'अभियोजन और बचाव पक्ष में सांठगांठ'

संजीव भट्ट (फ़ाईल फ़ोटो) इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption संजीव भट्ट गुजरात सरकार और ख़ासकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए सिरदर्द बनते जा रहें हैं.

गुजरात के निलंबित पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट ने कहा है कि राज्य में 2002 में हुए दंगों के मामले में चल रहे मुक़दमों में अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष के बीच बहुत ही ख़तरनाक सांठगांठ है.

संजीव भट्ट ने पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दायर कर ये बातें कही हैं.

बीबीसी के पास उस हलफ़नामे की पूरी कॉपी मौजूद है.

संजीव भट्ट को यह हलफ़नामा दायर करने के सिर्फ़ दो दिन बाद ही सोमवार की देर शाम गुजरात सरकार ने निलंबित कर दिया था.

राज्य सरकार ने उन्हें बिना छुट्टी के डयूटी से ग़ायब रहने और सरकारी मशीनरी के ग़लत इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए निलंबित किया है, लेकिन संजीव भट्ट ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा कि राज्य सरकार नहीं चाहती कि कोई भी अधिकारी या आम आदमी सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए.

अदालत में दायर किए गए हलफ़नामे में संजीव भट्ट ने दावा किया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित विशेष जांच दल यानि एसआईटी की रिपोर्ट राज्य के अधिकारियों को भेजी जाती थीं.

राज्य के अधिकारी उन रिपोर्टों को अभियुक्त के वकीलों और दूसरे राजनेताओं को भेज देते थे.

हलफ़नामा

संजीव भट्ट ने अपने 19 पन्नों के हलफ़नामे के साथ लगभग तीन सौ पन्नों के संलग्नक भी अदालत के सामने पेश किए हैं.

Image caption बीबीसी के पास हलफ़नामा की कॉपी मौजूद है.

भट्ट ने दावा किया है कि 2002 दंगों के अलावा सोहराबुद्दीन और इशरत जहां मुठभेड़ मामले में भी अभियोजन और बचाव पक्ष में सीधी सांठगांठ है.

संजीव भट्ट ने कहा है कि एक पुलिस अधिकारी के नाते उनकी ये ज़िम्मेदारी है कि किसी भी अपराध को रोकने के लिए सही जानकारी हासिल की जाए और उन्हें उचित अधिकारियों के सामने लाया जाए.

भट्ट ने अपने हलफ़नामें मे कहा है कि उन्हें सितंबर 2009 से राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता तुषार मेहता के ई-मेल तक पहुंच हासिल थी.

उनके अनुसार उनके और मेहता के ई-मेल के आदान प्रदान से ये साफ़ पता चलता है कि गुजरात में वरिष्ठ अधिकारियों और राजनेताओं के बीच सांठगांठ है ताकि दंगों और दूसरे जघन्य अपराध के दोषियों को बचाया जा सके.

भट्ट ने ये भी कहा कि उन्होंने अपने मित्र तुषार मेहता को कई बार समझाने की कोशिश की थी कि वह इस ग़ैर क़ानूनी काम से ख़ुद को अलग कर लें और अदालत को इसकी जानकारी दें, लेकिन वो नहीं माने और बाद में उन्होंने अपना ईं-मेल बदल डाला जिससे वो संवेदनशील रिपोर्टों का आदान-प्रदान करते थे.

भट्ट के अनुसार उन्होंने एसआईटी और कोर्ट के ज़रिए नियुक्त किए गए एमाइकस क्यूरी (अदालत की मदद के लिए नियुक्त किए जाने वाला वकील) के सामने भी ये बातें रखीं लेकिन किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया, इसीलिए उन्हें आख़िरकार मजबूर होकर सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दायर करना पड़ा.

अपने हलफ़नामें में संजीव भट्ट ने कई चौंकाने वाले तथ्य पेश किए हैं.

पिछले कुछ महीनों से संजीव भट्ट और नरेंद्र मोदी के बीच टकराव चल रहा है.

संजीव भट्ट ने इसी साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दायर कर कहा था कि गुजरात में गोधरा कांड के बाद 27 फ़रवरी,2002 की शाम को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की बैठक हुई थी जिसमें मोदी ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों से कहा था कि मुसलमानों को सबक़ सिखाने के लिए हिंदुओं को अपना ग़ुस्सा उतारने का मौक़ा दिया जाना चाहिए.

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