'यहां रसद पहुंचाना जंग के जैसा है'

ट्रक

शाम ढल रही है और मेरी गाड़ी दंतेवाड़ा ज़िला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर सुकमा के रास्ते पर चल रही है. मगर सुकमा से 40 किलोमीटर दूर दोरनापाल तक का सफ़र काफी मुश्किलों भरा है क्योंकि यहाँ तक जाने वाली सड़क पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है.

यह सड़क आगे चलकर छत्तीसगढ़ को आंध्र प्रदेश से जोड़ती है और यह राष्ट्रीय राज मार्ग का हिस्सा है.

कहते हैं कि माओवादी इस सड़क को बनने नहीं दे रहे हैं. बाद में पता चला कि इस सड़क का टेंडर साल भर पहले ही हो चुका था और ठेकेदार नें सरकारी ख़जाने से लगभग 15 करोड़ रूपए की अग्रिम राशि ले भी ली थी.

बाद में बिना कुछ काम शुरू किए माओवाद की दुहाई देते हुए ठेकेदार चुपचाप रातो-रात भाग खड़ा हुआ.

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पथरीले और गड्ढों भरे रास्ते से होकर मैं दोरनापाल पहुंचा जहां ट्रकों की लम्बी कतारें लगी हुई थी. इन ट्रकों में अनाज और रोज़मर्रा की ज़रूरतों की अन्य चीज़ें लदी हुई थी.

इस सामग्री को दोरनापाल से जगरगुंडा के कैंप और राहत शिविर तक पहुंचाया जाएगा. जगरगुंडा की दूरी 90 किलोमीटर के आसपास की है और राशन ले जाने के लिए वाहनों और सुरक्षा कर्मियों को दुर्गम और ख़तरनाक रास्ते से होकर गुज़रना पड़ेगा.

जगरगुंडा जैसे सुदूर इलाक़े में रसद पहुंचाना किसी जंग लड़ने से कम नहीं है. यहाँ साल में सिर्फ दो ही बार अनाज पहुंचाया जा सकता है. वो भी कड़ी सुरक्षा के बीच.

जोखिम भरा रास्ता

दोरनापाल में मौजूद पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को इंतज़ार है आदेश का, जब वह इस काफ़िले को लेकर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ेंगे. किसी को नहीं पता कि जगरगुंडा के लिए कब निकलना पड़ेगा क्योंकि यह पूरा मामला पूरी तरह से गोपनीय रखा गया है. तभी रात के 11 बजे संदेश आता है कि ट्रकों को जगरगुंडा के लिए रवाना किया जाए.

रात की खामोशी को चीरते हुए ट्रक आगे बढ़ रहे हैं. इस जोख़िम भरे मिशन में शामिल किसी को यह नहीं मालूम कि उनका सामना आगे किस चीज़ से होने वाला है जबकि पुलिस के खुफिया तंत्र की सूचना है कि चिंतलनार और उसके आसपास नक्सलियों का जमावड़ा है. फिर भी सभी फूँक-फूँक कर क़दम रख रहे हैं.

गाड़ियों के इस काफ़िले में सौ से ज्यादा ट्रक हैं. सबसे आगे सुरक्षा बलों के जवान पैदल ही चल रहे है.

वह जंगलों के इन कच्चे रास्तों पर बिछी हुई बारूदी सुरंगों का पता लगा रहे हैं. यह एक मुश्किल मिशन है जो सरकारी अमला साल में दो बार अंजाम देता है.

यह सारा काम दंतेवाड़ा के कोंटा इलाके के अनुमंडल दंडअधिकारी यानी एसडीएम एस पी वैद के नेतृत्व में हो रहा है.

बीबीसी से बात करते हुए वैद का कहना था, "यह इलाका पहुँच से दूर है. नक्सलियों का यह सबसे बड़ा गढ़ है इसलिए इस इलाक़े को सबसे संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है. इसलिए साल में इस इलाके में सिर्फ दो बार ही अनाज पहुंचाया जाता है. एक बार चालीस पचास ट्रकों का काफ़िला निकलता है. वह भी कड़ी सुरक्षा के बीच. एक तरह से इस दुर्गम इलाके में अनाज पहुंचाना किसी जंग लड़ने से कम नहीं है. हम इसकी तैयारी महीनों से करते हैं."

Image caption दोरनापाल से जगरगुंडा के बीच के रास्ते में हर पचास या सौ गज पर सड़क कटी हुई है

वैद कहते हैं कि जगरगुंडा का इलाका छह महीनों तक बाक़ी की दुनिया से कटा रहता है.

वो कहते हैं:"यहाँ सड़क से आना जाना बिलकुल नहीं होता है. जगरगुंडा के लोग छह महीनों तक इन ट्रकों का इंतज़ार करते हैं. वैसे आम दिनों में वहां सिर्फ हेलीकॉप्टर के ज़रिए ही जाया जा सकता है. जब अनाज की गाड़ियाँ जातीं हैं तब ही वहां के ग्रामीण उनपर सवार होकर यहाँ आते हैं."

दोरनापाल से जगरगुंडा तक का रास्ता जोख़िम भरा है. यहाँ हर पचास या सौ गज पर सड़क कटी हुई है. इस रास्ते पर सुरक्षा बलों के चार कैंप स्थित हैं. मगर संसाधन के आभाव और सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं.

चिंतलनार के इलाके में रह रहे ग्रामीण कहते हैं कि, कहने को तो जगरगुंडा चिंतलनार से महज़ 15 किलोमीटर दूर है. मगर इस इलाके की सारी सड़कों को बंद कर दिया गया है या तो इनपर चलने पर माओवादियों ने प्रतिबंध लगाया हुआ है या फिर इन सड़कों का हाल इतना ख़राब है कि यहाँ पहुंचा नहीं जा सकता है.

वहीं जगरगुंडा में रह रहे लोगों के लिए ज़िला मुख्यालय आना एक नामुमकिन सा सवाल है. मौजूदा हालात में इन्हें इन वाहनों का इंतज़ार करना पड़ता है जो साल में दो बार रसद लेकर आते हैं.

नाराज़गी

दोरनापाल में मेरी मुलाक़ात ऐसे सैकड़ों लोगों से हुई जो या तो थ छह महीने या फिर साल भर के बाद जगरगुंडा जा रहे थे. कोंटा के अनुमंडलाधिकारी कहते हैं कि इस बार जगरगुंडा जाने वालों की संख्या 500 से अधिक हैं.

पुलिस और सुरक्षा बल के जवान सारी एहतियात बरतते हुए आगे बढ़ रहे हैं. मगर इस काफ़िले में उन लोगों की जमात भी शामिल है जो यह जोखिम भरा सफ़र बिना किसी वजह के तय कर रही है. इन लोगों का न तो नक्सलियों से कोई लेना देना है और न ही पुलिस से. मगर यह इन सब के बीच अपने आपको फ़ंसा हुआ महसूस कर रहे हैं. यह जमात है इन सौ से ज्यादा ट्रकों के ड्राइवर और खलासियों की.

इन ड्राइवरों और खलासियों का कहना है कि सरकारी अधिकारियों नें उनके वाहन ज़बरन ज़ब्त कर उन्हें अनाज ले जाने के काम में लगाया है. वह कहते हैं कि ऐसे संवेदनशील इलाके में जाने के लिए न तो उनका बीमा हुआ है और न ही उनके खान-पान की व्यवस्था ही की गयी है.

इस काफ़िले में शामिल एक ट्रक के ड्राइवर नें कहा, " पुलिस और प्रशासन के लोग तो नौकरी कर रहे हैं. उनका पूरा ख़याल रखा जाता है. उन्हें कुछ होता है तो उनके परिजनों को मुआवजा मिलेगा और नौकरी भी. हमारा क्या ? अगर हम में से किसी को कुछ हो भी जाता है तो किसी को क्या फर्क पड़ेगा ?"

हालांकि इस दौरान लौटने के क्रम में पोल्लाम्पल्ली के पास माओवादियों नें बारूदी सुरंग का विस्फोट किया मगर इस घटना में किसी को नुकसान नहीं हुआ. अब सवाल उठता है कि सरकार ऐसी जगह पर राहत शिविर और कैंप क्यों स्थापित किये हुए है जहाँ से आना जाना ही जंग लड़ने के बराबर हो. दूसरी तरफ माओवादियों का आरोप है कि इन सुदूर इलाकों में सरकार कैंप स्थापित कर स्थानीय लोगों पर दमन का चक्र चला रही है.

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