‘बलात्कार पीड़ितों को जल्द मुआवज़ा देने का आदेश’

दिल्ली हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वो बलात्कार पीड़ितों को वित्तीय मुआवज़ा देने के लिए बनाई गई योजना को छह हफ़्ते के भीतर लागू करे.

दरअसल पिछले साल मार्च में महिला और बाल विकास मंत्रालय ने एक योजना के लिए अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत बलात्कार पीड़ितों को चिकित्सकीय मदद, सलाह और क़ानूनी सहायता के अलावा वित्तीय सहायता दिए जाने का प्रावधान सुझाया गया था.

लेकिन इस योजना को अब तक लागू नहीं किया गया था.

योजना के अमल न होने पर इससे पहले भी कोर्ट ने केंद्रीय और राज्य सरकार को फटकार लगाई थी.

सरकार के वकील ने कोर्ट में कहा कि केंद्र सरकार की ओर से इस योजना को स्वीकृति दी जा चुकी है, लेकिन राज्य सरकार इसे लागू करने के बारे में ‘विचार कर रही है'.

इस योजना के तहत बलात्कार पीड़ित को दो लाख रुपये तक की वित्तीय मदद दी जाएगी.

लेकिन अगर पीड़ित मानसिक रूप से बीमार है या बलात्कार के बाद उसे गर्भ धारण हो जाता है या उसे एचआईवी संक्रमण हो जाता है, तो उसे तीन लाख रुपए तक की वित्तीय मदद दी जाएगी.

इस मुआवज़े पर दावा करने के लिए पीड़ित महिला या युवती को एक एफ़आईआर दर्ज करानी होगी.

हालांकि इस मुआवज़े पर दावा करने के बावजूद भी पीड़ित अदालत में आईपीसी की धारा 357 के तहत मुआवज़े की मांग कर सकती है.

योजना के तहत बलात्कार पीड़ितों को शुरुआती मदद के रूप में 20,000 रुपए दिये जाएंगे, जिसके बाद चिकित्सा और सलाह संबंधी सुविधाओं के लिए उन्हें 50,000 रुपए दिए जाएंगें.

कोर्ट में गवाही देने के बाद ही बलात्कार पीड़ित को बाकी मुआवज़ा मिलेगा.

'पैसा काफ़ी नहीं'

हालांकि कोर्ट के इस आदेश की महिला कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है, लेकिन कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि सिर्फ़ आर्थिक मदद काफ़ी नहीं है.

बलात्कार पीड़ितों की काउंसेलिंग करने वाली ‘जागोरी’ एनजीओ की सुनीता ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “मुझे लगता है कि ये योजना बलात्कार पीड़ितों को तुरंत राहत प्रदान करने में बहुत कामयाब होगी, लेकिन ये नाकाफ़ी है. जब तक हमारी पुलिस और न्याय प्रणाली के रवैये को नहीं बदला जाता, बलात्कार पीड़ितों का मानसिक तनाव कम नहीं हो सकता. सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि गुनाहगार को जल्द से जल्द सज़ा मिले, ताकि पीड़ित को मानसिक राहत मिले.”

साथ ही उनका कहना था कि सरकार योजनाएं तो बहुत सी लागू करती है, लेकिन उसे जनता तक पहुंचाए जाने के लिए उसका ठीक से प्रचार नहीं हो पाता.

उन्होंने कहा, “आज अगर हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ऐसे आदेश न दें, तो हमारे देश का बेड़ा गर्क हो जाए. दूसरी बात ये कि कितनी महिलाएं उनके लिए बनाई गई योजनाओं के बारे में जागरुक हैं? योजनाएं बनाना तो ज़रूरी है ही, लेकिन उनका प्रचार होना भी उतना ही ज़रूरी है.”

मामला

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Image caption महिला कार्यकर्ताओं ने इस योजना का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही ये भी कहा है कि ये नाकाफ़ी है.

दिल्ली महिला आयोग ने साल 1995 में बलात्कार पीड़ितों के लिए पुनर्वास की योजना बनाने का सुझाव सरकार को दिया था, जिस पर केंद्र सरकार ने गौर किया था.

हालांकि इस योजना को लागू करने में सरकार ने काफ़ी ढीलाई बरती, जिसके बाद 2008 में दिल्ली महिला कमिशन ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी.

कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह ने कहा, “एक महिला की इज़्जत के साथ हुए खिलवाड़ की हालांकि कोई भरपाई नहीं हो सकती, लेकिन वित्तीय सहायता दे कर पीड़ित को कुछ राहत दी जा सकती है. मैं दिल्ली सरकार से दरख्वास्त करना चाहूंगी कि वो जल्द से जल्द इस योजना को लागू करे.”

बलात्कार पीड़ितों को हर तरह की मदद प्रदान करने के सुझाव पर पिछले साल वकीलों, महिला कार्यकर्ता और महिला और बाल विकास मंत्रालय ने चर्चा की थी.

इस योजना को लागू करने के लिए एक राष्ट्रीय पुनर्वास और राहत बोर्ड बनाया जाएगा जिसे ज़िला और राज्य के स्तर पर गठित किया जाएगा.

कुछ सालों पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि बलात्कार पीड़ितों के पुनर्वास के लिए सरकार को जल्द ही कोई योजना बनानी चाहिए.

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़ साल 2008 में 21,467 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे और पिछले साल इस मामलों में 3.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली.

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