'रिश्तों पर असर नहीं पड़ेगा'

  • 3 जुलाई 2011
दीपू मूनि
Image caption बांग्लादेशी विदेश मंत्री भारतीय स्पष्टीकरण से संतुष्ट हैं

बांग्लादेश की विदेश मंत्री दीपू मूनि का कहना है कि मनमोहन सिंह की ताज़ा टिप्पणी से दोनों देशों के रिश्तों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा.

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाँच संपादकों के साथ अपनी बातचीत में कहा था कि बांग्लादेश की 25 प्रतिशत जनसंख्या जमाते-इस्लामी की कसमें खाती है, जमाते इस्लामी भारत विरोधी है इसलिए यह भारत के लिए चिंता का विषय है.

इस टिप्पणी के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय को एक बयान जारी करके स्पष्टीकरण देना पड़ा था और विदेश नीति के जानकारों ने प्रधानमंत्री के बयान के ग़ैर-ज़रूरी बताया था.

लंदन में बीबीसी हिंदी से बांग्लादेश की विदेश मंत्री ने विशेष बातचीत की.

भारत के प्रधानमंत्री के बयान पर आप क्या कहेंगी?

मैंने वह बयान इधर-उधर पढ़ा है, मैंने ख़ुद नहीं सुना. मैंने भारतीय विदेश मंत्रालय का स्पष्टीकरण भी पढ़ा है. यह प्रधानमंत्री की 'ऑफ़ द रिकॉर्ड' टिप्पणी बताई जा रही है जो अख़बारों में छप गई है जो दुर्भाग्यपूर्ण है. भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान में जो कुछ कहा गया है वही हमारे द्विपक्षीय रिश्तों की सच्चाई है, बयान में कहा गया है कि भारत की सरकार, प्रधानमंत्री और देश की जनता बांग्लादेश के साथ स्नेहपूर्ण संबंध रखती है, यह भी कहा गया है कि भारत बांग्लादेश के अंदरूनी मामलों में कभी दख़ल नहीं देगा. दोनों देशों के रिश्तों में आई ताज़ा मज़बूती की बात भी कही गई है इसलिए अब किसी तरह की ग़लतफ़हमी की कोई गुंजाइश नहीं है.

लेकिन इस टिप्पणी का खंडन तो नहीं किया गया कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा?

मैं मनमोहन सिंह को जितना जानती हूँ, मैं उनसे कई बार मुलाक़ात कर चुकी हूँ और मुझे लगता है कि शायद वे बांग्लादेशी समाज के एक वर्ग के बारे में बात करना चाह रहे थे जिसमें भारत-विरोधी भावनाएँ हैं, भारत विरोधी होने से अधिक असल में बात ये है कि कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने घरेलू राजनीतिक हितों के लिए ऐसी भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं. जहाँ तक जमाते इस्लामी की बात है तो वे वहाँ हैं, लेकिन उनके समर्थकों की संख्या छह-सात-आठ प्रतिशत से अधिक नहीं रही है. हमारी संसद में उनकी उपस्थिति बहुत कम रही है और कई बार तो बिल्कुल नहीं रही है.

तो इसका मतलब है कि भारत के प्रधानमंत्री ने समझने में ग़लती की, ऐसे लोगों का प्रतिशत छह के करीब है न कि 25 प्रतिशत जैसा उन्होंने कहा था?

नहीं, मैं ये नहीं कहूँगी कि उन्होंने समझने में ग़लती की, मैंने उनकी टिप्पणी पर भी कोई टिप्पणी नहीं करूँगी. एक आधिकारिक स्पष्टीकरण आ गया है मैं उससे संतुष्ट हूँ. उन्होंने बांग्लादेश के समाज के एक छोटे से हिस्से के बारे में अपनी चिंता प्रकट की है जिस पर जमाते इस्लामी का प्रभाव है.

क्या इस टिप्पणी का असर छह जुलाई को होने वाली भारतीय विदेश मंत्री की बांग्लादेश यात्रा और उसके बाद भारतीय प्रधानमंत्री के दौरे पर नहीं पड़ेगा?

नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं. एसएम कृष्णा के दौरे में हम अपनी प्रगति की समीक्षा करेंगे कि पिछले साल हमारी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान जो संयुक्त बयान जारी किया गया था उस पर किस हद तक अमल हुआ है. हम राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के अलावा क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत करेंगे इसलिए सवाल ही नहीं है कि उनके दौरे पर इन बातों का कोई असर होगा. हम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बांग्लादेश यात्रा का भी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं.

माना जाता है कि बांग्लादेश में समाज का एक वर्ग चरमपंथ को समर्थन देता है और मुख्यतः भारत विरोधी है...

नहीं, समाज का एक वर्ग कहना ठीक नहीं होगा, ये चंद लोग हैं. बांग्लादेश एक सेक्युलर, लोकतांत्रिक और विविधतापूर्ण देश है. हमारे समाज में चरमपंथ के लिए कोई स्थान नहीं है.

बांग्लादेश में ऐसी जनभावना ज़रूर है कि वे भारत को बहुत कुछ दे रहे हैं लेकिन उन्हें बदले में भारत से कुछ नहीं मिल रहा है, इसका सामना आप किस तरह करती हैं?

देखिए, दुनिया में कहीं भी जब एक बहुत बड़ा देश होता है और उसके पड़ोस में छोटे देश होते हैं तो ऐसी विरोधी भावनाएँ आ ही जाती हैं.

मतलब भारत को लेकर एक तरह की असुरक्षा है?

एक तरह से आप ऐसा कह सकते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि इस सबसे ऊपर भारत और बांग्लादेश मित्र देश हैं, हमारा चालीस साल का कूटनीतिक संबंध ही नहीं है बल्कि हज़ारों हज़ार साल की साझा विरासत है. मैं ये भी मानती हूँ कि हमारा भविष्य भी साझा है. लोग अगर असुरक्षित और चिंतित हैं तो इस दिशा में भारत की सरकार को भी कुछ करना चाहिए.

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