शहरों में पांव पसारता भारत

  • 18 जुलाई 2011
शहरीकरण
Image caption आज तीन भारतीय में से एक भारतीय नगरों और महानगरों में रहने लगा है.

भारत के जनसंख्या आयोग ने 15वीं जनगणना के दूसरे दौर के जो आंकडे़ जारी किए हैं उनके मुताबिक भारत तेज़ी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है.

आज तीन भारतीय में से एक भारतीय शहरों और कस्बों में रहने लगा है.

2001 आंकडों के अनुसार तक भारत की आबादी का 27.81 प्रतिशत हिस्सा शहरों में रहता था पर 2011 तक इनकी तादाद बढ़कर 31.16 प्रतिशत तक पहुँच गई.

ऐसा नही है कि शहरीकरण का ये दौर अचानक बढ़ा है. 1991 में 25.71 फ़ीसदी लोग शहरों में थे और दस साल पहले यानि 1981 में ये आंकड़ा 23.34 फ़ीसदी का था. पर शहरीकरण की ये दर ज़रूर बढ़ी है.

1991-2001 में शहरीकरण की दर 2.10 फ़ीसदी थी, 2001-2010 में ये दर बढ़कर 3.35 फ़ीसदी तक पहुँच गई.

इस दौरान देश में 2775 शहर और कस्बे और बस गए हैं. 2001 की जनगणना में शहर-कस्बों की कुल संख्या 5161 थी, जो अब बढ़ कर 7936 हो गई है.

इन आंकड़ो से साफ़ है कि भारत में आबादी तेज़ी से सुविधासंपन्न आबादी में तब्दील होती जा रही है.

हालांकि एक वर्ग इसका विरोधी भी है, लेकिन विकास का जो वैश्विक मॉडल पूरी दुनिया में इस समय चल रहा है, उसमें शहरीकरण को तरजीह दी गई है.

विकास का पैमाना

विशेषज्ञो का मानना है कि अगर इसे विकास के पैमाने के तौर पर देखा जाए तो ये अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत हैं. लेकिन बढ़ते शहरीकरण की वजह बहस का विषय हैं क्योंकि इसमें पलायन और गांवों में बुनियादी सुविधाओं का न होना जैसे मुद्दे शामिल हैं.

इस बीच, दुनिया में तेज़ी से हो रहे शहरीकरण के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ की हालिया रिपोर्ट के दो आंकड़े गौर करने योग्य हैं.

पहला यह कि इस वर्ष के अंत तक विश्व की आधी आबादी शहरों में रहने लगेगी. दूसरा यह कि 2050 तक हिंदुस्तान की आधी आबादी महानगरों, नगरों एवं कस्बों में निवास करेगी और तब तक विश्व स्तर पर शहरीकरण का आंकड़ा 70 प्रतिशत पर पहुंच चुका होगा.

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