इतिहास के पन्नों से

वर्ष 1958 में 14 जुलाई के ही दिन इराक़ में हुए तख़्ता पलट से मध्यपूर्व में खलबली मच गई थी जबकि 14 जुलाई, 1991 को इराक़ में कुर्द लोगों की रक्षा करने वाली ब्रितानी सेनाओं ने इलाक़े से वापस लौटना शुरू कर दिया था.

1958: इराक़ में तख्ता पलट

Image caption इराक़ के राजा फ़ैसल द्वितीय की हत्या कर दी गई थी

14 जुलाई को इराक़ में सेना के फौजी अफसरों के एक समूह ने विद्रोह का बिगुल बजाया और राजशाही को सत्ता से हटा दिया.

बग़दाद रेडियो ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि फ़ौज ने इराक़ी लोगों को 'साम्राज्यवाद के ज़रिये सत्ता में आए कुछ भ्रष्ट लोगों' से आज़ादी दिलवा दी है.

इस घोषणा में कहा गया, "आज के बाद इराक़ एक गणतंत्र है जो दूसरे अरब देशों से संबंध बनाए रखेगा."

साथ ही इस बात की भी जानकारी दी गई कि पड़ोसी देश जॉर्ङन मैं तैनात 12,000 इराक़ी सैनिकों को वापस बुलाया जा रहा है.

मेजर जनरल अब्दुल करीम एल क़ासिम इराक़ के नए प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और सेना प्रमुख भी घोषित कर दिए गए.

रेडियो बग़दाद ने राजकुमार अब्दुल इलाह की हत्या की भी घोषणा की.

1991: इराक़ से ब्रितानी फ़ौज की वापसी

Image caption सहयोगी देशों ने कुल 20 हज़ार सैनिक तैनात किए थे

14 जुलाई को ही इराक़ में कुर्द लोगों की सुरक्षा के लिए तैनात ब्रितानी फ़ौज ने अपने देश लौटना शुरू कर दिया था.

ये फ़ौजें पश्चिमी देशों के उस राहत अभियान - ऑपरेशन हैवेन - का हिस्सा थीं जो करीब साढ़े चार लाख कुर्द शरणार्थियों के पुनर्स्थापन के लिए तैनात की गई थीं.

ये कुर्द शरणार्थी उस समय तुर्की की पहाड़ियों में चले गए थे जब इराक़ी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने मार्च महीने में उनके विद्रोह को कुचल दिया था.

उत्तरी इराक़ में उस समय करीब 20 हज़ार सैनिक 13 सहयोगी देशों की ओर से तैनात किए गए थे.

दो दिन पहले यानी 12 जुलाई को अमरीका ने बचे हुए 3,300 सैनिकों को वापस बुलाने का फ़ैसला किया था.

हालांकि कुछ कुर्द नागरिकों ने इस बात पर भय भी जताया है कि पश्चिमी सेनाओं के वापस लौटने के बाद सद्दाम हुसैन की तरफ़ से हिंसक कार्रवाई भी हो सकती है.

इस बीच अमरीकी रक्षा मंत्रालय ने सद्दाम हुसैन को चेतावनी दी कि कुर्द जनसंख्या वाले रिहाइशी इलाक़ों के ऊपर किसी भी इराक़ी वायु सेना के हवाई जहाजों के उड़ने पर निषेध है.

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