चार पीढ़ियों की सफलता

  • 24 जून 2011
हर्षपति सिंघानिया

अगर पिछली शताब्दी पर नज़र दौड़ाई जाए तो भारत की अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक घरानों का बड़ा योगदान रहा है.

इन परिवारों में से एक सिंघानिया परिवार भी है.

लाला जुग्गीलाल सिंघानिया और उनके पुत्र लाला कमलापत सिंघानिया ने 1920 के दशक में उद्योग जगत में अपने क़दम रखे.

'जेके ग्रुप' के नाम से मशहूर हुए इस व्यावसायिक घराने ने सबसे पहले कपास मिलों की स्थापना की और उसके बाद से इस समूह ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

फ़िलहाल इस परिवार की कई शाखाएं हैं और उनका व्यवसाय कपड़े, सीमेंट, अस्पताल, कागज़ उद्योग, इस्पात और लोहे के क्षेत्र में फैला हुआ है.

उत्तरदायित्व

हर्षपति सिंघानिया इस व्यावसायिक घराने की चौथी पीढ़ी के उद्योगपति हैं.

वे जेके समूह के एक अहम सदस्य हैं और जेके पेपर के प्रबंध निदेशक भी.

बीबीसी से मुलाक़ात का दिन तय होने के बाद मैं उनके दिल्ली स्थित दफ्तर में प्रतीक्षा ही कर रहा था कि एकाएक कमरे का दरवाज़ा एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने खोला और मुझसे पूछा कि आपने कुछ चाय-वाय पी कि नहीं!

वे ही हर्षपति सिंघानिया थे.

औपचारिक मुलाक़ात के बाद मुस्कुराते हुए हर्षपति सिंघानिया ने कहा कि सिंघानिया परिवार को समझने में मुझे थोड़ा समय लगेगा क्योंकि परिवार बहुत पुराना और बड़ा है.

हमारी बातचीत उसी मुद्दे से शुरू हुई जिसे लेकर दुनिया के तमाम देशों में भारतीय व्यावसायियों के चर्चे होते हैं, आख़िर पश्चिमी देशों के मुक़ाबले भारत में मौजूद व्यावसायिक घरानों की सफलता दर इतनी ऊंची क्यों है?

हर्षपति सिंघानिया कहते हैं कि ये कहना ग़लत होगा कि पश्चिमी देशों में इस तरह के औद्योगिक घराने मौजूद नहीं है.

वे कहते हैं, "ऐसे परिवार इसलिए भी सफल हैं क्योंकि उनके सदस्यों में एक दूरगामी सोच होती है जो उत्तरदायित्व से आती है. चाहे समय अच्छा हो या बुरा, एक व्यापारिक घराने के सदस्य के समक्ष उसे छोड़कर दूसरा काम करने का मौक़ा नहीं के बराबर होता है."

बिज़नेस की पाठशाला

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption जेके ग्रुप इस समय कई तरह के उत्पाद तैयार करता है. सीमेंट उनमे से एक है.

हर्षपति सिंघानिया इस बात पर भी बल देते हैं कि चाहे पुराना औद्योगिक घराना हो या फिर नया, आख़िरकार व्यवसाय में जो सुयोग्य होता है उसी को सफलता मिलती है.

वे कहते हैं, "घर पर हमेशा बिज़नेस की बात तो नहीं होती, लेकिन फिर भी बचपन से ही एक परिवार में जन्म लेने पर इंसान कुछ सिद्धांत सीखता है. हम जैसे लोगों के लिए वो आगे चल के बहुत हितकारी साबित होते हैं. "

हालांकि पारिवारिक व्यावसाय में क़दम रखने के कुछ नुकसान भी होते ही होंगे.

हर्षपति सिंघानिया का मत है कि आख़िरकार कोई अपना व्यावसाय कितनी कुशलता से चलाता है, यही सबसे बड़ा मुद्दा रहता है.

हर्षपति कहते हैं, "जिन-जिन व्यावसायिक घरानों ने कार्य कुशलता पर बल दिया है और गुणवत्ता पर ज़ोर दिया वे हमेशा सफल रहे हैं. मैंने भी अपनी संस्था में वैसे ही काम शुरू किया जैसे एक मैनेजमेंट ट्रेनी शुरू करता है. जैसे-जैसे समय बिताया उद्योग पर पकड़ भी मज़बूत होती चली गई."

उत्तराधिकारी का चयन

अक़सर देखा गया है कि बड़े औद्योगिक घरानों में एक या दो पीढ़ी गुज़रने के बाद अलगाव होने लगता है या फिर बंटवारा हो जाता है.

अंबानी समूह की दूसरी पीढ़ी में हुआ बंटवारा इसकी एक मिसाल है. तो क्या बड़े औद्योगिक घरानों में वारिसों को लेकर एक पहले से निर्धारित नीति नहीं होनी चाहिए?

हर्षपति सिंघानिया कहते हैं कि भारत में इस तरह का रिवाज़ पहले से ही रहा है, भले ही वो अनौपचारिक तौर पर रहा हो.

वे कहते हैं, "औद्योगिक घराने से होने का मतलब ये नहीं है कि परिवार का हर सदस्य सफल उद्योगपति बने. मेरे हिसाब से हर सदस्य में उसकी कुशलता को देखते हुए इस बात पर तरजीह दी जानी चाहिए कि उत्तराधिकारी कौन होगा."

करीब आधे घंटे की मुलाक़ात के बाद हर्षपति सिंघानिया के दफ़्तर से बाहर निकलते वक़्त एक बात ज़हन में साफ़ हो चुकी थी.

भले ही भारत में व्यावसायिक घरानों का बोलबाला रहा है और उनकी पीढियां बिज़नेस को बढ़ा रहीं हैं, लेकिन उन पीढ़ियों में से ज़्यादातर के पास दूरदर्शिता और कार्यकुशलता की भी कमी नहीं है.

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