प्रशांत भूषण ने रामदेव पर उठाए सवाल

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Image caption प्रशांत भूषण न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहें हैं.

लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए गठित समिति के सदस्य प्रशांत भूषण ने बाबा रामदेव की आलोचना की है.

रामदेव ने कहा था कि प्रस्तावित विधेयक से प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के पद को बाहर रखा जाना चाहिए.

ग़ौरतलब है कि सोमवार को लोकपाल समिति की बैठक में सरकार के प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के बीच भारी मतभेद उभर आए थे.

मतभेद का एक बड़ा कारण यही था कि क्या प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री और उच्च न्यायाधीशों को भी होना चाहिए या नहीं.

सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी जबकि नागरिक समाज के प्रतिनिधि इसे शामिल किए जाने की मांग कर रहे थे.

मंगलवार को मध्यप्रदेश के सिहोर में आवासीय शारीरिक शिक्षा संस्थान के विशाल मैदान में लोगों को योगासनों का अभ्यास कराने के बाद संवाददाताओं से बातचीत में रामदेव ने कहा,''देश के प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश का पद गरिमापूर्ण पद है और इसे प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के दायरे से मुक्त रखा जाना चाहिए.''

सवाल

उनके इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि रामदेव इस बारे में क्या तर्क दे रहें हैं.

बीबीसी से बातचीत में प्रशांत भूषण ने कहा, ''क्या वह(रामदेव) ये कह रहें हैं कि प्रधानमंत्री और न्यायाधीशों को भ्रष्टाचार की खुली छूट होनी चाहिए. और अगर वो यह कह रहे हैं तो फिर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन का क्या फ़ायदा?''

प्रशांत ने आगे कहा कि बाबा रामदेव से पूछा जाना चाहिए कि आख़िर प्रधानमंत्री और उच्च न्यायाधीशों की जाँच कौन करेगा.

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप की जांच वही एजेंसी करेगी जो प्रधानमंत्री के अंतर्गत काम करती है और क्या न्यायाधीश ही न्यायाधीशों के ख़िलाफ़ जांच करेंगे.

आत्मनियंत्रण क़ारगर नहीं

प्रशांत भूषण ने कहा कि संस्थाओं के आत्मनियंत्रण की जो बात कही जा रही है वह सही नहीं है.

उनका कहना था कि सदन ही सांसदों को सज़ा दे सकती है, प्रधानमंत्री के तहत करने वाली संस्था उनके ख़िलाफ़ आरोपों की जांच करे या फिर केवल जज ही दूसरे जज की जांच कर सकते हैं, इस तरह की बाते करना अपने आप में विरोधाभास हैं.

उनके कहा कि अनुभव बताते हैं कि इस तरह के प्रयास नाकाम रहें हैं.

उन्होंने बार काउंसिल और मेडिकल काउंसिल की मिसाल देते हुए कहा कि आत्म नियंत्रण से भ्रष्टाचार में कमी नहीं आई है.

उन्होंने कहा कि इस तरह की बात करके दिखावा करने की कोई ज़रूरत नहीं है.

प्रशांत भूषण ने कहा कि इससे अच्छा तो है कि आप साफ़-साफ़ बोल दें कि प्रधानमंत्री और उच्च न्यायाधीशों को भ्रष्टाचार की खुली छूट होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि झारखंड मुक्ति मोर्चा घूस मामले में तो सुप्रीम कोर्ट ने कह ही दिया था कि सदन के अंदर सांसदों को घूस लेकर ही सही लेकिन कुछ भी करने की खुली आज़ादी है.

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