वस्तानवी को देवबंद के कुलपति पद से हटाया गया

गुलाम मोहम्मद वस्तानवी इमेज कॉपीरइट BBC World Service

देवबंद की मजलिस-ए-शूरा की एक अहम बैठक में गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को संस्था के कुलपति पद से हटा दिया गया है.

बैठक में हुए वोटों के बंटवारे में आठ वोट वस्तानवी के विरोध में पड़े और पाँच उनके पक्ष में.

लेकिन बीबीसी से बात करते हुए वस्तानवी ने कहा कि वो इस फ़ैसले से बिल्कुल मायूस नहीं हैं और उन्हें कोई तक़लीफ़ नहीं है, हालाँकि उन्होंने कहा कि वो देवबंद के काउंसिल के सदस्य बने रहेंगे.

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उन्होंने कहा, "ऐसी जगह पर जहाँ हंगामें होते हों, जहाँ लोगों की टांगें खींची जा रही हों, मैं वहाँ काम कर ही नहीं सकता था. काम तो वहाँ किया जाता है जहाँ सुकून हो. देवबंद में कुछ लोग हैं जो दारुल-उलूम अपनी जागीर समझते हैं कि एक गुजराती आदमी यहाँ आकर कैसे बैठ गया. ऐसे लोगों को जलन है."

वस्तानवी के मुताबिक उनके छात्रों में से मात्र कुछ ही उनके खिलाफ़ थे, लेकिन उन्हें भी भड़काया गया था.

मजलिस-ए-शूरा की रविवार को हुई वोटिंग के बारे में वस्तानवी ने कहा कि बैठक में कुछ लोग उनसे इस्तीफ़ा लेने का मन बनाकर आए थे.

वस्तानवी ने कहा, "वोटिंग नहीं होनी थी. रिपोर्ट में मोदी के मामले में मुझपर कोई आरोप नहीं लगाए गए थे. लेकिन रिपोर्ट के बाद मुझसे इस्तीफ़ा देने को कहा गया. मैंने कहा मैं कैसे इस्तीफ़ा दूँ. संस्था में हंगामा किसने किया और कराया, इसका तो रिपोर्ट में ज़िक्र नहीं है, इसलिए ये रिपोर्ट अधूरी है. इस पर कमेटी ने कहा कि आपको इस्तीफ़ा देना पड़ेगा. मैने कहा कि मैं पूरी रिपोर्ट आने के बाद ही इस्तीफ़ा दूंगा."

वस्तानवी ने कहा कि बैठक में कुछ लोग ये सोचकर आए थे कि अगर वो इस्तीफ़ा नहीं देते हैं, तो उनकी छुट्टी करनी है.

'काम का मौका नहीं'

पूर्व कुलपति के मुताबिक उन्हें देवबंद में अपने कार्यकाल के दौरान काम करने का मौका नहीं दिया गया.

वस्तानवी ने कहा कि कमेटी की रिपोर्ट तो उनके पक्ष में थी लेकिन उन्होंने पहले ही कहा था कि तीन सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट चाहे उनके पक्ष में हो या नहीं, वो अपने पद से इस्तीफ़ा दे देंगे.

ग़ौरतलब है कि वस्तानवी को इसी वर्ष जनवरी में मजलिस-ए-शूरा ने ही दारुल उलूम का कुलपति नियुक्त किया था, लेकिन उनकी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कुछ टिप्पणियों की दारुल उलूम में और उसके बाहर कड़ी आलोचना हुई थी. उसके बाद से ही उनके इस्तीफ़े की मांग की जाने लगी थी.

ग़ुलाम मोहम्मद वस्तानवी ने कहा था कि गुजरात में मुसलमानों की स्थिति काफ़ी बेहतर है और अब समय आ गया है कि मुसलमान अतीत को भुलाकर आगे बढ़ें.

इस बात पर कई मुस्लिम संस्थाओं ने आपत्ति जताई थी.

मोदी विवाद

लेकिन बीबीसी से बातचीत में वस्तानवी ने कहा कि नरेंद्र मोदी पर उनकी टिप्पणी का दारुल-उलूम से कोई लेना-देना नहीं था.

उन्होंने कहा, "मेरे साक्षत्कार का ताल्लुक गुजरात से था, वहाँ के विकास से था. मैने इस बारे में सफ़ाई भी दी थी कि गुजरात में विकास मात्र मोदी ने नहीं किया है, विकास तो केंद्र ने मिलकर किया है. लेकिन मीडिया ने लोगों को गुमराह किया."

हैदराबाद के लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि वस्तानवी के बयान को मुस्लिम समुदाय कभी स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि उनकी नज़र में मोदी सैंकड़ों मुसलमानों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार हैं.

वस्तानवी के बयान के बाद मजलिस-ए-शुरा ने एक कार्यवाहक कुलपति नियुक्त करने के अलावा वस्तानवी पर लगे आरोपों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय समिति बनाई थी जिसे सभी मुद्दों की जांच करके अपनी रिपोर्ट देनी थी.

वस्तानवी दारुल उलूम के सौ वर्ष के इतिहास में वहां के कुलपति बनने वाले पहले गुजराती कुलपति थे.

ग़ुलाम मोहम्मद वस्तानवी गुजरात से आते हैं और उन्होंने एमबीए की भी पढ़ाई की है. वस्तानवी सूरत के रहने वाले हैं और गुजरात और महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों में कई शिक्षा केंद्र भी चलाते हैं.

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