'नेता सुरक्षित हैं, जनता का ध्यान किसे'

  • 14 जुलाई 2011
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Image caption दक्षिणी मुंबई के ओपेरा हाउस इलाक़े में धमाके के एक दिन बाद पसरा सन्नाटा

13 साल के दिनेश का पाँव काटना पड़ा है, 42 साल के बाबूराव दास का भी दाहिना पाँव काटना पड़ा है, 22 वर्षीय शाह साहिल मनूभाई के सीने में चोट लगी है, 48 साल के राम नारायण शुक्ला के सिर पर चोट लगी है, और उन्हें ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है, 35 साल के बाबूराम यादव के शरीर के कई हिस्से जल गए हैं.

ये उन कछ लोगों के नाम हैं जो मुंबई के सैफ़ी अस्पताल में भर्ती हैं. बुधवार को मुंबई में हुए धमाकों में घायल लोगों को 13 अस्पतालों में भर्ती किया गया है.

बाहर तेज़ बारिश हो रही थी, अस्पताल भी ठसाठस भरा हुआ था. बाहर देखें तो लग रहा है मुंबई में हमेशा की तरह एक बार फिर ज़िंदगी पटरी पर लौट आई है, लेकिन अस्पताल के बाहर घायलों के परिजन डरे हुए हैं. कुछ के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे कि उनकी जान-पहचान के व्यक्ति की हालत बेहतर है, कुछ अपने रिश्तेदारों की हालत पर ख़ासे परेशान थे.

अस्पताल के चारों ओर पुलिस की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था है. पत्रकारों को पास भी फटकने नहीं दिया जा रहा.

बाहर तेज़ बारिश, अंदर पुलिस. आखिर जाएँ तो कहाँ जाएँ.

अब क्या फ़ायदा

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Image caption समीर जावड़े के चाचा धमाके में घायल हो गए हैं

बहुत मुश्किल से समीर जाबडे से बात हो पाई. उनके चाचा 43-वर्षीय संतोष भी अस्पताल में भर्ती हैं. वो ओपेरा हाउस में काम करते थे. शीशे के टुकड़ों ने शरीर के कई जगहों पर घाव कर दिए है. लेकिन अब उनकी हालत बेहतर है.

22 साल के साहिल की माँ भी अस्पताल के बाहर, साहिल के दोस्तों के साथ मौजूद थी. उनके चेहरे पर परेशानी के भाव तो थे, लेकिन फिर भी चिंतित थीं. साहिल की तबीयत सुधर रही है.

अस्पताल में अंदर जा रहे एक व्यक्ति को जब पुलिस ने रोका, तो उसने कहा,"जब सुरक्षा व्यवस्था करनी चाहिए थी, तब तो की नहीं, अब करने से क्या फ़ायदा."

पानी में भीगते, हम अस्पताल से थोड़ी दूर स्थित ओपेरा हाउस जा पहुँचे.

हीरे के व्यापार के लिए प्रसिद्ध इस जगह पर भीड़ तो थी, लेकिन दुकानों के शटर बंद हैं. पता चला दुकानदारों ने कल भी दुकानें बंद रखने का फ़ैसला किया है.

गाडियों से भरी रहने वाली सड़कें आज खाली थीं. बारिश से बचने के लिए लोग छोटे-छोटे गुटों में बरसाती या फिर किसी छाया के नीचे बात कर रहे थे.

हर कोई जैसे बहुत कहना चाहता था. सिर्फ़ विषय छेड़ने की देर थी.

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Image caption अस्पतालों के बाहर घायलों के चिंतित रिश्तेदार

सुरक्षा का सवाल

तो क्या आप लोग खुद को सुरक्षित समझते हैं?

एक ने कहा,"सब नेता सुरक्षित हैं, उनका परिवार सुरक्षित है. उनकी लाल गाड़ी सुरक्षित है. जनता का किसे ध्यान है. आदमी की तो कोई कीमत नहीं है. अमरीका में कुछ होता है तो पूरी सरकार ज़िम्मेदार लोगों के पीछे लग जाती है. यहाँ तो लोग कीड़े-मकोड़े की तरह मर जाते हैं. कल की बात खत्म. फिर नई बार शुरू. हम देखेंगे, करेंगे, सोचेंगे. बस."

एक दूसरे व्यक्ति ने कहा,"जहाँ पुलिस स्टेशन हुआ करता था, वहाँ वड़ा पाव की दुकान खोल दी गई. पुलिस चौकी बंद हो गई, वड़ा पाव की बिक्री शुरू हो गई. तो क्या सुरक्षा होगी हमारी?"

बहस यहाँ तक पहुँची कि लोगों में आपस में ही तीखी बहस शुरू हो गई. किसी ने कहा - जैसी प्रजा, वैसे राजा.

ऐसा लगा लोग बेहद उलझ़े हुए हैं. उन्हें पता ही नहीं कि क्या हो रहा है, और किसे ज़िम्मेदार ठहराएँ. कोई सुनने वाला तो है नहीं? वायदों की भी एक सीमा होती है.

किसकी ज़िम्मेदारी

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Image caption मुंबई डायमंड एसोसिएशन के जयेश लब्धी पूछते हैं कि ऐसी घटनाएँ होती रहीं तो ज़िम्मेदारी कौन लेगा

मुंबई डायमंड एसोसिएशन के जयेश लब्धी अभी हाल में ही अपने एक मृत साथी के परिवार से मिलकर आए थे.

जयेश ने कहा,"निर्दोष लोग मर रहे हैं. आज मैं अपने समाज के एक व्यक्ति के परिवार से मिलकर आया. वो सिर्फ़ रो रहे थे. अगर सरकार कार्रवाई नहीं कर सकती तो ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी. इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा."

जयेश कहते हैं कि 70 हज़ार करोड़ की कुल बिक्री होने के बावजूद पुलिस से हमें कोई सुरक्षा नहीं मिल रही है. अवैध पार्किंग ने स्थिति को खराब किया है.

मुंबई में लोगों से बात करने से लगता है, लोग गुस्सा तो हैं ही, लेकिन उन्हें ये भी समझ में नहीं आ रहा है कि वो करें तो क्या करें. हमले झेलना जैसे उसकी नियति बन गई है.

टीवी पर एक पत्रकार ज़ोर-ज़ोर से मुंबई में रहने वाले लोगों के साहस की तारीफ़ कर रहा था, कि वो किसी भी स्थिति में हारते नहीं हैं और उनकी ज़िंदगी जारी रहती है. साथ खड़े एक साथी पत्रकार ने झल्लाकर कहा, आखिर हम करें भी तो क्या?

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