कुछ मतभेद बरक़रार लेकिन दोनों पक्षों के सुर बदले

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लोकपाल विधेयक के मसौदे को लेकर केंद्र सरकार और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के बीच चल रही बैठक खत्म हो गई है. असहमतियां अभी भी बनी हुई हैं लेकिन दोनों ओर के सुरों में कटुता कम हुई है.

सरकार को 30 जून तक इस विधेयक का मसौदा तैयार करना है. लोकपाल ड्राफ्ट बिल पर सरकार के रुख़ पर चर्चा करने के लिए रविवार को मंत्रियों की अहम बैठक हुई थी. इसमें प्रणब मुखर्जी, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद और वीरप्पा मोइली ने हिस्सा लिया. लेकिन बैठक के बाद किसी ने भी मीडिया से बात नहीं की.

इस मु्द्दे पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद लगातार गहराते जा रहे थे और बयानबाज़ी भी तेज़ हो गई थी.

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर राय एक जैसी नहीं है. अन्ना हज़ारे और उनके साथियों ने बार-बार सवाल उठाया है कि आख़िर सरकार ऐसा क्यों नहीं करना चाहती.

अन्ना की टीम ने तो प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पूछा था कि ‘आप जैसा ईमानदार प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में आने से डर क्यों रहा है’? जबकि सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री को इस बिल के दायरे में लाने से प्रधानमंत्री के काम में दखल होगा.

मॉनसून सत्र में पेश होना है विधेयक

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अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए अन्ना हज़ारे ने कुछ दिन पहले एक और पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने कांग्रेस द्वारा ख़ुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का मुखौटा कहे जाने का विरोध किया था.

इसके जवाब में सोनिया गांधी ने कहा है कि लोकपाल बिल को लेकर उनकी प्रतिबद्धता पर शक न करें

दोनों पक्षों के बीच मतभेद इतने गहरे हो गए थे कि छह जून वाली बैठक में नागरिक समाज के नुमांइदों ने हिस्सा ही नहीं लिया था.

30 जून से पहले किसी एक राय पहुंचने के लिए सोमवार की बैठक काफ़ी अहम मानी जा रही है. लोकपाल विधेयक को मॉनसून सत्र में संसद में पेश किया जाना है. हालांकि कहा जा रहा है कि उससे पहले सरकार इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक करने की कोशिश करेगी.

अप्रैल में अन्ना हज़ारे दिल्ली में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आमरण अनशन पर बैठे थे और उन्होंने नागरिकों का काफ़ी समर्थन मिला था. लोकपाल पर संयुक्त ड्राफ़्टिंग समिति बनाए जाने के बाद ही अन्ना ने अपना अनशन तोड़ा था.

इसमें सरकार और नागरिक समाज दोनों के प्रतिनिधि हैं. इस समिति की कई बैठकें हो चुकी हैं लेकिन अब तक सहमति नहीं बन पाई है.

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