भाजपा के विरोध के बीच लोकपाल बिल पेश

  • 4 अगस्त 2011
भारतीय संसद
Image caption सरकार के बिल और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के मसौदे में बहुत फ़र्क़ है

पिछले कई महीनों से विवादों में रहा लोकपाल बिल आख़िरकार गुरुवार को लोकसभा में पेश कर दिया गया.

प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री वी नारायणस्वामी ने इसे लोकसभा में पेश किया.

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इस बिल पर आपत्ति जताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को इसके दायरे में नहीं लाने के फ़ैसले ने संविधान का उल्लंघन किया है.

सुषमा स्वराज ने कहा कि भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून में प्रधानमंत्री को कोई छूट नहीं है तो फिर लोकपाल के प्रावधान में प्रधानमंत्री को कैसे छूट दी जा सकती है.

उन्होंने कहा कि जब तक इस विधेयक में प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाए जाने का प्रावधान नहीं किया जाता है कि भाजपा इसे पेश किए जाने का समर्थन नहीं कर सकती.

लेकिन ध्वनिमत से सदन की स्वीकृति लेकर इसे सदन में पेश किया गया.

उल्लेखनीय है कि अन्ना हज़ारे के नेतृत्व वाले नागरिक समाज के प्रतिनिधि सरकारी लोकपाल का विरोध कर रहें हैं और विरोध का प्रमुख मुद्दा प्रधानमंत्री को लोकपाल को दायरे में न लाया जाना है.

अन्ना हज़ारे ने मंगलवार को सभी सांसदों को पत्र लिख कर उनसे सरकारी लोकपाल का विरोध और जन लोकपाल का समर्थन करने का अनुरोध किया था.

'संशोधनों की ज़रुरत'

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि लोकपाल बिल को प्रभावी बनाने के लिए कई संशोधनों की ज़रूरत है लेकिन कम से कम प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाया जाए.

सुषमा स्वराज ने कहा, "एनडीए के कार्यकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने साफ़ कहा था कि अगर उन्हें लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया तो विधेयक निष्प्रभावी हो जाएगा. और इसके बाद चर्चा वहीं रुक गई थी."

सुषमा स्वराज ने ये भी कहा कि मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कई बार सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए.

सुषमा ने पूछा कि फिर क्या कारण है कि मौजूदा बिल में प्रधानमंत्री को नहीं लाया गया है.

उन्होने ये भी कहा कि मौजूदा वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी एनडीए के समय में लोकपाल पर बनी स्टैंडिंग कमेटी यानी स्थाई समिति के अध्यक्ष थे जिसमें प्रधानमंत्री को शामिल किए जाने की सिफ़ारिश की गई थी.

इसके जवाब में प्रणब मुखर्जी ने कहा कि उनकी अध्यक्षता वाली स्टैंडिंग कमेटी ने 16 फ़रवरी, 2002 को ही लोकपाल बिल को अपनी सहमति दे दी थी फिर आख़िर एनडीए ने बिल को पास क्यों नहीं करवाया?

विधेयक की ख़ास बातें

संसद में पेश लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री को उनके कार्यकाल के दौरान इसके दायरे से बाहर रखा गया है. लेकिन सभी भूतपूर्व प्रधानमंत्री इसके दायरे में हैं.

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Image caption अन्ना हज़ारे ने सरकारी लोकपाल के विरोध में 16 अगस्त ने आमरण अनशन करने की घोषणा की है

इस विधेयक के अनुसार एक लोकपाल कमेटी होगी जिसके अध्यक्ष वर्तमान या रिटायर्ड जज होंगे.

अध्यक्ष के अलावा इसमें आठ सदस्य होंगे जिसमें से चार अनुभव प्राप्त क़ानूनविद होंगे.

लोकपाल में जांच की समय सीमा सात साल रखी गई है.

लोकपाल की अपनी जांच और वकीलों की टीम होगी लेकिन मुक़दमा चलाने का अधिकार न्यायपालिका के पास ही होगा.

ड्राफ्ट बिल के तहत लोकपाल को किसी भी केंद्रीय मंत्री या ग्रुप (ए) के अधिकारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने का अधिकार होगा.

लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए कुछ महीने पहले एक संयुक्त समिति बनाई गई थी जिसमें सरकार के पांच मंत्री और नागरिक समाज के पांच प्रतिनिधि शामिल थे.

दोनों पक्षों के बीच लंबे विचारविमर्श के बाद भी सहमति नहीं बन पाई थी, ख़ासकर प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लोकपाल बिल के मसौदे को पिछले महीने मंज़ूरी दे दी थी.

नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे अन्ना हज़ारे ने लोकपाल विधेयक को कैबिनेट की मंज़ूरी मिलने के बाद ही विधेयक की कड़ी आलोचना की थी.

इसके ख़िलाफ़ उन्होंने 16 अगस्त से आमरण अनशन करने की घोषणा कर रखी है.

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