'डीज़ल के दाम बढ़ाना समझ के बाहर'

तेल
Image caption नरेंद्र तनेजा के मुताबिक लोगों का अनुमान है कि आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें घटने वाली हैं

गैस सिलेंडर के दाम में पचास रुपए की बढ़त करना होना ही लेकिन मुझे लगता है कि ये कदम अंत में उपभोक्ता के हित में ही जाएगा.

अगर इन तेल कंपनियों के वित्तीय हालात मुश्किल भरे हो जाएँ तो ये किसी के भी हित में नहीं होगा.

लेकिन मेरी समस्या डीज़ल को लेकर है. अगर सरकार चाहती तो डीज़ल के दाम नहीं बढ़ाती क्योंकि पिछले 48 घंटों में तेल की कीमत नीचे गई हैं और सभी का अनुमान है कि आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी कीमतें और घटने वाली हैं.

ये कदम ऐसे वक्त लिया गया है कि जब तय किया गया है कि सरकार कस्टम ड्यूटी खत्म कर देगी.

सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों पर कस्टम ड्यूटी घटा दी है. साथ में एक्साईज़ को भी कम किया गया. सरकार की ओर से लिए गए ये कदम काबिले-तारीफ़ थे और आम उपभोक्ता को राहत दी जा सकती थी.

कंपनियों को ये कहा जा सकता था कि हमने आपको ये राहद दे दी है, और क्योंकि लोग महंगाई की वजह से परेशान हैं, तो आगे की बात दो-चार महीने में देखी जाएगी.

डीज़ल अर्थव्यवस्था

डीज़ल की कीमतें जो बढ़ाई गई हैं, उन पर राज्य सरकारें सेल्स टैक्स या वैट अलग से लगाएंगी. जब आप डीज़ल की कीमतें बढ़ाते हैं तो महंगाई में पाँच गुना वृद्धि होती है.

डीज़ल से सिचाई का पंप चलता है, उसका ट्रैक्टर भी चलता है, लोगों की कारें चलती हैं, उनके जेनरेटर चलते हैं. रेलगाड़ी, समुद्री जहाज़ में भी डीज़ल का इस्तेमाल होता है. भारतीय अर्थव्यवस्था डीज़ल अर्थव्यवस्था है.

भारत में इंधन की जितनी ख़पत होती है, उसमें से 40 फ़ीसदी डीज़ल की होती है, और पेट्रोल की खपत 10 प्रतिशत से भी कम है. जब सरकाई महंगाई पर काबू करने में विफल रही है, तो ऐसे वक्त डीज़ल की कीमत बढ़ाकर अपने लिए मुसीबत बढ़ा देना, ये बात कुछ समझ नहीं आ रही है.

एक्साईज़ को कम करने का कदम अच्छा है, हालाँकि मुझे लगता है कि एक्साईज़ को और कम करना चाहिए था जिससे डीज़ल में बढ़ाई गए तीन रुपए की भी आवश्यकता नहीं होती.

महंगाई से परेशान

भारत का आम उपभोक्ता महंगाई से परेशान हो चुका है. डीज़ल की कीमत बढ़ाने से सब्ज़ी, भाड़े, सभी में वृद्धि हो जाती है.

तेल कंपनियाँ ये नहीं कहतीं कि उन्हें घाटा हो रहा है. वो इसे अंडररिकवरी बताती हैं, मतलब एक अनुमानित आंकड़ा जितना उन्हें मुनाफ़ा होना चाहिए. अंडररिकवरी मतलब अनुमानित आंकड़े से कम मुनाफ़े की प्राप्ति.

कंपनियाँ ये कहती हैं कि जब रिलायंस, एस्सार जैसी निजी तेल कंपनियों को इतना फ़ायदा होता है, तो ऐसे में हमें सरकारी कंपनी होने की वजह से घाटा हो जाता है.

उनके मुताबिक सरकार हमें कीमतें बढ़ाने नहीं देती. वो कहते हैं कि वो बाहर से कच्चा तेल लेकर आते हैं, उसकी सफ़ाई करते हैं, रिलायंस और एस्सार को तो आप पूरी कीमत लेने देते हैं, और आप हम पर ये चोट लगा देते हैं. यानि हमें जितना कमाना चाहिए, हम उतना नहीं कमा पाते.

तेल कारोबार

ये आंकड़ा अनुमानित, काल्पनिक होता है. तेल कंपनियों के कारोबार के तीन हिस्से होते हैं. एक हिस्सा होता है जब ये तेल को आयात करते हैं. इसे ट्रेडिंग कहते हैं.

दूसरा हिस्सा होता है जब तेल की सफ़ाई होती है, यानि कच्चे तेल से डीज़ल, पेट्रोल, मिट्टी का तेल बनता है.

तेल को पेट्रोल पंप में ले जाना तीसरा पड़ाव होता है.

पहले दो हिस्सों में तो कंपनियों को फ़ायदा होता है. रिलायंस को प्रति बैरल नौ से दस डॉलर का फ़ायदा होता है, जबकि सरकारी कंपनियों को छह डॉलर का फ़ायदा होता है. लेकिन उपभोक्ता तक तेल पहुँचाने की प्रक्रिया के दौरान सरकार बीच में आ जाती है और कंपनियों की अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है.

सरकार कीमतों के दाम तय करती है. यहाँ कंपनियों को घाटा होता है. बैलेंस शीट में जो आपको मुनाफ़ा दिखता है, वो सारा मुनाफ़ा रिफ़ाईनिंग और ट्रेडिंग का है.

खरीदने की कीमत पर सरकार का कोई अंकुश नहीं है, लेकिन बेचने पर है.

मेरा मानना है कि कंपनियों कि खराब आर्थिक हालत के लिए कंपनियाँ नहीं, सरकार दोषी है. सरकार इन्हें स्वायत्तता नहीं देती. सरकार लोगों को ठीक तरह से कंपनियाँ चलाने नहीं देती है. इनके कामकाज में सरकार का हस्तक्षेप रहता है.

एक तरफ़ सरकार ने कहा है कि कंपनियाँ पेट्रोल के दामों को अपनी सोच के मुताबिक बढ़ा सकती हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता है और उन्हें हर बात के लिए सरकार की इजाज़त लेनी पड़ती है.

इन कंपनियों की हालत इतनी खराब हो गई है कि कोई विदेशी बैंक इन्हें ऋण नहीं देना चाहता. हम यहाँ भारत की सबसे बड़ी कंपनियों की बात कर रहे हैं.

इंडियन ऑयल देश की सबसे बड़ी कंपनी है और उसकी ये हालत है कि उसे कोई विदेशी बैंक ऋण देने को तैयार नहीं है. भारतीय बैंक भी उन्हें ऋण नहीं देना चाहते क्योंकि उनकी बैलेंश शीट खराब है.

सरकार के कहने पर वो कंपनियों को ऋण देते हैं.

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