भूमि अधिग्रहण बिल का मसौदा सार्वजनिक

सिंचित भूमि

मसौदे के अनुसार बहु-फ़सली सिंचित भूमि का अधिग्रहण संभव नहीं होगा.

भारत सरकार ने भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के लिए विधेयक का मसौदा शुक्रवार को देश के सामने रख दिया है.

'भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास एंव पुनर्स्थापना विधेयक 2011' के मसौदे के अनुसार मुआवज़े की राशि शहरी क्षेत्र में निर्धारित बाजार मूल्य के दोगुने से कम नहीं होनी चाहिए जबकि ग्रामीण क्षेत्र में ये राशि बाजार मूल्य के छह गुणा से कम नहीं होनी चाहिए.

पुनर्वास पैकेज

  • ज़मीन के मालिकों और आश्रितों के लिए विस्तृत पुनर्वास पैकेज
  • मुआवज़ा: ग्रामीण ज़मीन के लिए बाज़ार मूल्य से छह गुना और शहरी भूमि के लिए दोगुना
  • प्रभावित परिवार को 12 महीने तक तीन हज़ार निर्वाह भत्ता, इसके बाद 20 साल तक दो हज़ार रुपए वार्षिक भृत्ति
  • प्रभावित परिवार के एक सदस्य को अनिवार्य रूप से रोज़गार या दो लाख रुपए
  • अधिग्रहण के लिए 80 प्रतिशत परिवारों की मंज़ूरी अनिवार्य

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि ज़मीन के अधिग्रहण और पुनर्वास के मामलों को एक ही क़ानून के तहत लाए जाने की योजना है. ग्रामीण विकास मंत्री ने मसौदे की भूमिका में दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलुओं के रूप में देखे जाने की ज़रुरत पर ज़ोर दिया है.

मसौदे में इस बात का प्रावधान है कि अगर सरकार निजी कंपनियों के लिए या प्राइवेट पब्लिक भागीदारी के अंतर्गत भूमि का अधिग्रहण करती है तो उसे 80 फ़ीसदी प्रभावित परिवारों की सहमति लेनी होगी.

मसौदे में लिखा गया है कि सरकार ऐसे भूमि अधिग्रहण पर विचार नहीं करेगी जो या तो निजी परियोजनाओं के लिए निजी कंपनियाँ करना चाहेंगी या फिर जिनमें सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए बहु-फ़सली ज़मीन लेनी पड़े.

यानि अगर ये विधेयक क़ानून बन जाता है तो बहु-फ़सली सिंचित भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकेगा.

'सरल, पारदर्शी और तटस्थ'

जयराम रमेश, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री

जयराम रमेश

विधेयक का उद्देश्य भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल,पारदर्शी और प्रत्येक मामले में दोनों पक्षों के लिए तटस्थ बनाना है.

मसौदे की भूमिका में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने विधेयक के लक्ष्यों के बारे में लिखा है, "प्रत्येक मामले में भूमि का अधिग्रहण इस तरह किया जाए कि इससे भू-स्वामियों के हितों की पूरी तरह से सुरक्षा हो और साथ ही उस ज़मीन से जीविका चलाने वालों के भी हित सुरक्षित रहें."

जयराम रमेश ने अपनी टिप्पणी लिखा है कि इस विधेयक का उद्देश्य भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल,पारदर्शी और प्रत्येक मामले में दोनों पक्षों के लिए तटस्थ बनाना है.

हाल के वर्षों में हुए भूमि अधिग्रहण में अरजेंसी प्रावधान की काफ़ी आलोचना हुई है. इसके तहत सरकारें ये कहकर किसानों की ज़मीने बिना सुनवाई के तुरत फुरत ले लेती हैं कि परियोजना तत्काल शुरू करना ज़रूरी है.

मौजूदा क़ानून के इस प्रावधान में सरकार राष्ट्र हित में किसी भी ज़मीन का आधिग्रहण कर सकती है.

'अरजेंसी क्लाज़'

तात्कालीकता खंड यानि अरजेंसी क्लाज़

तात्कालिकता खंड केवल निम्नलिखित मामलों में लगाया जा सकता है -

  1. राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा प्रायोजन
  2. आपात परिस्थितियों या प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में पुनर्वास और पुनर्स्थापन आवश्कताएं
  3. दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में

स्रोत - 'भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास एंव पुन:स्थापना विधेयक 2011' का मसौदा

लेकिन नए विधेयक में तात्कालिकता खंड नाम के इस प्रावधान को स्पष्ट किया गया है.

मसौदे के अनुसार सरकार राष्ट्रीय रक्षा एंव सुरक्षा के लिए, आपात परिस्थितयों या प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में पुनर्वास के लिए या ‘दुलर्भ से दुलर्भतम मामलों’ के लिए ही तात्कालिकता यानी अरजेंसी के प्रावधानों पर अमल करेगी.

मसौदे में ज़मीन के मालिकों और ज़मीन पर आश्रितों के लिए एक विस्तृत पुनर्वास पैकेज का ज़िक्र है. इसमें उन भूमिहीनों को भी शामिल किया गया है जिनकी रोज़ी-रोटी अधिग्रहित भूमि से चलती है.

मसौदे में अधिग्रहण के कारण जीविका खोने वालों को 12 महीने के लिए प्रति परिवार तीन हज़ार रुपए प्रति माह जीवन निर्वाह भत्ता दिए जाने का प्रावधान है.

इसके अलावा पचास हज़ार का पुनर्स्थापना भत्ता, ग्रामीण क्षेत्र में 150 वर्ग मीटर और शहरी क्षेत्रों में 50 वर्गमीटर ज़मीन पर बना बनाया मकान भी दिया जाने का प्रावधान है.

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