एक और आईपीएस मोदी सरकार के ख़िलाफ़

अमित शाह और नरेंद्र मोदी (फ़ाईल फ़ोटो)
Image caption अमित शाह को फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले में सीबीआई ने गिरफ़्तार किया था

गुजरात के शीर्ष पुलिस अधिकारियों और नरेंद्र मोदी सरकार के बीच लड़ाई बड़ी होती जा रही है.

अब एक तीसरे आईपीएस अधिकारी ने नरेंद्र मोदी के एक क़रीबी अधिकारी के ख़िलाफ़ शिकायतें की हैं और कहा है कि उन्होंने तुलसी प्रजापति 'फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले' का षडयंत्र रचा.

ये शिकायत उप महानिरीक्षक (डीआईजी) रजनीश राय ने मुख्यमंत्री मोदी के क़रीबी सहयोगी पूर्व पुलिस महानिदेशक पीसी पांडे के ख़िलाफ़ की है. वैसे उन्होंने अपनी शिकायत में मोदी के एक और क़रीबी सहयोगी ओपी माथुर का भी नाम लिया है.

इससे पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट ने नरेंद्र मोदी सरकार के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दायर किया था और इसके बाद सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया है.

ख़बरों के अनुसार गुजरात में डीआईजी रहे राहुल शर्मा के ख़िलाफ़ भी सरकार ने एक आरोप पत्र जारी कर दिया था. उन्होंने गुजरात दंगों की जाँच के लिए वर्ष 2004 में बने नानावती आयोग और वर्ष 2010 में सुप्रीम कोर्ट की बनाई हुए विशेष जांच दल को गुजरात दंगों से जुड़ी कई अहम सूचनाएं व दस्तावेज़ सौंपें थे.

गंभीर आरोप

रजनीश राय ने गुरूवार को कैट यानी केंद्रीय प्रशासनिक ट्राइब्यूनल के समक्ष एक हलफ़नामा दायर कर अपनी शिकायत दर्ज कराई है.

उन्होंने पूर्व गृहराज्य मंत्री अमित शाह और पीसी पांडेय पर सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी मुठभेड़ के गवाह समझे जाने वाले तुलसी प्रजापति के मुठभेड़ की आपराधिक साज़िश रचने और बाद में सुबूत मिटाने का आरोप लगाया है.

Image caption शोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी को क्राइम ब्रांच ने मार दिया था

रजनीश राय सीआईडी ब्रांच के एक अधिकारी की हैसियत से सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की तफ़्तीश कर रहे थे और इस मामले में उन्होंने तीन आईपीएस अधिकारी डीजी वंज़ारा, राजुकमार पांडियन और दिनेश एमएन को गिरफ़्तार किया था.

रजनीश राय ने अपने हलफ़नामे में कहा है कि तत्कालीन अतिरिक्त डीजीपी ओपी माथुर सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले की जांच रिपोर्ट को राजस्थान के भाजपा नेताओं से बांटना चाहते थे लेकिन उन्होंने इसका लिखित विरोध किया था.

उनका आरोप है कि इसके बाद राज्य सरकार ने फ़ौरन ही उनका तबादला कर दिया था और उनकी जगह गीता जौहरी को सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की जांच की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई थी.

रजनीश राय का कहना है कि इसके बाद से ही राज्य सरकार ख़ास तौर पर तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह और तत्काली डीजीपी पीसी पांडेए से उनके रिश्ते ख़राब हो गए थे.

डीआईजी राय का कहना है कि उन्हें शक होने लगा था कि तुलसी प्रजापति, सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के गवाह हैं और इसके लिए वो तुलसी प्रजापति का बयान दर्ज करना चाहते थे.

तुलसी प्रजापति उस समय राजस्थान की एक जेल में बंद थे.

राय का कहना है कि तुलसी प्रजापति की पूछताछ के लिए इजाज़त मांगी थी लेकिन डीजीपी पांडेए और अमित शाह ने उन्हें इजाज़त नहीं दी.

कुछ ही दिन बाद, दिसंबर, 2006 को गुजरात पुलिस ने एक दूसरे मामले में तुलसी प्रजापति को रिमांड पर लिया और उन्हें राजस्थान से गुजरात लाया गया. लौटते समय एक कथित मुठभेड़ में प्रजापति मारे गए.

सोहराबुद्दीन शेख़ के भाई रोबाबुद्दीन शेख़ की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2010 में सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की जांच सीबीआई के हवाले कर दी थी.

नवंबर 2005 में सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी कौसर बी को गुजरात पुलिस के क्राईम ब्रांच ने एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार दिया था.

इस मामले में सीबीआई ने पूर्व गृहराज्यमंत्री अमित शाह को गिरफ़्तार किया था. अमित शाह इस समय ज़मानत पर हैं लेकिन कोर्ट के आदेशानुसार वो गुजरात नहीं जा सकते.

अमित शाह के अलावा तीन आईपीएस और 16 दूसरे पुलिस अधिकारियों पर इस मामले में मुक़दमा चल रहा है.

डीआईजी रजनीश राय ने यह भी आरोप लगाया है कि तत्कालीन डीजीपी पीसी पांडेए ने वर्ष 2010-11 के उनके एसीआर यानी वार्षिक गोपनीए रिपोर्ट में विपरीत टिप्पणियाँ कीं जिससे कि उनका प्रोमोशन रोका जा सके.

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