भारतीय कूटनीति के नए मुखिया

  • 2 अगस्त 2011
रंजन मथाई इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption रंजन मथाई भारत के नए विदेश सचिव हैं

पेज थ्री के नज़रिए से देखा जाए तो भारत के नवनियुक्त विदेश सचिव रंजन मथाई का सबसे बड़ा ‘क्लेम टू फ़ेम’ यही है कि वे मोनाको के राजकुमार प्रिंस अल्बर्ट दे और दक्षिण अफ़्रीकी ओलंपिक तैराक शॉरलीन विटस्टॉक की शादी में ख़ास तौर से बुलाए गए मेहमानों में अकेले भारतीय थे.

1974 बैच के रंजन मथाई वैसे तो भारतीय विदेश सेवा के सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं, लेकिन उन्हें विदेश सचिव बनवाने का श्रेय उनकी वरिष्ठता के साथ-साथ उनके उस कूटनीतिक कौशल को दिया जा सकता है जिसकी बदौलत उनके साढ़े चार साल के कार्यकाल के दौरान भारत-फ़्राँस संबंधों का रुतबा, भारत-रूस संबंधों के रुतबे के समकक्ष पहुँच गया.

अभी तक के ज़्यादातर विदेश सचिव चीन और पाकिस्तान में किए गए अपने कामों की बदौलत इस सर्वोच्च पद पर पहुँचे हैं. मथाई से पहले के कम से कम तीन विदेश सचिव निरुपमा राव, शिवशंकर मेनन और श्याम सरन को चीन, पाकिस्तान ओर नेपाल का ख़ासा अनुभव रहा है.

रंजन मथाई इसका अपवाद हैं और इसलिए उनकी आलोचना भी हो रही है. वैसे कम लोगों को पता है कि मथाई भले ही पाकिस्तान ओर चीन में भारत के राजदूत न रहे हों लेकिन वह भी भारतीय उप महाद्वीप की कूटनीति से अछूते नहीं रहे हैं.

मिसाल

वर्ष 1996 में संयुक्त सचिव के रूप में बांग्लादेश से गंगा नदी के समझौते में उनकी भूमिका को दो देशों के बाच सहयोग की एक मिसाल के तौर पर देखा जाता है.

उस समय की तमाम राजनीतिक और तकनीकी बाधाओं को दरकिनार करते हुए रंजन मथाई और बांग्लादेश के तत्कालीन अतिरिक्त विदेश सचिव तारिक़ करीम ने उस समझौते को अंजाम तक पहुँचाया था.

आज वही तारिक़ करीम भारत में बांग्लादेश के उच्चायुक्त हैं और जिस तरह की व्यक्तिगत नज़दीकियाँ दोनों के बीच रही हैं, उसका फ़ायदा दोनों देशों को मिलना लाज़िमी है.

यह बहुत कम लोग जानते हैं कि जब मथाई ने संयुक्त सचिव के रूप में अपना कार्यकाल पूरा कर लिया तो साउथ ब्लॉक के आक़ाओं ने उन्हे एक बहुत ही मामूली देश में भारत का राजदूत नियुक्त कर दिया.

जब फ़ाइल उस समय विदेश मंत्रालय चला रहे इंदर कुमार गुजराल के पास गई, तो उन्होंने अपने हाथों से मथाई के नाम के आगे लिखे देश को काटकर इसराइल लिख दिया.

बदलाव

तेल अवीव में मथाई ने भारत इसराइल संबंधों का ख़ाका ही बदल दिया. अपने पूर्ववर्ती शिवशंकर मेनन द्वारा बनाए गए सामरिक और रक्षा संबंधों को उन्होंने एक आर्थिक कोण भी दिया.

Image caption रंजन मथाई ने निरुपमा राव की जगह ली है

मथाई के कार्यकाल के दौरान कड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के बावजूद जब भारत को एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने का ठेका मिला तो कई नामी गिरामी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी दाँतों तले उँगलियाँ दबानी पड़ीं.

महाराष्ट्र, पंजाब और उत्तर प्रदेश में इसराइल की बहुचर्चित ड्रिप सिंचाई प्रणाली की शुरुआत कराने का श्रेय भी मथाई को दिया जाना चाहिए.

पुणे के जाने-माने फ़र्ग्यूसन कॉलेज से पढ़े रंजन मथाई ने राजनीति विज्ञान में एमए किया है. कूटनीति के अलावा मथाई को सैनिक इतिहास पढ़ने का बेहद शौक है.

यह शौक इस हद तक है कि एक बार विदेश की पोस्टिंग लेने के बजाए मथाई ने नेशनल डिफ़ेंस कॉलेज में तीन साल का समय काटना ज़्यादा मुनासिब समझा ताकि वह अपने इस शौक को पूरा कर सकें.

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