लोकपाल पर मतभेद क़ायम, अब दो मसौदे बनेंगे

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Image caption समिति के सदस्यों के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता रहा है

नागरिक समाज के सदस्यों और सरकार के सदस्यों के बीच हुई बैठक में लोकपाल विधेयक पर कोई सहमति नहीं बन सकी है.

बैठक के बाद सरकार की ओर से और नागरिक समाज के सदस्यों की ओर से ये स्वीकार किया गया कि अहम मुद्दों पर कोई सहमति नहीं बन पाई है.

हालांकि इस पर 20 जून को और बैठक होगी और ज़रुरत हुई तो 21 जून को भी लेकिन अब दोनों ने अलग-अलग कह दिया है कि विधेयक के दो अलग-अलग मसौदे तैयार होंगे.

एक मसौदा सरकार की ओर से दिया जाएगा और दूसरा नागरिक समाज की ओर से और दोनों को ही मंत्रिमंडल के सामने पेश कर दिया जाएगा और मंत्रिमंडल ही इस पर अंतिम फ़ैसला लेगा.

बुधवार को हुई बैठक के बाद भी नागरिक समाज की ओर से सरकार के रवैये पर हमला जारी रहा और इसके एक सदस्य अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार मुद्दों पर पहले से ही मन बनाकर बैठी हुई है.

इस बैठक से पहले दोनों ही ओर से एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला चलता रहा है.

असहमति

सरकार के प्रतिनिधि के रुप में केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने पत्रकारों को बताया कि 'लोकपाल विधेयक के अहम मुद्दों पर आम सहमति नहीं बन सकी है.'

उनका कहना था, "नागरिक समाज के सदस्यों से कहा गया है कि वे 20 जून को होने वाली बैठक में जनलोकपाल बिल का अपना मसौदा तैयार करके ले आएं. इस पर उस दिन चर्चा होगी और ज़रुरत हुई तो 21 जून को भी."

उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि इस मसौदे पर कोई सहमति नहीं बनी तो केंद्रीय मंत्रिमंडल को लोकपाल विधेयक के दो मसौदे भेज दिए जाएँगे जिसमें असहमति के मुद्दों को स्पष्ट कर दिया जाएगा.

बाद में नागरिक समाज की ओर से अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण दोनों ने इसकी पुष्टि की और कहा कि अब सरकार के पास लोकपाल विधेयक के दो मसौदे जाएँगे.

उन्होंने बताया कि बैठक में दो विषयों पर चर्चा हुई. एक तो यह कि लोकपाल के पास आने वाले मामलों का फ़ैसला कौन लेगा और दूसरा कि सरकारी अधिकारियों पर मामला किस तरह चलेगा.

उनका कहना था कि सरकार के प्रतिनिधि चाहते हैं कि सारे फ़ैसले लोकपाल के 11 सदस्यीय सदस्य ही करें और इसके अलावा उसके पास अपना कोई ढाँचा नहीं होगा नागरिक समाज का कहना है कि लोकपाल के पास अपनी एक अलग जाँच और सतर्कता की टीम होनी चाहिए जो सारे मामले की ख़ुद जाँच कर सके.

इस पर कोई सहमति नहीं बन सकी.

इसी तरह सरकारी अधिकारियों पर कार्रवाई के बारे में नागरिक समाज के सदस्यों का कहना था कि किसी भी सरकारी अधिकारी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार का मामला आने के बाद उस पर विभागीय कार्रवाई और सीबीआई की जाँच अलग-अलग न हो और ये जाँच सिर्फ़ लोकपाल करे.

उनका कहना था, "विभागीय जाँच अलग से होती है जो ये फ़ैसला करती है कि नौकरी रहनी चाहिए या जानी चाहिए और आख़िर में विभाग के लोग अपने भाई बंधुओं को बचा ले जाते हैं और इसके बाद सीबीआई का मामला भी अदालत में नहीं टिकता. इसलिए सारी जाँच लोकपाल को ही करनी चाहिए. लेकिन सरकार इसके लिए राज़ी नहीं है."

आरोप

बैठक के बाद नागरिक समाज के एक सदस्य प्रशांत भूषण ने कहा, "आज की बैठक से ये साफ़ हो गया है कि लोकपाल की हमारी अवधारणा और लोकपाल की सरकार की अवधारणा में मूलभूत अंतर है."

अरविंद केजरीवाल ने बार फिर सरकार के प्रतिनिधियों पर सीधा हमला किया.

उन्होंने कहा, "ऐसा लगता है कि सरकार मुद्दों पर पहले से ही मन बनाकर बैठी हुई है उस पर चर्चा नहीं हो रही है वो अपने निर्णय सुनाते जा रहे हैं."

केजरीवाल ने कहा, "उनकी ओर से कोई तर्क नहीं आ रहे हैं, हम तर्क पर तर्क देते जा रहे हैं और वो निर्णय सुना रहे हैं."

उनका कहना था कि बातचीत केवल औपचारिकता मात्र रह गई है और सरकार सारे मुद्दों पर पहले से ही मन बनाकर बैठी हुई है.

सरकारी प्रतिनिधियों के रवैये से नाराज़ नागरिक समाज के सदस्यों ने समिति की पिछली बैठक का बहिष्कार कर दिया था.

बुधवार को जिन दो मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी है वे अपेक्षाकृत छोटे मुद्दे हैं क्योंकि समिति के सामने लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को रखने नहीं रखने और मुख्य न्यायाधीश के ऊपर लोकपाल के अधिकारों जैसे मुद्दे भी हैं.

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