंप जैसा थरथराने लगता है.

टू-लेन यानी दो-मार्ग वाले इस पुल का एक मार्ग इस तरह क्षत-विक्षत पड़ा है क़ि लगता है पांच किलोमीटर लम्बा कोई महामानव पक्षाघात से पीड़ित हो कर नीचे बह रही गंगा में जलसमाधि लेने का इंतज़ार कर रहा है.

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