सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों पर बहस

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क़ानून मंत्री सलमान ख़ुर्शीद के सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों पर दिए गए वक्तव्य ने एक नई बहस छेड़ दी है.

मंगलवार को संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए ख़र्शीद ने कहा था कि भारत के सुप्रीम कोर्ट में इस साल के जून महीने तक 57,179 मामले लंबित है.

क़ानून मंत्रालय के अनुसार 30 अगस्त 2010 तक देश के उच्च न्यायालयों में क़रीब 42 लाख मामले लंबित है.

पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा भी मानते है कि लंबित मामलों का एक कारण ढांचागत सुविधाओं में कमी का होना है.

जेएस वर्मा कहते है कि मामलों को जल्द निपटाने के लिए जजों को सुनवाई के लिए तैयार हो कर आना चाहिए और सुनवाई की तारीख़ आगे नहीं बढ़ानी चाहिए. सुनवाई के लिए वकील को भी तैयार हो कर आना चाहिए.

वे कहते है, "जजों की संख्या बढा़ई जानी चाहिए, जो स्थान रिक्त हो रहे है उनके लिए न्यायधीशों के चुनाव की प्रकिया पहले ही शुरु हो जानी चाहिए. काम के दिनों का पूरा इस्तेमाल होना चाहिए और किसी भी मामले को निपटाने की समय सीमा उसे तय करनी चाहिए."

बहस

केटीएस तुलसी पूर्व जस्टिस वर्मा के वक्तव्य से इत्तेफ़ाक नहीं रखते. वे कहते है कि जजों से साथ अन्य स्टॉफ़ को बढ़ाया जाना चाहिए, जो मामलों को वर्गीकृत करे और उनकी सहायता करें.

केटीएस तुलसी कहते है कि सुप्रीम कोर्ट में मामले इसलिए लंबित रहते हैं क्योंकि बहुत सारे मामले दायर किए जाते है.

वे कहते है, "सुप्रीम कोर्ट में केवल संवैधानिक मामले और राज्यों के ख़िलाफ़ जो मामले हैं उन्हे ही निपटाया जाना चाहिए और वहीं आम मामलों को हाई कोर्ट में ही निपटाया जाना चाहिए."

जबकि सलमान ख़ुर्शीद ने निचली अदालतों में ढांचागत सुविधाओं की कमी को न्याय की गति के धीमी होने का कारण बताया है.

तकनीक

सरकार का कहना है कि इन लंबित मामलों को निपटाने के लिए सरकार ने अदालतों में ढा़चागत सुविधाओं को बढ़ाने के लिए बजट की राशि बढ़ा दी है. इसके तहत इसे एक अरब से बढ़ाकर पाँच अरब कर दिया गया है.

मामलों को जल्द निपटाने के लिए रा्ज्य स्तर पर फॉस्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया गया था.

तुलसी कहते है ये अदालते क़ामयाब तो रही है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में एक साल में क़रीब पचास लाख मामले आते है.

वे कहते है जहाँ बाक़ी देशों में 100 से 115 मामलों को निपटाया जाता है वहीं भारत में एक दिन में एक हज़ार मामलों का निपटारा होता है.

वह सरकार की ढांचागत सुविधाओं को बढ़ावा देने से तो खुश है लेकिन वे नई तकनीक की बात भी कहते है.

उनका कहना है कि मामलों की ऑडियो वीडियों रिकॉर्डिंग होना चाहिए, इलेक्ट्रॉनिक जजमेंट होना चाहिए इससे और भी जल्द फ़ैसला होने में तो मदद मिलेगी ही लोगों को भी अदालत के चक्कर काटने से निजात मिलेगी.

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