'डोपिंग, भ्रष्टाचार और सत्ता संघर्ष'

मनदीप कौर इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption डोपिंग की खबर ने भारत की कई खेल प्रेमियों को निराश किया है.

भारतीय खेलों की कहानी भी देश की हालत और लोगों के मूड की तरह ही एक छोर से दूसरे छोर तक डोलती रहती है.

क्रिकेट एक ऐसी दवा है जो लोग खुश होकर पीते हैं, भले ही वो कभी-कभी ज़हर ही क्यों ना हो.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने माने कई खेल, प्रबंधकों के भ्रष्टाचार और घोटालों की कहानियों से पटे पड़े हैं. लेकिन खेलों की दुनिया में इस घोर निराशा के बीच ऐसी भी कहानियाँ हैं जहाँ लोगों ने मुश्किलों का सामना करते हुए दुनिया के सर्वोत्तम लोगों से दो-दो हाथ किए और उन्हें हराया भी.

इन कहानियों में कोई एक साइना नहवाल या एक अभिनव बिंद्रा अपवाद हो सकते हैं हालाकि हाल के दिनों में हम सभों ने यक़ीन कर लिया था कि भारतीय एथलेटिक्स में कोई क्रांति हो रही है, ख़ासकर कॉमनवेल्थ खेल और एशियाई खोलें में भारतीय महिलाओं के प्रदर्शन को अगर ध्यान में रखा जाए.

सपने चकनाचूर

मनदीप कौर का 4x400 मीटर की रिले दौड़ में जान लगाकर दौड़कर सोने का तमग़ा जीतना कॉमनवेल्थ खेल के यादगार क्षणों में से था. लेकिन ये ख़बर आने के बाद कि उस रिले दौड़ की चार में से तीन धावक प्रदर्शन बढ़ाने वाली दवाईयाँ ले रहीं थीं, उसने भारतीए एथलेटिक्स की उज्जवल भविष्य की सारी उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया है.

जब भी कोई भारतीय धावक अपने सबसे अच्छे प्रदर्शन से ज़्यादा बेहतर खेल दिखाता है तो उन नतीजों पर शक पैदा होने लगता है, चाहे वो एथलेटिक्स हो, भारत्तोलन हो या फिर कुछ और.

लेकिन इसके बावजूद भी हमने इन संदेहों को नज़रअंदाज़ किया क्योंकि उन्होंने अपने प्रदर्शनों से भारत की छवि को 2010 कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में हुए भ्रष्टाचार के बीच कुछ हद तक बचाए रखा था.

ये मान लेना नादानी होगी कि जब प्रशासक ही लोगों का खून चस रहे हों, तो आसपास के दूसरे लोग इस असर से बचें रह सकते हैं. जब जीत आपको सभी गुनाहों से बचा सकती है, तो फिर आप ग़लत तरीक़े से जीत हासिल करने की कोशिश क्यों ना करेंगे?

ये दुनिया भर में देखा गया है कि जब भी कोई धावक ग़लत हरकत करते पकड़ा जाता है तो उसे उन लोगों की मदद मिलती है जो किसी भी क़ीमत पर सत्ता में बने रहना चाहते हैं और अपनी सत्ता का दायरा फैलाना के लिए खेल का ख़ून चूसते हैं.

अस्सी के दशक में विश्व एथलेटिक्स संघ के प्रमुख प्राइमो नेबियोलो के माफ़िया से रिश्ते जगज़ाहिर हैं. हमारे अपने देश में भी कई नेबियोलो हैं जिनमें से कुछ पर मुक़दमा चल रहा है और वे सलाखों के पीछ हैं.

आप इसे न्याय कह सकते हैं लेकिन जब कुछ खिलाड़ी ही ख़ुद एक ऐसे बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बन जाते हैं जहां किसी भी क़ीमत पर जीतना ही सबसे अहम हो जाता है तो फिर आप किसे इलज़ाम देंगे.

ये एक ऐसा अपराध बोध है जिसका एहसास किसी भी राष्ट्र के सामूहिक अन्तरात्मा पर होना चाहिए.

संबंधित समाचार