लोकपाल का मसौदा 30 जून तक

  • 16 जून 2011
चिदंबरम और सिब्बल इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption मंत्रियों ने नागरिक समाज के सदस्यों के कई आरोपों के जवाब दिए हैं

नागरिक समाज की ओर से सरकार पर मुकरने और भ्रष्टाचार से निपटने की इच्छा न होने का आरोप लगाए जाने के बाद सरकार के प्रतिनिधियों ने कहा है कि जो आरोप लगाए जा रहे हैं वो सही नहीं हैं.

केंद्रीय मंत्रियों पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल और सलमान ख़ुर्शीद ने कहा है वे चाहते हैं कि नागरिक समाज के प्रतिनिधि लोकपाल विधेयक के मसौदे पर चर्चा करें लेकिन अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो भी 30 जून तक लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार कर लिया जाएगा.

दो अलग-अलग मसौदों की बात पर सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि ये दो अलग मसौदों की बात नहीं है बल्कि जिन बिंदुओं पर सहमति नहीं बनी उन पर दो अलग-अलग विकल्प देने की बात है.

जैसा कि कपिल सिब्बल ने कहा, 'इस पर जनलोकपाल बिल के प्रतिनिधि सहमत भी थे.'

'सबसे अच्छा लोकपाल'

सरकार के प्रतिनिधि के रुप में समिति में शामिल पी चिदंबरम ने एक सवाल के जवाब में कहा कि नागरिक समाज के सदस्यों को समिति में शामिल करने का जो निर्णय लिया गया अब उस पर विचार नहीं किया जा सकता और सरकार उस निर्णय का आदर करती है.

उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि अब नागरिक समाज के सदस्य बैठक में शामिल हों और मिलकर मसौदा तैयार करें लेकिन अगर वे ऐसा नहीं करते तो भी हम 30 जून तक मसौदा तैयार कर देंगे."

कपिल सिब्बल ने एक सवाल के जवाब में कहा कि नागरिक समाज के प्रतिनिधि चाहे मंत्रियों के बारे में जो कहें लेकिन उनसे कोई कटुता नहीं है.

एक और मंत्री सलमान ख़ुर्शीद ने कहा कि लोकपाल पर जो मसौदा तैयार हो रहा है उसके आधार पर कहा जाता है कि दुनिया में कहीं भी लोकपाल का इससे अच्छा प्रावधान नहीं है.

उन्होंने पारदर्शिता का भरोसा दिलाते हुए कहा कि वे कह सकते हैं कि जिस दिन लोकपाल विधेयक पेश होगा उस दिन दुनिया भी इसकी तारीफ़ करेगी.

उन्होंने कहा कि सूचना के अधिकार के बाद ये यूपीए सरकार की ओर से पारदर्शिता का एक और उदाहरण होगा.

जवाब

कपिल सिब्बल ने नागरिक समाज के सदस्यों से पूछा कि वे कह रहे हैं कि सरकार मुकर गई तो सरकार आख़िर किस बात पर मुकर गई है?

उन्होंने इन आरोपों का भी खंडन किया कि बैठक में मंत्री चर्चा नहीं करते सिर्फ़ फ़ैसले सुनाते हैं. उन्होंने कहा कि बैठक के मिनट्स में सब कुछ दर्ज है और उससे साफ़ होता है कि बैठक में चर्चा हो रही है.

उन्होंने कहा कि कई मुद्दों पर असहमति है और वो इसलिए है कि लोकपाल के अधिकार को लेकर नागरिक समाज की जो मांगें हैं उन्हें व्यावहारिक रुप से अमल में नहीं लाया जा सकता.

उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, "नागरिक समाज चाहता है कि केंद्र और राज्य सरकार के सभी कर्मचारी लोकपाल के दायरे में आ जाएं. देश में केंद्र के 40 लाख कर्मचारी हैं और राज्य के कर्मचारी मिलाकर इनकी संख्या एक करोड़ 20 लाख हो जाएगी. ऐसे में उन्हें लोकपाल के दायरे में लाने के लिए आवश्यक ढाँचा कहाँ से आएगा."

उन्होंने कहा कि इसके लिए संविधान में व्यापक संशोधन भी करने होंगे.

सरकार के प्रतिनिधियों पर लगाए गए आरोपों के बारे में उन्होंने कहा, "अगर हम किसी बात पर असमहत हों तो भ्रष्ट हैं और हमारी मंशा भ्रष्टाचार से लड़ने की नहीं है, ये कौन सी बात हुई भला?"

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने न लाने के सवाल पर पी चिदंबरम ने कहा कि ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री को इसके दायरे में नहीं लाने की बात है लेकिन उसकी कई सूरतें हैं. जिस पर राजनीतिक दलों से चर्चा की जाएगी.

न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से दूर रखने को लेकर कपिल सिब्बल ने कहा कि इसमें कई व्यावहारिक दिक़्कतें हैं.

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