राहुल शर्मा के ख़िलाफ़ आरोप पत्र

नरेंद्र मोदी
Image caption मोदी सरकार ने कुछ ही दिन पहले एक और पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट को निलंबित किया है

गुजरात सरकार के ख़िलाफ़ जाने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डीआईजी राहुल शर्मा को सरकार ने आरोप पत्र दे दिया है.

गुजरात सरकार के प्रवक्ता जय नारायण व्यास ने शनिवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि राहुल शर्मा ने सेवा शर्तों का उल्लंघन किया है.

व्यास का कहना था, ''राहुल शर्मा को 27 जनवरी, 2011 को कारण बताओ नोटिस दिया गया था. उसके बाद उन्होंने रिकॉर्ड देखने को कहा था जिसके लिए उनको समय दिया गया था. लेकिन उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया के तहत काम करने के बजाए उसमें रोड़े डालने का प्रयत्न किया. इसलिए सेवा शर्तों का उल्लंघन करने के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार उन्हें चार्जशीट दिया गया है.''

राहुल शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने राज्य सरकार को बिना बताए 2002 दंगों से जुड़े दस्तावेज़ नानावटी आयोग और विशेष जांच दल यानि एसआईटी को सौंपे थे.

नानावटी आयोग और सुप्रीम कोर्ट के ज़रिए गठित एसआईटी गुजरात के 2002 दंगों की जांच कर रहें हैं.

दूसरी ओर राहुल शर्मा के वकील मुकुल सिन्हा ने दो दिन पहले बीबीसी से हुई बातचीत में कहा था कि राहुल शर्मा ने क़ानूनी रुप से हासिल किए गए एक साक्ष्य को जाँच आयोग को सौंपा था क्योंकि आयोग के सामने सच बोलना एक क़ानूनी ज़रुरत थी.

राहुल शर्मा के वकील का कहना था कि आयोग के सामने सुनवाई के सात साल बाद सरकार उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई इसलिए कर रही है क्योंकि वह इस नरोडा पाटिया और गुलबर्ग सोसायटी के मामलों में साक्ष्य को कमज़ोर करना चाहती है और ये साबित करना चाहती है कि साक्ष्य प्रामाणिक नहीं हैं.

पहले ख़बरें आईं थी कि राहुल शर्मा को आरोप पत्र दे दिया गया है लेकिन शुक्रवार को सरकार ने इसका खंडन किया था. अब शनिवार को सरकार ने इसकी पुष्टि की है.

फ़ोन रिकॉर्ड की सीडी

राहुल शर्मा दंगों के समय कंट्रोल रूम में तैनात थे और उन्हें नरोडा पाटिया मामले की जाँच का काम सौंपा गया था.

जाँच अधिकारी की हैसियत से उन्होंने क्राइम ब्रांच से उस समय किए गए तमाम फ़ोन कॉल के रिकॉर्ड मांगे थे और फिर उसे अपने कंप्यूटर पर डालने के बाद रिकॉर्ड क्राइम ब्रांच को लौटा दिए थे.

मुकुल सिन्हा का कहना है कि जब आयोग और एसआईटी ने उन्हें साक्ष्य के लिए बुलाया तो उन्होंने कॉल रिकॉर्ड की सीडी बनाकर दंगों की जांच कर रहे नानावटी आयोग और एसआईटी को दे दी थी.

उनका कहना है कि इसमें 25 फ़रवरी, 2002 से तीन मार्च, 2002 तक अहमदाबाद में किए गए फ़ोन के सारे रिकॉर्ड हैं. मसलन किसने किसे फ़ोन किया और उनके बीच कितनी देर बातचीत हुई.

एक सवाल के जवाब में राहुल शर्मा के वकील ने कहा, "सात साल बाद सरकार ये मामला इसलिए उठा रही है क्योंकि नरोडा पाटिया और गुलबर्ग सोसायटी मालमों की जाँच अंतिम चरण में हैं और इन फ़ोन रिकॉर्ड की इस जाँच में अहम भूमिका है."

उनका कहना है, "सरकार इस राहुल शर्मा के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाखिल करके इस मामले को कमज़ोर करना चाहती है और इसीलिए ये साबित करना चाहती है कि जो साक्ष्य राहुल शर्मा ने दिए वो प्रामाणिक नहीं हैं."

हाई कोर्ट से राहत नहीं

राज्य सरकार के अनुसार राहुल शर्मा पर सरकार ने आरोप लगाया है कि उन्होंने ग़ैर-क़ानूनी तरीक़ से उस सीडी की एक कॉपी अपने पास भी रख ली थी.

दरअसल मामला ये है कि राज्य सरकार ने आधिकारिक तौर पर ये कहा था कि असली सीडी गुमशुदा है लेकिन राहुल शर्मा ने वही सीडी आयोग को देकर राज्य सरकार के आधिकारिक स्थिति के विपरीत काम किया था.

सरकार ने उन्हें जनवरी, 2011 में कारण बताओ नोटिस दिया था लेकिन राहुल शर्मा ने उसका कोई जवाब नहीं दिया था.

राज्य सरकार का कहना है कि उन्होंने प्रारंभिक जांच के बाद ही राहुल शर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी किया था, लेकिन राहुल शर्मा सरकार की इस दलील से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत राज्य सरकार से प्रारंभिक जांच रिपोर्ट की मांग की थी.

गुजरात के गृह मंत्रालय ने उनकी मांग ठुकरा दी थी जिसके बाद राहुल शर्मा ने अहमदाबाद हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. हालांकि सरकार का कहना है कि उन्होंने राहुल शर्मा को काग़ज़ात दिखाने के लिए समय दिया गया था.

हाई कोर्ट ने उन्हें ये कहते हुए कोई राहत देने से इनकार कर दिया कि ये उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है.

हाईकोर्ट ने उनसे कहा था कि सूचना के अधिकार के तहत पहले विभाग में ही अपील करनी चाहिए और उनकी अंतिम अपील ठुकरा दिए जाने के बाद ही वो हाईकोर्ट आएं.

संबंधित समाचार