ताक़त जिसकी, ज़मीन भी उसकी

  • 19 जुलाई 2011
Image caption ज़मीन अधिग्रहण को लेकर लोगों के हक की बात करने वाले अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.

रायगढ़ के सुदूर इलाकों में बड़े-बड़े डंपर और ट्रक पावर प्लांटों के लिए कोयला लेकर आते-जाते रहते हैं.

इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के विस्तार का काम ज़ोर-शोर से चल रहा है. कहीं इनका विस्तार तो कहीं नए संयंत्र का आगमन.

इस पूरे इलाके में ज़मीन अधिग्रहण का काम ऐसे चल रहा है मानो यह किसी युद्ध की तैयारी चल रही हो. रायगढ़ के सुदूर इलाकों में रह रहे लोग ज़मीन अधिग्रहण को लेकर हो रही जनसुनवाईयों में अपना विरोध दर्ज कराते आ रहे हैं. एक लंबे अरसे से पर्यावरण के संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल और उनके सहयोगी हरिहर पटेल जेल में हैं. उनपर मानहानि और धमकी देने जैसे मामले एक कंपनी की ओर से दर्ज कराए गए हैं.

छोटी-छोटी धाराओं में भी रमेश अग्रवाल को न तो ज़िला न्यायलय से बेल मिली ना उच्च न्यायालय से.

'जबरन ज़मीन हथियाने वाले उद्योग'

यह मामला इनके खिलाफ़ पिछले साल के मई महीने में दर्ज किया गया था जब जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड की ओर से किए जा रहे अपने इस्पात संयंत्र के विस्तार के लिए जनसुनवाई आयोजित की गयी थी. इस जनसुनवाई के एक साल के बाद रमेश अग्रवाल और हरिहर पटेल को मई 2011 में गिरफ्तार किया गया. इन दोनों पर आरोप है कि इन्होंने जन सुनवाई के दौरान कंपनी के अधिकारियों को धमकाया.

उच्च न्यायालय की ओर से रमेश अग्रवाल की ज़मानत की याचिका ख़ारिज कर दिए जाने के बाद अब इनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गयी है. रमेश अग्रवाल और हरिहर पटेल की गिरफ्तारी को लेकर सामाजिक संगठनों ने लामबंद होना शुरू कर दिया है.

13 जुलाई को दो हज़ार से भी ज़्यादा सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने रायगढ़ में प्रदर्शन किया.

इसके बाद उन्होंने ज़िले के कलेक्टर को ज्ञापन भी दिया जिसमें रमेश अग्रवाल और हरिहर पटेल की बिना शर्त रिहाई की मांग की गयी. सामाजिक संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता आक्रोश में हैं. उनका मानना है कि जिस तरह रमेश अग्रवाल और हरिहर पटेल के खिलाफ मामला दर्ज किया गया उससे एक बात तो साफ़ हो गयी है कि "जबरन ज़मीन हथियाने वाले उद्योग" सरकारी संरक्षण में "मनमानी" कर रहे हैं.

'कोई कार्रवाई नहीं हुई'

संगठनों का आरोप है कि जब कोई इन कंपनियों की मनमानी के खिलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ़ झूठे मामले दर्ज किए जाते हैं. इन संगठनों का कहना है कि कंपनी के आरोपों पर सरकार ने सामाजिक कार्यकर्ताओं पर मामला दर्ज किया है.

मगर जब सामाजिक संगठनों के कार्यालयों और कार्यकर्ताओं पर कंपनियों के गुंडे हमला करते हैं तो उनपर कोई कर्रवाई नहीं होती है.

सामाजिक कार्यकर्ता सविता रथ का कहना है, "कई बार रमेश अग्रवाल, राजेश त्रिपाठी और हमपर कंपनी के गुंडों ने हमले किए. इन हमलों की बाबत संबंधित थानों में केस भी दर्ज किया गया है. मगर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई." सविता कहती हैं कि कुछ दिनों पहले कुछ असामाजिक तत्वों ने उनके कार्यालय पर हमला किया था उस सिलसिले में अभी तक किसी को गिरफ्तार करना तो दूर पूछताछ के लिए भी नहीं बुलाया गया.

सविता कहती हैं, "जिस गाड़ी से हमारे ऊपर हमला हुआ था वह गाड़ी झारखण्ड की थी. बाद में वह गाड़ी पकड़ी गयी तब पता चल कि वह कंपनी के अफसर की है." लोगों के हक की बात करने वाले लोग अब अपनी सुरक्षा के बारे में चिंतित हैं.

उनका मानना है कि किसी भी दिन किसी कंपनी द्वारा उनके खिलाफ कोई झूठा मामला बना दिया जाएगा और पुलिस उन्हें अपराधियों की तरह घसीटती हुई जेल ले जायेगी.

रमेश अग्रवाल और हरिहर पटेल के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ था.

जेल में जब रमेश अग्रवाल की तबियत खराब हुई तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. मगर अस्पताल में उन्हें खूंखार अपराधियों की तरह हथकड़ियों से बिस्तर के साथ जकड़ दिया गया.

बाद में काफी विरोध होने पर उनकी हथकड़ियाँ खोली गयीं.

'कंपनियों के एजेंट बन गए हैं'

वहीं सामाजिक कार्यकर्ता रघुवीर प्रधान कहते हैं कि जिन इलाकों में ज़मीन के अधिग्रहण का काम चल रहा है वहां पर देखा गया है कि सरकारी अधिकारी या पुलिस के लोग कंपनियों के एजेंट के रूप में काम करते हैं.

कई मामलों में तो कंपनियों के लिए पुलिस और प्रशासन के लोग लोगों को धमका कर ज़मीन खाली करवाने का काम कर रहे हैं. रमेश अग्रवाल और हरिहर पटेल की गिरफ्तारी की चर्चा करते हुए सविता रथ कहती हैं कि प्रशासन और कंपनी के अधिकारी रमेश अगरवाल के अभियान से बौखलाए हुए थे.

वह कहतीं हैं," जब इनके द्वारा किए जा रहे अवैध कब्ज़े को लेकर रमेश अग्रवाल और हरिहर पटेल जैसे कार्यकर्ताओं ने ऊँगली उठानी शुरू कर दी तो कंपनियों के लोग सकते में आ गए. कंपनी को लगा कि क्या छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े इलाके में भी कोई हमारा विरोध कर सकता है? " रायगढ़ से 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर है गारे गाँव. तमनार से लगे इस इलाके में भी ज़मीन के अधिग्रहण का काम चल रहा है.

कहीं कोयले के ख़नन के लिए ज़मीन अधिग्रहित की जा रही है तो कहीं विद्युत संयंत्र लगाने के लिए.

यहाँ के लोग इसका विरोध करते आ रहे है. तमनार चौक के पास पिछले एक महीने से यहाँ के ग्रामीण धरने पर बैठे हैं. उनकी मांग है कि रमेश अग्रवाल और हरिहर पटेल को बिना शर्त रिहा किया जाए. धरने पर बैठे एक ग्रामीण ने कहा, "जनसुनवाई में सिर्फ रमेश अग्रवाल और हरिहर पटेल ने अकेले विरोध नहीं किया. हम सब ग्रामीणों ने ज़मीन अधिग्रहण का विरोध किया. मामला सिर्फ उन दोनों पर ही क्यों दायर किया गया. हम सब पर किया जाना चाहिए था." वहीं एक अन्य ग्रामीण का कहना था कि काश्तकारी की ज़मीन का अधिग्रहण अगर उद्योग लगाने के लिए किया जाएगा तो लोग जाएंगे कहाँ.

'क्या हम लोहा खाएंगे'

वो कहते हैं, "क्या हम लोहा खाएंगे? प्रदूषण बुरी तरह फैल चुका है. अब हमारे खेतों पर ना फसल होती है ना पेड़ पौधे." सामाजिक कार्यकर्ता रघुवीर प्रधान का आरोप है कि कंपनियों ने बाहर से कुछ गुंडों को बुला रखा है जो उन लोगों को डराने का काम करते है जो ज़मीन देने में आना कानी करते हैं.

वो कहते हैं, "हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार के तड़ीपार असामाजिक तत्व कंपनी में नौकरी कर रहे हैं. उनका काम सिर्फ लोगों को डराना धमकाना है." सविता रथ और रघुवीर प्रधान कहते हैं कि कंपनियाँ ज़मीन हथियाने के लिए हर हथकंडा अपना रही हैं.

वह कहते हैं कि जो अपनी ज़मीन देना नहीं चाहते कंपनी के लोग उनके खेतों में फैक्ट्री की गरम राख डंपरों से लाकर डाल देते हैं. या फिर रख भरे पानी को खेतों में बहा दिया जाता है.

सविता कहती हैं,"ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि लोग औने-पौने दाम में अपनी ज़मीन बेच कर चले जाएँ." इन दोनों सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है यहाँ छल से या फिर बल से किसी भी तरह ज़मीनों को हड़पा जा रहा है.

अब जिसके पास ताक़त है ज़मीन उसकी हो जाती है क्योंकि ग़रीब किसान तो उतनी औकात नहीं रखता कि अदालतों में लड़ाई लड़े.

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