महिला बिल पर नहीं बनी सहमति

  • 22 जून 2011
Image caption लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने महिला आरक्षण विधेयक पर सर्वदलीय बैठक बुलाई थी.

महिला आरक्षण विधेयक पर आम सहमति बनाने की लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की कोशिश फिर विफल हो गई है.

मीरा कुमार की अध्यक्षता में इस मुद्दे पर बुधवार को हुई सर्वदलीय बैठक बेनतिजा रही.

महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप का विरोध कर रहे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नेताओं ने इस बैठक का बहिष्कार किया.

बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में मीरा कुमार ने बताया कि वो सपा और बसपा को इस मुद्दे पर चर्चा के लिए अलग से आमंत्रित करेंगी.

मीरा कुमार ने कहा, " महिला आरक्षण के मुद्दे पर बहुत दोस्ताना माहौल में चर्चा हुई. सभी इस बिल का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन जैसा कि पहले भी मैंने कहा था अभी भी इसके कुछ अंशों पर सहमति नहीं बन पाई है. मैं दोबारा बैठक बुलाउंगी और इस मुद्दे पर सहमति बनाने के लिए प्रयास जारी रहेंगे."

विरोध

दरअसल सरकार चाहती है कि वह इस बिल पर मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले आम राय बना ले.

साल 2010 में राज्य सभा में दो दिन तक चले ड्रामा के बाद ये बिल पास कर दिया गया था लेकिन लोकसभा में अभी इस पर मोहर नहीं लगी है.

लोकसभा में इसे पारित किए जाने को लेकर अभी कुछ पार्टियां जैसे समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल अलग-अलग मांगें रख रहे है.

समाजवादी पार्टी के सांसद मोहन सिंह ने कहा, "हम चाहते है कि आरक्षण के अंदर ही आरक्षण दिया जाए. ख़ासतौर पर अल्पसंख्यक, अति दलित और पिछड़ी महिलाओं को आरक्षण दिया जाए."

मोहन सिंह का कहना था कि एक औऱ विकल्प राजनीतिक पार्टियों के महिलाओं को पार्टी के अंदर 20 फीसदी आरक्षण देने का हो सकता है. ऐसे में जो इसका पालन नहीं करेंगे उन पार्टियों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाए.

राजद सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि आरक्षण में 'कोटे के भीतर कोटा' होना चाहिए और अन्य पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए उसमें 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित होनी चाहिए.

समर्थन

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वाराज का कहना है कि हमने राज्यसभा में भी इस बिल का समर्थन किया था और लोकसभा में भी इसे समर्थन देने की मंशा रखते है.

अपनी बात रखते हुए उन्होंने ये भी कहा कि पिछली बार जब राज्यसभा में ये बिल पारित हुआ था तब मार्शल की मदद से सांसदों को बाहर निकाला गया और फिर मतदान हुआ. ऐसी परिस्थिति लोकसभा में नहीं आनी चाहिए.

सुषमा स्वाराज ने कहा, "जो पार्टियां इस बिल का विरोध कर रही है उनके नेताओं से अलग से बात अध्यक्ष को करनी चाहिए ताकि वह अपना विरोध जता सकें."

उन्होंने कहा कि अगर कुछ नेता संसद में ज़्यादा समय लेकर बोलना चाहते हैं तो समय दिया जाए.

महिला आरक्षण विधेयक पिछले 14 साल से अधर में लटका हुआ है. इस बिल का मसौदा पहली बार एचडी देवगोड़ा की सरकार के दौरान तैयार किया गया था और इसे वर्ष 1996 के सितंबर महीने में संसद में पेश किया गया था.

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