भूमि अधिग्रहण पर नया पेंतरा

  • 10 अगस्त 2011
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Image caption ज़मीन अधिग्रहण को लेकर विभिन्न जगहों पर प्रदर्शन हो चुके हैं

उत्तर प्रदेश सरकार अब शहरी विकास कानून में संशोधन कर किसानों के इस अधिकार को खत्म करना चाहती है कि वह अधिग्रहण के पांच साल बाद भी खाली पड़ी अपनी जमींन वापस मांग सकें.

भूमि अधिग्रहण के वर्तमान कानून में बदलाव के लिए मायावती सरकार की ओर से विधान सभा में संशोधन का विधेयक पेश किया जा चुका है , जिस पर कल गुरूवार को चर्चा होनी है.

संशोधन के जरिये उत्तर प्रदेश नगर योजना और विकास कानून १९७३ की धारा १७ में संशोधन का प्रस्ताव है.

वर्तमान कानून में राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह नगर विकास अथवा किसी अन्य उद्देश्य के लिए भूमि अधिग्रहण कानून १८९४ के तहत भूमि अधिग्रहण कर सकेगी. लेकिन वर्तमान कानून में भूमि के मालिक को भी यह अधिकार है कि पांच वर्ष के अंदर उस भूमि का निर्धारित उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नही किया जाता तो वह अपनी जमीन वापस मांग सकता है.

मायावती सरकार क़ानून में बदलाव कर भूमि मालिक के उस अधिकार को समाप्त कर रही है कि वह पाँच साल तक बिना इस्तेमाल की गई अपनी ज़मीन वापस मांग सके. यानि सरकार जब तक चाहे उस ज़मीन को खाली रख सकती है.

संवेदनशील मुद्दा

आवास एवं शहरी नियोजन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी की ओर से कहा गया है कि विकास के हित में यह संशोधन प्रस्तावित है.

लेकिन विपक्षी दल इस संशोधन को किसान विरोधी ओर केन्द्रीय भूमि अधिग्रहण क़ानून के खिलाफ़ बता रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के पूर्व राजस्व मंत्री अंबिका चौधरी का कहना है कि विपक्ष विधान सभा में इस संशोधन का पुरजोर विरोध करेगा.

उन्होंने कहा , “ यह संशोधन पूरी तरह से भूमि अधिग्रहण के सिद्धांत के खिलाफ़ है. बल्कि व्यवस्था तो कानून में यहाँ तक है कि जिस उद्देश्य के लिए भूमि ली जा रही है अगर उस उद्देश्य के लिए भूमि का इस्तेमाल नहीं हुआ तो ज़मीन किसान को वापस कर दी जाएगी. मुआवज़े की जो राशि किसान ने ली है वह उसे लौटाने के लिए भी बाध्य न होगा या वह मुआवज़े की राशि उससे वापस नही मांगी जाएगी.”

अंबिका चौधरी का यह भी कहना है कि प्रस्तावित संशोधन सीधे - सीधे केन्द्रीय कानून के खिलाफ है और किसी भी हालत में क़ानून इसकी इजाज़त नही देता

आवास विभाग के प्रमुख सचिव रवीन्द्र सिंह का कहना है कि विकास प्राधिकरणों में इस तरह के बहुत से आवेदन आ रहे हैं जिनमें किसान इस आधार पर अपनी ज़मीनें वापस मांग रहे हैं कि उनकी ज़मीन खाली पडी है.

जबकि विकास प्राधिकरणों का कहना है कि उसने इलाके में सड़क और सीवर डालकर विकास कर दिया है. इसलिए ज़मीन के विकास की परिभाषा को लेकर विवाद होते हैं.

हाल ही में कई ऐसे मामले आए हैं जिनमें राज्य सरकार ने तात्कालिक आवश्यकता दिखाकर किसानों को अपनी बात कहने का मौक़ा दिए बिना ज़मीन अधिग्रहण कर ली. लेकिन सालों साल उस पर काम नही हुआ.

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर कुछ जगह भूमि अधिग्रहण रद्द कर दिया था.

अब मायावती सरकार कानून में ही संशोधन करना चाहती है ताकि इस्तेमाल न करने के आधार पर किसान अपनी ज़मीन वापस न मांग सकें.

प्रदेश विधान सभा में सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी का बहुमत है.

इसलिए विधेयक पारित होने में कोई कठिनाई नहीं दिखाई देती. लेकिन ज़मीन अधिग्रहण का मुद्दा जितना संवेदनशील हो चुका है , उसमे यह संशोधन विधेयक माया सरकार के खिलाफ़ एक बड़ा राजनीतिक मुदा बन सकता है.

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