खेतों को निगलते कारखाने

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Image caption खेतिहर ज़मीन पर औद्योगीकरण का दबाव बढ़ता जा रहा है

छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने विभिन्न कंपनियों के साथ लगभग 115 एमओयू यानी साझा करार पर हस्ताक्षर किए हैं.

इसके तहत 746 छोटी और बड़ी परियोजनाएँ हैं इन परियोजनाओं में एक लाख 76 हज़ार 193 करोड़ रूपए के निवेश की बात कही जा रही है.

हजारों एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया जा चुका है और हज़ारों एकड़ और बाकी हैं. राज्य के रायपुर, चांपा-जांजगीर, कोरबा, जशपुर और रायगढ़ जिलों में बड़े पैमाने पर ज़मीन के अधिग्रहण का काम चल रहा है.

'उद्योग आएँ मगर खेतिहर ज़मीन पर नहीं' छत्तीसगढ़ की इस्पात और विद्युत उत्पादन की प्रस्तावित क्षमता पूरे भारत के बराबर हो जाएगी. यहाँ पर जिस तरह उद्योग लग रहे हैं उससे भारत में विद्युत उत्पादन की कुल क्षमता का 77 प्रतिशत उत्पादन छत्तीसगढ़ में होगा. फिलहाल जिस हिसाब से इस्पात संयंत्र लग रहे हैं, कोशिश की जा रही है कि छत्तीसगढ़ में स्पंज आयरन के उत्पादन की क्षमता 31 मिलियन टन तक पहुँच जाए. पहले ज़मीनें खुद उद्योग के मालिक ख़रीदा करते थे अब इनका अधिग्रहण सरकार कर रही है और फिर ज़मीन को उद्योगों को लीज़ पर दे रही है.

सरकार ने ज़मीन अधिग्रहण और पुनर्वास की नई नीति बनाई है जिसके तहत बंजर ज़मीन के मालिक को प्रति एकड़ 6 लाख, एक फसल देने वाली ज़मीन के लिए प्रति एकड़ 8 लाख और दो फसलें देने वाली ज़मीन के लिए 10 लाख रूपए प्रति एकड़ की दर तय की गई है. आरोप लग रहे हैं कि फैक्ट्रियां लगाने की इस होड़ में सारे कानून ताक पर रख दिए गए हैं. कंपनियाँ करार की शर्तों से बाहर जाकर ज़मीन का अधिग्रहण कर रही हैं या फिर उन इलाकों में जो संविधान की पांचवीं अनुसूची में आते हैं, आदिवासियों की ज़मीन भी उद्योग धड़ल्ले से ले रहे हैं.

नियमों की अनदेखी

पाँचवी अनुसूची के इलाकों में किसी आदिवासी की ज़मीन ग़ैर-आदिवासी को न बेची जा सकती है और न ही स्थानांतरित की जा सकती है मगर इसके इसके बावजूद इन आदिवासियों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा होता चला जा रहा है.

उद्योग इसके लिए नए तरीके अपना रहे हैं. इसकी ताज़ा मिसाल है चांपा-जांजगीर में एक बड़े उद्योग समूह का विद्युत संयंत्र. राज्य सरकार नें भारी विरोध के बाद वीडियोकॉन कंपनी के 1200 मेगावाट वाले इस प्रस्तावित संयंत्र के लिए ली गई ज़मीन को वापस करने का निर्देश देते हुए मामले की जाँच की बात कही है.

इस कंपनी ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी गृह मंत्री ननकीराम कँवर के बेटे को अपना जनसंपर्क अधिकारी बना दिया है. मंत्री के पुत्र संदीप कँवर ने आदिवासियों की ज़मीन को खरीदना शुरू कर दिया और फिर उसके कंपनी के नाम से स्थानांतरित कर दिया.

विरोध के बाद सरकार ने न सिर्फ आदिवासियों की ज़मीन की वापसी के आदेश दिए हैं बल्कि जांजगीर-चांपा के कलक्टर ब्रजेश चंद्र मिश्र मामले की जांच भी कर रहे हैं.

ज़मीन के अधिग्रहण के खिलाफ छत्तीसगढ़ में सामाजिक संगठन गोलबंद होकर आंदोलन करते आ रहे हैं. उनका आरोप है कि कानून को ताक पर रखकर किसानों की ज़मीनें या तो छल से या फिर बल से अधिग्रहित की जा रही हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता रघुवीर प्रधान कहते हैं कि अब राज्य सरकार की नई नीति के बाद भू-अर्जन का काम ज़बरदस्ती किया जा रहा है. प्रधान कहते हैं, "जो ज़मीन नहीं देना चाहते हैं उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है. कुछ लोग अदालत गए हैं मगर जो गरीब ग्रामीण तहसीलदार के कार्यालय नहीं जा सकता है, जो कलक्टर के पास नहीं जा सकता है. वह अदालत में मामले कैसे लडेगा? आने वाले दिनों में इस इलाके में सिर्फ खंडहर ही नज़र आएँगे". रघुवीर प्रधान की तरह ही एक लंबे अरसे से ज़मीन अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष कर रहीं सविता रथ मानती हैं कि सशक्त कानून के अभाव में ही छत्तीसगढ़ की संपदा की लूट मची हुई है.

रोज़गार नहीं

सविता कहती हैं कि ज़मीन हथियाने के लिए पूंजीपति हर हथकंडा अपनाते हैं. "अब जो ज़मीन नहीं देना चाहता तो उसके खेत में गरम-गरम राख डाल दी जाती है डंपरों से. उसे आतंकित किया जाता है. झूठे मुक़दमों में फंसाया जाता है. जब ग्रामीणों के जीने के सब संसाधनों को छीन लिया जाता है तो वह अपनी ज़मीन को औने-पौने में बेचने पर मजबूर हो जाता है."

प्रधान और रथ का आरोप है कि स्थानीय प्रशासन नागरिकों के हित की रक्षा करने के बजाए कारपोरेट घरानों के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं. उद्योगों का हमेशा यह तर्क रहा है कि वह स्थानीय लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराएँगे मगर रायगढ़ के जिला रोज़गार कार्यालय में पंजीकृत 80 हज़ार बेरोजगार नौजवानों के लिए किसी भी उद्योग से कोई बुलावा नहीं आया.

गंभीर बात यह है कि इस इलाके में जिंदल संमूह का पहला उद्योग वर्ष 1990 के आस पास आया था. उसके बाद से उद्योगों की लाइन लग गई. मगर रायगढ़ का जिला रोज़गार कार्यालय दो दशकों से इस इंतज़ार में है कि उद्योगों से स्थानीय युवकों के लिए नौकरी का बुलावा आए, मगर ऐसा नहीं हुआ.

छत्तीसगढ़ में उद्योग लगाना कितना आसान काम है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पुष्प स्टील एंड माइन्स कंपनी का गठन 2 जून 2004 को हुआ. उसी दिन उसने लौह अयस्क के खनन के लिए आवेदन दिया और उसी दिन कंपनी के प्रस्ताव को राज्य सरकार नें केंद्र को भेज दिया.

साल भर के अंदर कंपनी को लौह अयस्क के खनन की अनुमति भी मिल गयी और छह महीनों के अंदर कंपनी ने छत्तीसगढ़ की सरकार से 300 करोड़ रूपए के स्पंज आयरन की इकाई के लिए करार भी कर लिया. नए क़ानून का इंतज़ार मगर अब राज्य के कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू कहते हैं कि सरकार अब एक ऐसा कानून लेकर आ रही जिसके तहत खेतिहर ज़मीन का इस्तेमाल उद्योग लगाने के लिए नहीं किया जाएगा.

साहू ने बीबीसी से बात करते हुए कहा,"यहाँ की अर्थव्यवस्था की धड़कन यहाँ की कृषि और किसान हैं. अगर किसान अपनी खेतिहर ज़मीन उद्योग के लिए दे देगा तो जियेगा कैसे. हम चाहते हैं कि उपजाऊ ज़मीन खेती के लिए ही बची रहे. हम ऐसा कानून ला रहे है जो हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र में लागू है जिसके तहत कृषि की ज़मीन पर उद्योग लगाने पर रोक होगी." इससे पहले छत्तीसगढ़ की विधानसभा ने इस आशय का एक संकल्प पारित किया था जिसे सरकार नें स्वीकार भी कर लिया था. साहू कहते हैं कि इसी संकल्प के बाद सरकार खेतिहर ज़मीन को बचाने के लिए कानून लाने पर विचार कर रही है. सरकार के इस कानून का सबको बेसब्री से इंतज़ार है. खास तौर पर उन हजारों ग्रामीणों को जिनकी ज़मीनों का जबरन अधिग्रहण कर लिया गया है और उन्हें मुआवज़े के रूप में न तो नौकरी मिली न ही फूटी कौड़ी. छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2010-11 में सर्वाधिक चावल उत्पादन के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वाले राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया है.

यह पुरस्कार मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 16 जुलाई को नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हाथों लिया. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर इसी तरह खेतिहर ज़मीन उद्योग लगाने के लिए अधिग्रहित की जाती रही तो वह दिन दूर नहीं जब धान के कटोरे के किसानों के हाथों में सिर्फ कटोरा ही बच जाएगा, वह भी खाली.

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