भारतीय पत्रकार करते हैं हैंकिग?

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Image caption ब्रिटेन में फ़ोन हैकिंग की वजह से देश के सबसे पुराने अख़बार को बंद करना पड़ा है

ब्रितानी अख़बार ‘न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड’ के बंद होने के बाद भारत में एक बार फिर निजता यानी प्राइवेसी के अधिकार को लेकर बहस शुरू हुई है.

हालांकि ये बात और है कि ब्रिटेन में इसे लेकर जो हंगामा हुआ है, ऐसा आज तक भारत में नहीं दिखा.

निजता के महत्व को लेकर भारत में जागरुकता की कमी क्यों है? पत्रकारों की क्या सीमा है, उन्हें क्या सार्वजनिक करना चाहिए, क्या नहीं, निजी जानकारी क्या है, इस पर फिर वाद-विवाद शुरू हो गया है.

संसद में बिल

सरकार भी इस पर संसद के मॉनसून सत्र में 'राईट टू प्राईवेसी विधेयक' या निजता के अधिकार संबंधी कानून लाने की सोच रही है.

इस विधेयक में किसी के फ़ोन कॉल को टेप करके उसे सार्वजनिक करने पर टेलीकॉम सर्विस प्रोवाईडर के लाइसेंस को भी रद्द किए जाने का प्रावधान है.

इस विधेयक में डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया बनाने की बात की गई है जो ऐसे मामलों की शिकायतों की जाँच कर सके. अवैध जासूसी पर जेल की सज़ा और आर्थिक जुर्माने की सज़ा का भी प्रावधान है. सरकारी अफ़सरों पर भी कानून का कड़ा शिकंज़ा होगा.

लेकिन पत्रकारों का क्या? भारतीय पत्रकारों पर आरोप लगते रहे हैं कि वो सनसनीखेज कहानियों की तलाश किसी की निजता की परवाह नहीं करते. बहाना होता है, पब्लिक इंटरेस्ट, या जनहित.

कुछ महीने पहले तक जैसे स्टिंग ऑपरेशन की बाढ़ सी आ गई थी, चाहे वो तहलका के ऑपरेशन हों, या फिर राजनीतिज्ञ को कैमरे में कैद करना. पत्रकारों का किसी के घर घुस जाना, या वीडियो बनाकर उसे टीवी पर दिखाना जैसे आम हो गया था.

अख़बार लोगों की कॉल डीटेल्स तक छाप दिए जाते हैं.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार अनिरुद्ध बहल की माने तो भारत में ख़ुद पत्रकार निजी जानकारियाँ हासिल करने के लिए पैसे नहीं देते, उन्हें उनके सूत्र जानकारियाँ देते हैं.

वो कहते हैं, ‘भारत में पत्रकारों के फ़ोन हैकिंग करवाने जैसी कोई बात नहीं है. यहाँ पत्रकार नीरा राडिया जैसे जो भी टेप सार्वजनिक हुए, उनकी रिकॉर्डिंग सरकारी एजेंसियों ने की थी’

वो कहते हैं कि जिस तरह ब्रिटेन में टैबलॉयड्स ने भ्रष्टाचार को लेकर कहानियाँ छापी हैं, उससे वहाँ पारदर्शिता आई है और भारत में निजता संबंधी कानून का इस्तेमाल भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए नहीं होना चाहिए.

भारत में हैकिंग?

लेकिन सालों से मुंबई के अपराध जगत पर रिपोर्ट कर रहे एक पत्रकार ने अपना नाम नहीं लिए जाने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि वो ऐसे पत्रकारों को जानते हैं जो निजी जाँचकर्ताओं की मदद लेकर ईमेल और फ़ोन हैक करवाते हैं, हालाँकि ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम है.

उन्होंने बताया, "कई बार मीडिया कंपनियाँ पत्रकारों को पैसे देती हैं ताकि वो घूस देकर निजी जानकारियाँ हासिल करें. बाज़ार में भारी स्पर्धा के कारण पत्रकारों पर दबाव रहता है."

मुंबई में टैबलॉयड के चलन की वजह से वहाँ भारी प्रतिद्वंदता है.

इस बारे में पत्रकार निजी जासूसों से भी संपर्क करते हैं.

निजी जासूसों से बात करें तो वो आपको बताएँगे कि पैसे की भाषा कुछ भी करवा सकती है. एक का कहना था कि उनके जान-पहचान के लोग टेलीकॉम कंपनियों और सरकारी एजेंसियों में रहते हैं जो पैसे के बदले फ़ोन टैपिंग से लेकर ईमेल हैकिंग तक करते हैं लेकिन ऐसे काम बेहद गुप्त तरीके से किया जाता है ताकि आप कहीं सरकारी रडॉर पर ना आ जाएं.

इंडियन डिटेक्टिव एजेंसी के संजय सिंह कहते हैं, "हमारे पास फ़ोन हैकिंग को लेकर कई बार लोग आते हैं, लेकिन सरकारी कानूनों की वजह से हम ऐसा नहीं करते. बाज़ार में ऐसे ढेरों सॉफ़्टवेयर हैं जिनसे आप मोबाईल को क्लोन कर सकते हैं, आप बातचीत सुन सकते हैं, लेकिन उसके लिए उस मोबाईल का हाथ में आना ज़रूरी है. ऐसे सॉफ़्टवेयर 25,000 से 50,000 रुपए में उपलब्ध हैं."

संजय कहते हैं कि किसी और का फ़ोन हैक़ करने के लिए महंगे उपकरण चाहिए, जो सरकारी एजेंसियों के पास ही होते हैं.

लेकिन ब्रिटेन की तरह भारत में निजता के अधिकार को लेकर इतना हो-हल्ला क्यों नहीं है?

समाजशास्त्री इम्तियाज़ अहमद कहते हैं भारत में इसे लेकर जागरुकता नहीं है, और कई लोगों को इस बारे में परवाह नहीं है, उस वक्त तक जब तक इसका उनके जीवन पर असर नहीं पड़ता.

हालांकि रतन टाटा ने इस बारे में उच्चतम न्यायालय गए हैं, और अदालत ने भी निजता के अधिकार पर बल दिया है, लेकिन ऐसा लगता है कि लोगों की मानसिकता बदलने में वक्त लगेगा.

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