अब क्या करूँ ?

नोएडा एक्सटेंशन

नोएडा एक्सटेंशन में भू-अधिग्रहण रद्द करने के अदालत के आदेश की गाज आखिरकार किस पर गिरी है?

सरकार, विकास प्राधिकरण, बिल्डर और किसान सब अपने-अपने नफ़े नुकसान का गणित बैठाने में लगे हैं. लेकिन ये सारा खेल जिन ख़रीददारों की बदौलत खेला गया, उनके दर्द का क्या.

क्या उन ख़रीददारों का कसूर सिर्फ़ ये है कि उन्होंने अपने लिए एक अदद घर खरीदने का सपना देखा.

ऐसे लोगों की तादाद हज़ारों में है, जिन्होंने दिल्ली से सटे नोएडा एक्सटेंशन में प्रस्तावित रिहाइशी परियोजनाओं में अपनी गाढ़ी कमाई लगाई पर अब वो एक ऐसे भंवर में फंस चुके है, जिससे निकल पाना इतना आसान नही है.

अब क्या करूँ? श्रृंखला के तहत अगले कुछ दिनों तक हम आपकी मुलाकात ऐसे कुछ लोगों से करवाएंगे, जिन्होनें अपने एक अदद मकान के बारे में सोचा, पर उन्हें मिला क्या? पहली कड़ी मे ऐसे ही एक व्यक्ति अनूप की आपबीती.

आशियाने की तलाश

"मेरा नाम अनूप कुमार सिंह है, वैसे तो इलाहाबाद का रहने वाला हूँ पर यहाँ दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके में रहता हूँ किराए के मकान में.

हर महीने करीब सात हज़ार किराया देता हूँ. छोटा परिवार है घर में पत्नी और एक पाँच साल की बेटी है.

मेरी ही कमाई से घर चलता है. मकान मालिक हर साल किराया बढ़ा देता है, तो आख़िरकार कब तक किराया देता इसलिए पिछले साल नोएडा एक्सटेंशन के पटवारी गाँव में एक बड़े बिल्डर आम्रपाली की रिहाइशी योजना में मैने एक फ्लैट बुक किया.

बेटी भी नोएडा के एक स्कूल में पढ़ती है और मैं भी नोएडा में ही एक निजी कंपनी में नौकरी करता हूँ इसलिए सोचा कि तीन साल बाद जब मकान मिल जाएगा तो आसानी हो जाएगी.

कुछ मित्रों की सलाह पर मैने इसलिए नोएडा एक्सटेंशन का चुनाव किया क्योंकि इसकी क़ीमत बाकी जगहों यानि नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाज़ियाबाद की क़ीमतों की तुलना में काफ़ी कम थी और मेरी जेब इसका बोझ सह सकती थी.

तीन लाख का जुगाड़

तीन बेडरुम के फ्लैट की क़ीमत करीब 25 लाख थी और मैने इसके लिए पंद्रह फ़ीसदी रकम का भुगतान किया. करीब तीन लाख रूपए.

लेकिन इन तीन लाख रूपयों का जुगाड़ करना मेरे लिए टेढ़ी खीर थी. इसके लिए मैने अपने पिता को भी कई बार फ़ोन किया. मैने अपनी सारी बचत निकाल दी. कुछ एफडी थी तुड़वानी पड़ी. इसके बाद भी पैसे पूरे नहीं पड़े तो दोस्तों का सहारा लेना पड़ा.

बाकी की 75 फ़ीसदी रकम बैक को देनी थी इसलिए एक्सिस बैंक में लोन के लिए आवेदन कर दिया.

Image caption आम्रपाली के इसी विज्ञापन को पढ़ कर अनूप ने फ्लैट बुक कराया था.

शुरू में तो बैंक ने कहा कि लोन हो जाएगा लेकिन कुछ महीने पहले जबसे किसानों का झगड़ा बढ़ा तो बैंक ने लोन देने से मना कर दिया.

सिर्फ़ एक नही सारे बैंकों ने लोन देने से मना कर दिया. इधर बिल्डर ने बाकी रकम के भुगतान के दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया. बिल्डर ने कहा कि अगर समय पर पेमेंट नही किया गया तो 18 फ़ीसदी जुर्माना देना होगा.

अंधेरा ही अंधेरा

पर अब तो अदालत का फ़ैसला आ गया है. दिन भर चाहे घर हो या फिर ऑफिस हो, हर जगह टीवी पर निगाह गड़ाए रहता हूँ इस उम्मीद में कि कहीं से कोई अच्छी ख़बर आ जाए.

बिल्डर टीवी पर तो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, कहते हैं कि निवेशक का नुकसान नहीं होने देंगे, दूसरे प्रोजेक्ट में शिफ्ट कर देंगे, पर ऐसा मैं नहीं कर सकता क्योंकि उनके रेट ज़्यादा हैं और मेरा बजट उतना नही है.

हमने अपनी गाढ़ी कमाई बिल्डर को सौंप दी, लेकिन अब हमें आगे का रास्ता नही सूझ रहा है. आगे अंधेरा ही अंधेरा है"

अगली कड़ी में आप विजय गुप्ता की आपबीती पढ़ पाएंगे जो चेन्नई में रहते है और पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं. विजय अगर अपनी पत्नी का कहना मान लेते तो न वो नोएडा एक्सटेंशन में निवेश करते और न ही उनका पैसा फंसता.

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