धमाकों का असर बीमा कंपनियों पर भी

  • 15 जुलाई 2011
मुंबई धमाका(जूलाई 2011)
Image caption मुबई का ज़वेरी बाज़ार कई बार चरमपंथी हमलों का शिकार बन चुका है.

बुधवार को मुंबई में हुए धमाकों के बाद भारतीय बीमा कंपनियों को डर है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उनकी छवि को धक्का लग रहा है, और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से उन्हें बीमा लेने के लिए दी जाने वाली क़िस्त महंगी हो सकती है.

दरअसल सितंबर 2001 में अमरीका में हुए धमाकों के बाद भारत में एक आतंकवाद पूल बनाया गया था.

मक़सद था कि जो जायदाद आतंकी हमलों में तबाह हो गई हैं, उनके नुक़सान की भरपाई करने की कोशिश करना.

लेकिन बुधवार को मुंबई में हुए धमाके जैसे बढ़ती आतंकी घटनाओं से भारतीय बीमा कंपनियों को लग रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

वर्ष 2008 में मुंबई में हुए चरमपंथी हमले में ट्राईडेंट और ताजमहल होटलों को भारी नुक़सान हुआ था और उन्हें इस आतंकवाद पूल से क़रीब 500 करोड़ रुपए दिए गए थे.

दरअसल वर्ष 2001 में अमरीका में हुए हमले के बाद बड़ी विदेशी री-इंश्योरर्स कंपनियों ने भारत छोड़ दिया था.

'आतंकवाद पूल'

मोटे शब्दों में कहा जाए तो रि-इंश्योरर्स कंपनियों का मतलब वो कंपनियां हैं जो बीमा कंपनियों का भी बीमा करती हैं. इन विदेशी कंपनियों के भारत से बाहर जाने पर सरकार ने जनरल इंश्योरंस कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया या जीआईसी के नेतृ्त्व में भारतीय आतंकवाद पूल की स्थापना की.

उस वक़्त ये प्रावधान था कि अगर किसी संपत्ति को किसी आतंकवादी घटना से नुक़सान होता है तो एक छोटी सी क़िस्त के बदले उसे 200 करोड़ रूपए तक की भरपाई कर दी जाएगी.

इस रक़म को बढ़ाकर अब 750 करोड़ रुपए कर दिए गए हैं. लेकिन अब जीआईसी के सीएमडी योगेश लोहिया का कहना है कि बढ़ती आतंकी घटनाओं से उनके लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं. जीआईसी इस पूल का मैनेजर है.

उनका कहना है, ''अंतरराष्ट्रीय री-इंश्योरेंस कंपनियों के दिमाग़ में ये ज़रूर आता है कि भारत में लगातार आतंकी घटनाएँ हो रही हैं. तो भारत के बारे में उनका नज़रिया बदलेगा. जब हम बड़े ख़तरों के बीमा के लिए बाहर जाएंगे, और रि-इंश्योरर्स से ख़तरे के बीमा के लिए बात करेंगे, तो उनकी क़िस्तें बढ़ जाएंगी और हमें बड़ी क़िस्त देनी पड़ेगी.''

Image caption जीआईसी के सीएमडी का कहना है कि चरमपंथी हमलों से भारतीय बीमा कंपनियों को काफ़ी नुक़सान हो सकता है.

योगेश लोहिया का कहना था कि बढ़ती आतंकी घटनाओं से लोगों में टेरर इंश्योरेंस या आतंकवाद बीमा के प्रति जागरुकता बढ़ी है. वो कहते हैं कि अगर किसी घर की क़ीमत एक लाख रुपए है तो उसे इस बीमे के लिए हर साल मात्र 10 रुपए देने होते हैं.

अभी इस पूल में जमा राशि 1700 करोड़ रुपए के आसपास तक पहुँच गई है.लेकिन यहाँ ये बता दें कि ये बीमा किसी एक संपत्ति पर हुए नुक़सान के लिए ही है.

इसलिए ओपेरा हाउस जैसी जगहों में लोगों को सलाह दी गई थी कि वो संपत्ति को एक जगह इकट्ठा होने की बजाए उसे फ़ैला कर रखें.वहाँ एक-एक इमारत में अनुमान है कि हज़ारों करोड़ों का व्यापार होता है जबकि एक संपत्ति पर बीमा मात्र 750 करोड़ का ही है.

बाज़ार में एक बात ये भी है कि मुंबई में हुए धमाकों की वजह से बीमे की किस्त में भी इज़ाफ़ा हो सकता है, लेकिन लोहिया इससे इंकार करते हैं क्योंकि इस धमाके में संपत्ति का बहुत नुक़सान नहीं हुआ है.

उधर आईसीआई लोंबार्ड के रिस्क और रिइंश्योरंस के प्रमुख राजीव कुमारास्वामी का भी कहना है कि पूल के सामर्थ्य के बाहर के ख़तरों को कवर करने के लिए जब कंपनियाँ बाहर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार जाएंगी तो वहाँ भी शुल्क बढ़ सकते हैं.

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