'उद्योग आएं मगर खेती की ज़मीन पर नहीं'

छत्तीसगढ़
Image caption छत्तीसगढ़ में ज़्यादातर उद्योग खेतिहर ज़मीन पर लग रहे हैं.

चांपा-जांजगीर ज़िले के डबरा ब्लाक का सिंघीतेराई गाँव बस अब कुछ ही दिनों का मेहमान है.

इस इलाके में सिर्फ सात किलोमीटर के दायरे में नौ संयंत्र आ रहे हैं जिनमें इस्पात और विद्युत संयंत्र शामिल हैं.

लगभग 1300 हेक्टेयर ज़मीन का अधिग्रहण किया जा चुका है और कुछ के अधिग्रहण का काम चल रहा है.

जहाँ ज़मीन अधिग्रहित की जा चुकी हैं वहां बड़े बड़े बुलडोज़रों ने इलाकों को समतल कर दिया है. अब सिंघीतेराई गाँव की बारी है.

मगर अब लोग इन संयंत्रों का विरोध कर रहे हैं. वह अपनी ज़मीन नहीं देना चाहते.

उनका कहना है कि इस इलाके में ज़्यादातर ज़मीन खेतिहर है इसलिए वह अपनी आजीविका के लिए इन खेतों पर ही आश्रित हैं.

पीढ़ी दर पीढ़ी वह इन खेतों के सहारे अपना पेट पालते आ रहे हैं. पहले निजी कंपनियों ने औने-पौने दामों में ज़मीनों को खरीदा मगर अब छत्तीसगढ़ की सरकार ने ज़मीन का खुद ही अधिग्रहण करना शुरू कर दिया है.

औद्योगिकीकरण की आंधी

अब सरकार ज़मीन अधिग्रहित कर उसे निजी कंपनियों को दे रही है.

सरकार का तर्क है कि पहले कंपनियां कम दामों में ज़मीन खरीदती थीं. सरकार की नई भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास नीति के तहत किसानों को साल में दो फसल देने वाली खेतिहर ज़मीन के प्रति एकड़ दस लाख रूपए देने का प्रावधान किया गया है.

यूँ कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में औद्योगिकीकरण की आंधी चल रही है. राज्य सरकार ने सूबे में इस्पात और विद्युत संयंत्रों के लिए कई सौ कंपनियों के साथ साझा क़रार पर हस्ताक्षर किए हैं.

इनमें ज़्यादातर इस्पात और विद्युत संयंत्र राज्य के रायपुर, रायगढ़, कोरबा और चांपा-जांजगीर ज़िले में या तो स्थापित किए जा चुके हैं या फिर प्रस्तावित हैं.

जहाँ यह संयंत्र लगे हैं वहां भी ज़मीन के अधिग्रहण को लेकर काफ़ी विवाद चल रहा है.

कई नए इलाकों में ज़मीन अधिग्रहण का काम जारी है और उसका व्यापक विरोध भी हो रहा है.

पहले कंपनियाँ कम दाम में ज़मीन लिया करतीं थीं. अब छत्तीसगढ़ की सरकार ने खुद ही ज़मीन अधिग्रहण करने का काम शुरू किया है. लेकिन ज़मीन अधिग्रहण के सवाल पर अब भी लोगों का विरोध जारी है.

सरकार की पुनर्वास नीति के बावजूद ग्रामीण अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि खेतिहर ज़मीन पर उद्योग नहीं लगने चाहिए.

अधिग्रहण का विरोध

सिंघीतेराई के खिलेश जयसवाल का कहना है कि कंपनियों ने करार के बाहर जाते हुए आवश्यकता से अधिक ज़मीन का अधिग्रहण करना शुरू कर दिया है.

मिसाल के तौर पर उन्होंने बताया कि एक 1400 मेगावाट की विद्युत इकाई के लिए एक कंपनी ने सरकार के साथ करार किया.

करार के तहत यह संयंत्र सिर्फ दो जगहों की ज़मीन पर खोला जाना था. ये इलाके हैं डभरा के उच्चपिंडा और बंदापाली.

मगर कंपनी ने ‘एनवायरमेंट इंमैक्ट एसेसमेंट’ रिपोर्ट के बाहर जाते हुए घिगरा, ढिमरी, केक्राभर और धोबिपाली में भी ज़मीन का अधिग्रहण किया है.

यह विद्युत इकाई 5950 करोड़ रूपए की लागत से बनाई जा रही है. जानकार बताते हैं कि कंपनी ने जो करार सरकार के साथ किया था वह मात्र 1200 मेगावाट की इकाई के लिए था.

Image caption इस गाँव की ज़मीन के अधिग्रहण का काम पूरा हो चूका है. अब किसी भी रोज़ यह गाँव उजड़ जाएगा.

इस इकाई की वजह से 644 परिवार प्रभावित हो रहे हैं.

जायसवाल कहते हैं, ''कुछ लोगों ने पैसा लिया और उनकी ज़मीन का अधिग्रहण हुआ. मगर कुछ गाँव वालों ने इसको लेकर अदालत का दरवाज़ा भी खटखटाया है. हमें सुरक्षा चाहिए. जो लोग ज़मीन नहीं देना चाहते हैं उन्हें आतंकित किया जा रहा है."

'ज़मीन हमारी सुरक्षा है'

वहीं इलाके के जाने माने समाज सेवी एपी जोशी का कहना है कि शुरू में पैसों के लालच में कुछ ग्रामीणों ने अपनी ज़मीनें बेचीं. मगर बाद में जब उनके पैसे ख़त्म हुए तो उनकी आँखें खुलीं.

बीबीसी से बात करते हुए वह कहते हैं, "पैसे आते ही इन ग्रामीणों ने महंगी कारें खरीदीं. मगर यह सब कुछ ही दिनों तक रहा. पैसे तो पेट्रोल की तरह उड़ गए. अब इनकी आँखें खुली हैं."

जोशी और उनके साथ इस इलाके के सैकड़ों ग्रामीण जो सिंघीतेराई की चौपाल में जमा थे कहते हैं कि खेतिहर ज़मीन उनकी आजीविका का एक मात्र सहारा है. कई पीढ़ियों से यह लोग इसी पर निर्भर हैं.

गाँव के सरपंच का कहना है कि सरकार को चाहिए कि सिर्फ बंजर ज़मीन को ही उद्योगों को दिया जाए न कि खेतिहर ज़मीनों को.

यही वजह है कि अब यह लोग सामूहिक रूप से ज़मीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं.

जयसवाल कहते हैं, "हमें पैसे नहीं चाहिए. पैसे किसी के पास नहीं टिकते. ज़मीन हमारी सुरक्षा है. ज़मीन हमारा सहारा है. उद्योग आएं मगर खेती वाली ज़मीन पर नहीं."

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