सरकारी शिविर में दिलचस्पी नहीं

  • 25 जुलाई 2011
डायबिटीज़ कैंप

ये तस्वीर है दिल्ली के मंगोलपुरी इलाक़े की एक शहरी बस्ती में चल रहे एक सरकारी शिविर की, जहां स्थानीय लोगों के लिए डायबिटीज़ और उच्च रक्तचाप का टेस्ट किया जा रहा है.

हालांकि पेड़ के नीचे एक मेज और बेंच लगाकर बैठे डॉक्टरों को देख कर ऐसा नहीं कहा जा सकता कि ये एक सुनियोजित स्वास्थ्य शिविर है.

इस शिविर को लोगों तक पहुंचाने के लिए न तो इस बस्ती में कोई पोस्टर लगे हैं, और न ही इस शिविर के आस पास. न तो इस शिविर में लोगों की ज़्यादा दिलचस्पी नज़र आ रही है, और न ही डायबिटीज़ और उच्च रक्तचाप के बारे में उन्हें ज़्यादा जानकारी है.

हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बड़े ज़ोर-शोर से और बड़े स्तर पर एक डायबिटीज़ और उच्च रक्तचाप जांच कार्यक्रम का उदघाटन किया था. इसके तहत शहरी बस्ती में रहने वाले लोगों की इन बीमारियों के लिए जांच की जा रही है.

दरअसल ये पहल डायबिटीज़, कैंसर और उच्च रक्तचाप की रोकथाम के लिए साल 2010 में लांच की गई केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की मुहिम का एक हिस्सा है.

इस मुहिम के शुरुआती दौर में देश भर में 33 बड़े शहरों में बस्तियों में रह रहे 10 लाख लोगों की डायबिटीज़ और उच्च रक्तचाप की जांच की जाएगी. इस कार्यक्रम के लिए केंद्र सरकार ने क़रीब 500 करोड़ रुपए की राशि प्रदान की है.

लेकिन जितने ज़ोर-शोर से पिछले हफ़्ते इस मुहिम की घोषणा की गई थी, ज़मीनी हालात उससे बिल्कुल परे है.

'शहरीकरण से तनाव'

भारत में डायबिटीज़ से ग्रस्त लोगों की संख्या पांच करोड़ से ज़्यादा है और इस आंकड़े में केवल चीन ही भारत से आगे है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद का कहना था कि शहरी बस्तियों में डायबिटीज़ और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है क्योंकि शहरीकरण से आम लोगों मे तनाव बढ़ता जा रहा है.

ये मुहिम एक बड़े स्तर पर घोषित की गई, लेकिन बस्तियों में लगाए जाने वाले शिविरों के लिए तैयारियां अधूरी रह गई.

दिल्ली के पश्चिमी ज़िले के नोडल अफ़सर डॉक्टर कैलाश ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि इस आयोजन से पहले न तो कोई जागरुकता मुहिम चलाई गई और न ही डॉक्टरों के लिए कोई जगह उपलब्ध करवाई गई, जिसके कारण लोगों में ख़ासी दिलचस्पी नहीं देखने को मिली.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “इस मुहिम के बारे में हमें अचानक ही सूचित किया गया, जिसकी वजह से हम ख़ास तैयारियां नहीं कर पाए. हमारी मेडिकल टीम ने इन बस्तियों में पहुंचने के बाद लोगों तक ख़ुद जा कर इस शिविर के बारे में बताया. अगर इस मुहिम की घोषणा से पहले हमें थोड़ा समय दिया जाता, तो हम लोगों की जागरुकता के लिए बहुत कुछ कर सकते थे. दूसरी बात ये कि पेड़ के नीचे बैठे डॉक्टरों को कोई गंभीरता से नहीं लेता. स्थानीय अधिकारियों की ओर से हमें किसी तरह का कोई सहयोग नहीं दिया गया.”

'डायबिटीज़ और हमें?'

Image caption बस्ती वालों का कहना था कि उन्हें सरकारी सुविधाओं पर कतई भरोसा नहीं.

शायद यही वजह है कि इन बस्तियों में डायबिटीज़ जैसी बीमारी को लोगों ने ज़्यादा तवज्जो नहीं दी और इसलिए शिविर में जांच करवाने में भी उनकी रुचि नहीं थी.

बस्ती में एक जवान युवक से जब मैंने पूछा कि वे इस शिविर में क्यों नहीं जाना चाहते, तो उनका कहना था, “मेरा मानना है कि उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां केवल हाई सोसाइटी वाले लोगों को ही हो सकती है. यहां सब मेहनत करने वाले लोग रहते हैं. भला मेहनत करने वाले को उच्च रक्तचाप की बीमारी क्यों होने लगी? यहां तो कुपोषण की समस्या ज़्यादा दिखती है, जिसके लिए सरकार कुछ ख़ास नहीं कर रही है.”

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद ने घोषणा की थी कि जिन लोगों को इस बीमारी के त्रस्त पाया जाएगा, उन्हें सरकारी अस्पतालों में मुफ़्त इलाज के लिए भेजा जाएगा. लेकिन शहरी बस्तियों में रहने वाले इन लोगों का सरकारी सुविधाओं पर से जैसे विश्वास ही उठ गया हो.

कैरोसीन के चूल्हे पर खाना पका रही एक गर्भवती महिला ने कड़छी घुमाते हुए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “मैं सरकारी सुविधाओं पर कतई भरोसा नहीं कर सकती. सरकारी अस्पताल की लापरवाही की वजह से मैं अपने दो बच्चे खो चुकी हूं. लेकिन अब और नहीं. इस बार मैं अपना स्वास्थ्य परीक्षण केवल निजी अस्पताल से ही करवा रही हूं.”

दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉक्टर एनवी कामथ ने ये माना कि सरकारी अस्पताल बढ़ती आबादी का बोझ नहीं झेल पा रहे हैं.

लेकिन साथ ही लोगों की शिकायतों को नकारते हुए उन्होंने कहा, “ये सिर्फ़ कुछ लोगों की अवधारणा है कि निजी अस्पतालों में सरकारी अस्पतालों के मुक़ाबले ज़्यादा अच्छा इलाज होता है. समस्या ये है कि बढ़ती आबादी की वजह से हम सभी मरीज़ों पर ध्यान नहीं दे पाते. लेकिन निजी अस्पतालों में भी यही समस्या है. तो ये कहना ग़लत होगा कि सिर्फ़ सरकारी अस्पताल ही लोगों को पर्याप्त इलाज नहीं दे पाते.”

सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए घंटो कतार में खड़े रहने के बावजूद पर्याप्त इलाज न मिल पाने के अनुभव ने बस्ती वालों को निजी अस्पतालों की ओर मोड़ दिया है. ऐसे में सरकारी और निजी अस्पतालों की आपसी तुलना शायद बस्ती वालों के सवालों का जवाब नहीं.

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