किसानों को इंसाफ़, पर निवेशकों का क्या?

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ग्रेटर नोएडा में बन रहे कुछ आलीशान रिहाइशी प्रॉजेक्ट पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने सैंकड़ों निवेशकों के आशियाने के ख़्वाब को अनिश्चय के भंवर में डाल दिया है.

आम्रपाली, सुपरटैक और अजनारा जैसे कई बड़े बिल्डर इस क्षेत्र में अपनी रिहायशी इमारतों को खड़ी करने की योजनाओं की घोषणा कर चुके हैं और कई परियोजनाओं पर तो निर्माण कार्य भी शुरू हो चुका है.

लेकिन अदालत के फ़ैसले के बाद बिल्डरों और निवेशकों के सामने अनगिनत सवाल खड़े हो गए हैं.

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अलाहबाद हाई कोर्ट के उस फ़ैसले पर मुहर लगा दी, जिसके तहत ग्रेटर नोएडा के पास शाहबेरी गांव में 156 हेक्टेयर के भूमि अधिग्रहण पर रोक लगा दी गई थी.

नोएडा में भू-अधिग्रहण अवैध

इस फ़ैसले के बाद इन ऊंची इमारतों में घर ख़रीदने का सपना संजोने वाले निवेशकों में खलबली सी मच गई है.

‘पैसा वापस दो’

नोएडा एक्सटैंशन में शाहबेरी गांव से सटे एक गांव में अजनारा कंपनी के रिहायशी प्रॉजेक्ट में एक फ़्लैट में लाखों निवेश कर चुकीं श्रुति वर्मा कहती हैं कि कोर्ट ने किसानों के बारे में तो सोचा लेकिन निवेशकों के भविष्य की किसी को चिंता नहीं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद बहुत तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई है. अपने सपनों का घर ख़रीदने की जल्दी में हमने एक बार में ही बिल्डरों को लाखों रुपए सौंप दिए, लेकिन अब हमें आगे का रास्ता समझ नहीं आ रहा है. कोर्ट ने किसानों के हित में तो फ़ैसला दिया, लेकिन हमारे जैसे निवेशकों की परेशानी का क्या? भविष्य में ऐसा निवेश करने से पहले हम कई बार सोचेंगें.”

हालांकि श्रुति का ख़रीदा फ़्लैट शाहबेरी गांव में नहीं पड़ता, लेकिन किसान नेताओं की उस घोषणा ने उन्हें खासी परेशानी में डाल दिया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि नोएडा के दूसरे गांवों के किसान भी अपनी ज़मीन वापस लेने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगें.

अजनारा के ही प्रॉजेक्ट में निवेश कर चुके राशिद शबान ने इस पूरे विवाद के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया.

बीबीसी से बातचीत में गुस्साए राशिद ने कहा, “हमें अपना पैसा सूद समेत वापस चाहिए. आखिर ये हमारी मेहनत के कमाए पैसे थे, जिससे हमने घर खरीदने का सपना देखा था. लेकिन इस अनिश्चितता के माहौल ने हमें असमंजस में डाल दिया है. राजनीतिज्ञों, बिल्डरों और नोएडा ऑथॉरिटी के फ़र्जीवाड़े में हम मध्यम-वर्गीय लोग फंस चुके हैं.”

बिल्डरों का पक्ष

Image caption नोएडा में अधिग्रहण से नाखुश किसान लगातार विरोध प्रदर्शन करते आ रहे हैं.

नोएडा एक्सटैंशन में रिहायशी इमारते बनाने वाले आम्रपाली ग्रुप के अध्यक्ष अनिल कुमार शर्मा कहते हैं कि निवेशकों को अभी ‘पैनिक बटन’ नहीं दबाना चाहिए.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “इलाहबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद ही हमें पता चल गया था कि हम अपने प्रॉजेक्ट को आगे नहीं बढ़ा पाएंगें. इसलिए शाहबेरी गांव में बन रही हमारी इमारतों पर चल रहा निर्माण कार्य हमने रोक दिया और निवेशकों को ब्याज समेत पैसे लौटा दिए.”

उन्होंने दूसरे क्षेत्रों में निवेश कर चुके निवेशकों को निश्चिंत रहने की सलाह दी, लेकिन ज़्यादातर निवेशकों का कहना है कि इस पूरे विवाद के बाद बिल्डरों पर से उनका भरोसा उठ गया है.

दिल्ली में रहने वाली रेखा भी उन सैंकड़ों लोगों में से एक हैं जो नोएडा एक्सटैंशन में एक फ़्लैट में निवेश कर चुकी हैं.

तौबा-तौबा करते हुए रेखा कहती हैं, “भविष्य में अगर मुझे प्रॉपर्टी में निवेश करना हुआ, तो यूपी में कभी नहीं करूंगी. यूपी का हाल बहुत बुरा है. समझ नहीं आता दोषी किसे ठहराएं.”

इस पूरे विवाद में कहीं किसान पिसा, तो कहीं निवेशक. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले ने किसान को उम्मीद की राह दिखाई है, लेकिन अब सवाल ये है कि देश के दूसरे हिस्सों में भूमि अधिग्रहण को लेकर चल रहे विवाद की दिशा भी क्या इसी राह जाएगी?

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