स्वामी के बयान पर हार्वर्ड में विवाद

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Image caption सुब्रह्मण्यम स्वामी के कट्टरपंथी विचारों से हार्वर्ड में विवाद पैदा हुआ है

अमरीका में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े 250 से अधिक लोगों ने जनता पार्टी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी पर मुसलमानों के विरुद्ध भावनाएँ भड़काने वाला एक संपादकीय लिखने का आरोप लगाकर उन्हें विश्वविद्यालय से हटाने की माँग की है.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के अध्यापक स्वामी के विरुद्ध ये माँग करने वाले लोगों में मौजूदा छात्रों के अलावा पूर्व छात्र, कुछ अन्य शिक्षक और कुछ छात्रों के माता-पिता भी शामिल हैं.

स्वामी ने एक अँगरेज़ी दैनिक डीएनए में भारत से इस्लामी आतंकवाद को हटाने के बारे में 16 जुलाई को एक लेख लिखा. इसमें उन्होंने न सिर्फ़ 'मंदिर की जगह बने मस्जिदों को तोड़ने' की वकालत की है बल्कि वह ये भी कहते हैं कि 'अपने पूर्वजों को हिंदू न मानने वाले मुसलमानों और अन्य धर्म के लोगों के मताधिकार भी छीन लिए जाने चाहिए'.

स्वामी ने ये लेख मुंबई में 13 जुलाई को हुए हमलों के बाद लिखा था, जहाँ वह इस्लामी आतंकवाद को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताते हैं.

विश्वविद्यालय से माँग

उन्होंने इस लेख में 2012 तक पाकिस्तान पर तालिबान के नियंत्रण और अमरीकियों के अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर भागने की आशंका भी जताई है. इसके बाद उनके अनुसार 'अपना अधूरा काम पूरा करने के लिए हिंदुत्व के साथ इस्लाम संघर्ष करेगा'.

स्वामी ने लिखा है, "भारत में इस्लामी आतंकवाद के हाल के इतिहास और भारत में आतंकवाद से निबटने के मामले में पहला सबक ये सीखना होगा कि हिंदू निशाने पर हैं और भारतीय मुसलमानों को धीरे-धीरे कट्टर बनाया जा रहा है जिससे वे हिंदुओं के विरुद्ध आत्मघाती बन सकें."

उनके इस लेख के बाद एक इलेक्ट्रॉनिक प्रार्थना पत्र पर हार्वर्ड से जुड़े लोगों के हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं जिसमें कहा गया है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को स्वामी के इन विचारों को अस्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय से उनके संबंध ख़त्म कर देने चाहिए.

इस तरह के लेख को भड़काऊ बता रहे इन लोगों का कहना है कि किसी भी बौद्धिक समुदाय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा और विचारों पर मतभेद तो होते हैं मगर साथ ही मानवीय अंतर के लिए आदर और सहिष्णुता भी होती है.

पेटिशन में लिखा है कि स्वामी की टिप्पणियाँ विभिन्न समुदायों से आने वाले छात्रों के प्रति उनकी निष्पक्षता और सम्मान पर शक पैदा करती हैं.

कट्टर सुर

लेख में स्वामी के सुर काफ़ी कट्टरपंथी हैं. उनके अनुसार, "इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध खड़े होने के लिए बतौर हिंदू हमारी एकजुट मानसिकता होनी चाहिए. भारत के मुसलमान भी अगर हिंदुओं की इस पीड़ा को वास्तव में समझते हैं तो वे भी हमारे साथ हो सकते हैं."

मगर इसके बाद वह मुसलमानों की मंशा पर सवाल उठाते हैं, "मुसलमान ये पीड़ा समझते हैं मैं ये तब तक नहीं मान सकता जब तक वे पूरे गर्व के साथ ये न कहें कि हालाँकि वे मुसलमान हैं मगर उनके पू्र्वज हिंदू थे."

स्वामी का कहना है कि 'इंडिया जो कि भारत है जो कि हिंदुस्तान है- हिंदुओं और बाक़ी उन लोगों का देश है जिनके पूर्वज हिंदू थे. बाक़ी लोग जो ये मानने से इनकार करते हैं या बाक़ी विदेशी नागरिक जो पंजीकरण के बाद भारतीय नागरिक बनते हैं वे भारत में रह तो सकते हैं मगर उन्हें मताधिकार नहीं होना चाहिए.'

स्वामी चाहते हैं कि हिंदुओं का धर्मांतरण रोकने के लिए एक राष्ट्रीय क़ानून होना चाहिए पर अगर कोई फिर से हिंदू बनना चाहे तो उस पर रोक नहीं होनी चाहिए.

अंत में उन्होंने लिखा है कि 'अगर दब्बू तरीक़े से गैस चेंबर में जाने वाले यहूदी 10 साल में बकरी से शेर हो सकते हैं तो भारत में इन हालात में हिंदुओं के लिए ऐसा करना मुश्किल नहीं होगा और वे पाँच साल में ही ऐसा कर सकेंगे.'

मगर 'भारत में इस्लामी आतंकवाद' से निबटने के उनके इस तरीक़े ने हार्वर्ड के समुदाय में एक बहस शुरू कर दी है और इसका विरोध करने वाले स्वामी के इन विचारों को 'घोर अपमानजनक और ख़तरनाक' बता रहे हैं.

विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले को बढ़ता देखकर कहा है कि वे इसकी पूरी जाँच करके प्रतिक्रिया देंगे.

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