शौचालय में रहने को मजबूर मरीज़

Image caption रामादीन पहले फुटपाथ पर रह रहे थे पर बारिश और धूप से बचने के लिए फिर शौचालय की चारदीवारी में आ गए.

राजधानी दिल्ली में स्थित भारत के प्रमुख सरकारी अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के बाहर रामादीन अपनी बेटी के साथ एक शौचालय में रह रहे हैं.

उनकी बेटी को ब्लड कैंसर है. मध्य प्रदेश के एक गांव में रहने वाले रामादीन तीन साल तक आसपास के स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में अपनी बेटी का इलाज करवाने के बाद दिल्ली आए.

एम्स के इलाज से बेटी को फ़ायदा तो हुआ है लेकिन इलाज लंबा है और अब इनके पास दिल्ली में रहने की कोई जगह नहीं. हार के ये अस्पताल के बाहर बंद पड़े एक शौचालय में रह रहे हैं.

ये नया है और साफ है. लेकिन है तो शौचालय ही.

रामादीन कहते हैं, “यहां रहने में बड़ी दिक्कत है, ये शौचालय अभी चालू नहीं हुआ लेकिन लोग इसे इस्तेमाल करने आ जाते हैं, फिर उन्हें भगाना पड़ता है.”

घर कैसे जाएं?

रामादीन और उनकी बेटी जैसे ही कई मरीज़ और उनके रिश्तेदार लंबा इलाज कराने के लिए दिल्ली आते हैं.

जांच के लिए सरकारी अस्पतालों में भर्ती भी होते हैं. लेकिन बीमारी का पता चलने और मरीज़ की तबीयत में सुधार होने के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है.

छोटे गांवों, कस्बों और शहरों से आए इन लोगों के घरों के पास वैकल्पिक स्वास्थ्य सुविधाओं की ग़ैरमौजूदगी के चलते ये दिल्ली में रुक तो जाते हैं. लेकिन फिर एक-एक दिन काटना पहाड़ हो जाता है.

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से आईं यसुरवती कहती हैं, “मेरे बेटे को कैंसर है लेकिन भर्ती तो अब किया नहीं जाएगा उसे, तो हम अब वापस चले जाएंगे, यहां रहना बहुत महंगा है, ना रहने की छत है, खाना भी बाहर से ख़रीदना पड़ता है.”

बिहार की रहने वाली कविता देवी के पति को फालिज मार गया था. पटना के अस्पताल से दिल्ली भेजे जाने के बाद से दो महीने से वो अपने पति का इलाज करवा रही हैं.

वो कहती हैं, “मैं तो कल गांव लौट जाऊं, मेरे दोनों बच्चे मुझे इतना याद करते हैं लेकिन यहां फुटपाथ पर रहकर भी इलाज तो हो रहा है, गांव में तो वो भी नहीं होगा.”

स्वास्थ्य पर ख़र्च कम

भारत अपने जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद का एक फ़ीसदी से भी कम स्वास्थ्य क्षेत्र पर ख़र्च करता है.

Image caption कविता बताती हैं कि ज़मीन पर लेटे-लेटे पति की त्वचा पर घाव हो गए हैं.

हालांकि इस साल वर्ष 2011-2012 के लिए पेश किए गए बजट में वित्त मंत्री ने स्वास्थ्य पर ख़र्च को 20 फीसदी बढ़ाने की घोषणा की. सरकार अब जीडीपी का दो से तीन फीसदी स्वास्थ्य पर ख़र्च करना चाहती है.

गौरतलब है कि यूरोपीय देश औसतन सकल घरेलू उत्पाद का नौ से 11 फीसदी स्वास्थ्य क्षेत्र पर ख़र्च करते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसी साल मई में एक रिपोर्ट जारी कर कहा था कि ‘भारत को स्वास्थ्य क्षेत्र पर अपने ख़र्च को बढ़ाना चाहिए’.

रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में प्रति व्यक्ति पर सरकार 32 अमरीकी डॉलर यानी क़रीब 1500 रुपए प्रति वर्ष ख़र्च करती है.

विकसित देशों में ये दर 140 गुना है यानी प्रति व्यक्ति के स्वास्थ्य पर सरकार की ओर से सालाना क़रीब दो लाख रुपए का ख़र्च.

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