ज़िंदगी की स्टीयरिंग अपने हाथ में..

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दिल्ली की रहने वाली युवा लड़की उमा यादव सामाजिक-आर्थिक वजहों से अपनी दसवीं की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाई. लेकिन आँखों में न सपनों की कमी थी और न मन में हौसले की. बचपन से उसके मन में ख़्वाब था गाड़ी चलाने का. पर ख़ुद की गाड़ी न थी. एक दिन उसे पता चला कि एक ग़ैर सरकारी संस्था दिल्ली के पिछड़े इलाक़ों से लड़कियों को चुनकर उन्हें ड्राइविंग की ट्रेनिंग देती है.

बस उमा ने बिना घर में बताए संस्था में फ़ोन घुमाया और सीखने लगी ड्राइविंग. आज वो प्रशिक्षित ड्राइवर है, एक महिला के यहाँ गाड़ी चलाती हैं. जब हम उससे मिलने गए तो उमा का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था क्योंकि उसे तनख़्वाह का चेक मिला था. उमा कहती हैं कि उनकी ज़िंदगी को मानो नई दिशा मिल गई है.

मेरे पति रेडियो टैक्सी चलाते हैं, उन्होंने एक बार पूछा कि क्या तुम गाड़ी चलाओगी. मैं तो घर पर ही रहा करती थी, बच्चों को देखती थी. पर मुझे गाड़ी चलाने का बेहद शौक था. फिर क्या था मैं आज़ाद फ़ाउंडेशन की मदद से ट्रेनिंग क्लास में शामिल हो गई. गाड़ी चलाना सीखने के बाद नौकरी लग गई. अब तो मैंने कॉमर्शियल लाइसेंस का टेस्ट भी पास कर लिया है.

नमिता, ड्राइवर

उमा हमें हमारी ही गाड़ी में टेस्ट ड्राइव पर भी ले गईं, मुझे ड्राइविंग के कुछ गुर भी उसने सिखाए.

दरअसल दिल्ली के कई पिछड़े इलाक़ों से युवा लड़कियों को चुनकर दिल्ली की ग़ैर सरकारी संस्था आज़ाद फ़ाउंडेशन इन्हें प्रेरित करती हैं और गाड़ी चलाना सीखाती हैं. करीब-करीब साल भर उन्हें कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है. ये नया हुनर सीखने के बाद कई लड़कियाँ आज बतौर ड्राइवर काम कर रही हैं और अपने पैरों पर खड़ी हैं.

दिल्ली के कालकाजी इलाक़े में हम लक्ष्मी, संगीता और उमा जैसी कई लड़कियों से मिलें जो या तो गाड़ी चलाना सीख रही हैं या फिर सीख चुकी हैं. इनमें से कई लड़कियों के सामाजिक-आर्थिक-पारिवारिक हालात अच्छे नहीं हैं. लेकिन इन लड़कियों ने हिम्मत नहीं हारी है.

चूल्हा-चौका ही नहीं क्लच, गियर भी

तमाम मुश्किलों के बावजूद इन्होंने ज़िंदगी का स्टीयरिंग अपने हाथ में ले लिया है.सबकी संघर्ष की अपनी दास्तां हैं जिसमें उम्मीद की किरण भी छिपी है. रीटा 14 साल में ब्याही गई, पढ़ाई छूट गई. लेकिन फिर उसे ड्राइविंग सीखने के मौके के बार में पता चला. अब वे ड्राइवरी करती हैं और परिवार की आर्थिक भी.

वहीं नमिता के पति टेक्सी ड्राइवर हैं. कभी सिर्फ़ घर-बार संभालने वाली नमिता भी अब बतौर ड्राइवर काम करती हैं. अब वे भी सरपट सड़कों पर किसी प्रोफ़ेशनल की तरह गाड़ी दौड़ाती हैं. क्लच, गियर, स्टीयरिंग पर उनकी वैसी ही पकड़ है जैसी रसोई में चौके चूल्हे पर.

समाज, गाँव, परिवार से कई लड़कियों को विरोध भी झेलना पड़ता है लेकिन चांदनी जैसी लड़कियाँ डटकर इनका मुकाबला करती हैं. चांदनी बताती हैं, "मैं जब यूपी के गाँव से दिल्ली आई तो सिलाई वगैरह सीखने डाल दिया गया. मुझे ये बिल्कुल पसंद नहीं था कि लड़कियाँ बस इसी तरह के काम करें. मैने ड्राइविंग सीखने की ठान ली. मुझे ताने भी सुनने पड़ते हैं कि ये कैसा काम है. लोग अश्लील बातें भी कहते हैं. जहाँ ज़रूरी हो मैं पलट कर जवाब दे देती हूँ."

सर उठा के जियो

उमा यादव की कहानी

इस पूरे प्रशिक्षण से मुझे ड्राइविंग ही नहीं और बातें भी पता चली हैं. जागो री संस्था में हमें अपने अधिकारों, सही ग़लत के बारे में बताया गया. मेरे परिवार में कुछ मसले हैं. मैं क्या कदम उठाने वाली हूँ ये तो मैं अभी नहीं बता सकती लेकिन अब मुझमें हिम्मत है कि मैं आवाज़ उठा सकूँ. मैं जागो री से सलाह लूँगी.

ये लड़कियाँ बाहर जाकर दुनिया का सामना कर सकें इसलिए इन्हें ड्राइविंग के अलावा अंग्रेज़ी बोलना और सेल्फ़ डिफ़ेंस सिखाया जाता है. उन्हें अपने क़ानूनी अधिकारों के बारे में जागरुक किया जाता है जिसमें कई अन्य संस्थाओं की मदद ली जाती है.

उमा यादव बताती हैं कि उन्हें ससुराल में कुछ दिक्कतें हैं लेकिन आज वो उनका सामना करने में सक्षम है. उमा ने बताया, “ इस पूरे प्रशिक्षण से मुझे ड्राइविंग ही नहीं और बातें भी पता चली हैं. जागो री संस्था में हमें अपने अधिकारों, सही ग़लत के बारे में बताया गया. मेरे परिवार में कुछ मसले हैं. मैं क्या कदम उठाने वाली हूँ ये तो मैं अभी नहीं बता सकती लेकिन अब मुझमें हिम्मत है कि मैं आवाज़ उठा सकूँ. मैं जागो री से सलाह लूँगी.”

संस्था में साल भर ड्राइविंग सीखने के लिए लड़कियों को दो हज़ार रुपए जमा करने पड़ते हैं. बहुत सी लड़कियों के पास एकमुश्त इतने पैसे नहीं होते. लेकिन नौकरी लगने के बाद ये लड़कियाँ धीरे-धीरे रकम चुका देती हैं.

जीने की राह

आज़ाद फ़ाउंडेशन के प्रोग्राम डाइरेक्टर श्रीनिवास राव कहते हैं, “पूरी कवायद का मकसद लड़कियों को रोज़गार के साथ सम्मान दिलाना है. उन्हें ऐसे क्षेत्रों में ले जाना है जो पारंपरिक रूप से पुरुष प्रधान रहे हैं. पुरुष वर्चस्व को तोड़ने का ये एक तरीका है.हमें उन्हें महिला उद्यमी बनाना है.”

प्रशिक्षित लड़कियों को बाद में ग़ैर सरकारी संस्था एक प्रोफ़ेनशनल संस्था के हवाले कर देती है ताकि उन्हें नौकरी के उचित अवसर मिल सकें.

सार्वजनिक यातयात के हिसाब से दिल्ली महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता. ऐसे में बहुत सी महिलाएँ इन लड़कियों को निजी ड्राइवर के तौर पर रखना पसंद करती हैं.

ड्राइविंग का प्रशिक्षण लेने वाली कितनी ही लड़कियों से जब हम मिले तो उन्होंने बताया कि कैसे उनके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी हुई है.इनमें से कई लड़कियों की ज़िंदगी किसी उबड़-खाबड़ से रास्ते जैसी थी, बिल्कुल दिशाहीन..लेकिन गाड़ी चलाते-चलाते इनके जीवन को भी नई दिशा मिल गई हैं.

आज ये ड्राइवर लड़कियाँ बड़े आत्मविश्वास के साथ गाड़ियों को फ़र्राटे से सड़कों और पटरियों पर दौड़ा रहीं हैं. मन में यकीन है कि ज़िंदगी की गाड़ी भी ऐसे ही सरपट दौड़ेगी.

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