'महंगाई के साथ भी हो सकता है विकास'

Image caption वित्त मंत्री ने कहा कि दक्षिण एशिया के सभी देश महंगाई से जूझ रहे हैं

संसद में महंगाई पर विपक्ष की ओर से की गई विशेष चर्चा का जवाब देते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि बढ़ती महंगाई के साथ भी विकास हो सकता है.

उन्होंने कहा कि भारत की विकास दर कभी भी बहुत ज़्यादा नहीं रही, अस्सी के दशक में ये 3.5 फ़ीसदी औऱ 90 के दशक में ये 6 फ़ीसदी के क़रीब रही.

वित्त मंत्री ने कहा, "विकास और मुद्रा स्फीति की दर के बीच कोई विरोधाभास नहीं है, विकास होना चाहिए लेकिन मुद्रा स्फीति की दर को मध्यम स्तर पर सीमित रखते हुए."

उन्होंने कहा कि महंगाई तो मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ने से बढ़ती है.

लेकिन वित्त मंत्री के संबोधन के बाद यशवंत सिन्हा ने कहा कि उनका जवाब संतोषजनक नहीं था क्योंकि इसमें महंगाई कम करने के लिए कोई ठोस कदमों का विवरण नहीं दिया गया.

इसके बाद वाम दलों ने अपना विरोध व्यक्त करते हुए सदन से वॉकआउट कर दिया.

यशवंत सिन्हा ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि सदन में महंगाई पर बार-बार हुई चर्चा के बाद भी आम लोगों पर महंगाई का बोझ कम नहीं हुआ है और सदन इस पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से तत्काल क़दम उठाने की अपील करता है.

विपक्षी दलों के दबाव में सरकार को इस विषय पर नियम 184 के तहत चर्चा को मंज़री देनी पड़ी थी. इस नियम के तहत प्रस्ताव पर चर्चा के बाद मत विभाजन होता है.

मत विभाजन में विपक्ष का प्रस्ताव ध्वनि मत से स्वीकार कर लिया गया.

सरकार की सफ़ाई

पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर मुखर्जी ने कहा कि वर्ष 1998 में कच्चे तेल का दाम 12 डॉलर प्रति बैरल था, वर्ष 2004 में ये 36 डॉलर और आज ये 117 रुपए प्रति बैरल हो गया है. उन्होंने बताया कि भारत 75 फ़ीसदी कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में पेट्रोल और डीज़ल पदार्थों के दाम कम रखना मुश्किल है.

साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि सरकारी तेल कंपनियों को इस व़क्त एक लाख 22 हज़ार करोड़ रुपए का घाटा हो रहा है, इसे ध्यान में रखना ज़रूरी है.

इस मुद्दे पर विपक्ष की ओर नेता शरद यादव से अन-आवश्यक उद्योगों पर कर की दर बढ़ाकर राजस्व इकट्ठा कर उससे तेल कंपनियों को सब्सिडी देने के सुझाव के जवाब में उन्होंने बताया की डीज़ल की ख़पत को देखते हुए ये साफ़ है कि सिर्फ़ कारों के इस्तेमाल पर ही ये तरीका अपनाया जा सकता है.

उनका कहना था कि कारों के ख़पत महज़ 15 फ़ीसदी है और इससे सीमित फायदा ही होगा.

डीज़ल की ख़पत की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में उद्योग जगत 10 फ़ीसदी, रेलवे छे फ़ीसदी, कृषि 12 फ़ीसदी, पावर आठ फ़ीसदी, निजी कारें 15 फ़ीसदी, बसें 12 फ़ीसदी और ट्रक 30 फ़ीसदी डीज़ल इस्तेमाल करते हैं.

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