लोकपाल विधेयक पर सर्वदलीय बैठक

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बहुचर्चित लोकपाल विधेयक को लेकर दिल्ली में सर्वदलीय बैठक शुरु हो गई है जिसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शुरुआती टिप्पणी की है.

इस बैठक में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग), वामपंथी दल और अन्य कई राजनीतिक पार्टियाँ हिस्सा ले रही है.

प्रधानमंत्री ने शुरुआती टिप्पणी करते हुए कहा है कि लोकपाल विधेयक को लेकर काफी विवाद हो रहा है और सरकार चाहती है कि एक मज़बूत लोकपाल बने ताकि ऊंचे पदों पर हो रहे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण किया जा सके.

प्रधानमंत्री ने अपनी टिप्पणी में साफ किया कि देश में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए क़ानून हैं लेकिन इसके बावजूद एक मज़बूत क़ानून की ज़रुरत महसूस की जा रही है.

प्रधानमंत्री का कहना था कि लोकपाल विधेयक जिस किसी रुप में स्वीकार किया जाए, यह ध्यान रखना होगा कि यह संविधान के दायरे में ही हो क्योंकि संविधान सबसे ऊपर है.

उनका कहना था कि संविधान ने जांच और संतुलन का एक पेचीदा तंत्र तैयार किया है और लोकपाल को भी इसी में अपनी एक जगह बनानी होगी.

इससे पहले शनिवार को भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने यह जानकारी दी थी कि इस बैठक में शिवसेना को छोड़कर राजग गठबंधन के सभी दल शामिल होंगे.

वामपंथी दलों ने भी घोषणा की है कि वे इस सर्वदलीय बैठक में शामिल होंगे. माना जा रहा है कि ये बैठक काफ़ी हंगामेदार हो सकती है.

कई राजनीतिक दलों का कहना है कि वे सरकार के सामने ज़ोर-शोर से यह सवाल रखेंगे कि अभी तक लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने में विपक्षी दलों को अलग क्यों रखा गया है.

नाराज़गी

भाजपा नेता आडवाणी ने राजग के कुछ प्रमुख सहयोगी दलों जैसे जनता दल (यू) और अकाली दल के साथ बातचीत के बाद शनिवार को पत्रकारों को बताया, "सरकार ने पहली बार विपक्षी पार्टियों को लोकपाल विधेयक पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया है. सवाल ये था कि बैठक में जाया जाए या नहीं. राजग ने यह फ़ैसला किया कि बैठक में शामिल हुआ जाए और अपनी नाराज़गी सरकार को बताई जाए."

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात की भी कमोबेश यही राय थी.

उनका कहना था कि वे नहीं जानते कि सरकार क्या चाहती है. उन्होंने कहा कि सरकार पहले उन्हें मसौदा तो दे, इसके बाद वे इस पर विचार करेंगे.

पिछले कुछ महीनों से लोकपाल विधेयक को लेकर राजनीति गर्म है. सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे की भूख हड़ताल से शुरू हुई ये बहस अब भी जारी है.

सरकार ने अन्ना हज़ारे की भूख हड़ताल के बाद लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए संयुक्त समिति बनाई, जिसमें नागरिक समाज के प्रतिनिधि और सरकार के प्रतिनिधि शामिल थे.

मतभेद

संयुक्त समिति की बैठक भी हर बार चर्चा का विषय रही क्योंकि नागरिक समाज और सरकार के मंत्रियों के बीच कई अहम मुद्दों पर मतभेद क़ायम रहे.

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Image caption अन्ना ने फिर अनशन की धमकी दी है

बाद में यह फ़ैसला हुआ कि नागरिक समाज के मसौदे पर सरकार के मसौदे को कैबिनेट और फिर संसद के सामने रखा जाएगा.

दूसरी ओर अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भी अपने मसौदे पर सहमति के लिए कई राजनीतिक दलों के नेताओं से मुलाक़ात की है.

इसी क्रम में शनिवार को अन्ना हज़ारे ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाक़ात की. इस मसौदे पर अन्य प्रावधानों के अलावा सबसे ज़्यादा मतभेद प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर है.

कांग्रेस और उसके कई सहयोगी दल इसका विरोध कर रहे हैं, तो वामपंथी दल इसके पक्ष में है. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अभी तक अपना रुख़ स्पष्ट नहीं किया है.

वैसे अन्ना हज़ारे ने कहा है कि अगर सरकार ने अच्छा मसौदा संसद में पेश नहीं किया, तो वे 16 अगस्त से दोबारा अनशन शुरू करेंगे.

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