किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं अन्ना

  • 19 अगस्त 2011
अन्ना हज़ारे समर्थक इमेज कॉपीरइट AP

इसी साल 23 फ़रवरी को भारत के सभी प्रमुख ट्रेड यूनियन संगठनों ने राष्ट्रीय राजधानी में एक बड़ी रैली आयोजित की. महँगाई लोगों के जीवन को बहुत ही बुरी तरह प्रभावित कर रही है.

साथ ही कर्मचारियों में गंभीर चिंताओं के बावजूद अधिकारी वर्ग की इस सोच में शायद ही कोई बदलाव आया है कि श्रम क्षेत्र में काफ़ी 'सुधार' की ज़रूरत है या दूसरे शब्दों में कहें तो कंपनियों को अपनी मर्ज़ी से लोगों को रखने और निकाल देने की छूट होनी चाहिए.

ट्रेड यूनियनों की इस रैली के ज़रिए दुनिया को दरअसल ये दिखाने की कोशिश की गई थी कि चीज़ों को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी हो सकता है.

इस तरीक़े से ये कहने की कोशिश हुई कि अगर कामगार वर्ग का जीवन सुधारा जाए तो आर्थिक मंदी से निबटने की ये एक सही रणनीति हो सकती है.

ये एक वैकल्पिक रास्ता था जिसके प्रति दिल्ली और दूसरी जगहों पर स्थित कई समाचार चैनलों का रवैया उदासीन ही रहा.

अगले दिन अख़बारों का कवरेज अधिकतर इसी बात पर रहा कि किस तरह रैली की वजह से व्यापक पैमाने पर यातायात प्रभावित हुआ.

देश के सबसे बड़े और दिल्ली के प्रमुख अँगरेज़ी समाचार पत्र ने पूरे पन्ने भर का कवरेज तो किया और हेडलाइन थी- 'शहर लाल लहर की चपेट में, केंद्रीय दिल्ली में ट्रैफ़िक रुका'.

उस दिन लोगों की राय का 'शायद' प्रतिनिधित्व करने वाली तीन प्रतिक्रियाएँ छापी गईं. उनमें से ट्रैफ़िक की वजह से परेशान रहे एक व्यक्ति ने कहा, "अगर मुझे ये पता चल जाए कि इस रैली का आयोजन किस पार्टी ने करवाया था तो मैं कभी भी उसके लिए वोट नहीं करूँगा." बाक़ी लोगों ने ज़रूरी मीटिंग में नहीं पहुँच पाने की और ज़रूरी काम छूट जाने की शिकायत की.

दूसरा जनसैलाब

इसके बाद 16 अगस्त को दिल्ली में सड़कों पर एक और बड़ा जनसैलाब उमड़ा.

ये लोग एक 74 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता को अनशन करने देने के बजाए गिरफ़्तार कर लेने के स्थानीय पुलिस के फ़ैसले का विरोध कर रहे थे.

अन्ना हज़ारे इससे पहले भी दिल्ली में एक प्रमुख जगह पर भूख हड़ताल पर बैठे थे जिससे सरकार सार्वजनिक जीवन में शुचिता लाने के लिए एक क़ानून लाए और इससे जुड़ा पद बनाए.

चार दिन तक वही ख़बर समाचार चैनलों और अख़बारों में छाई रही. वो ख़त्म तब हुआ जब सरकार के साथ इस बात पर सहमति बन गई कि हज़ारे जिन लोगों का नाम देंगे वे लोग मसौदा बनाने वाली समिति में शामिल किए जाएँगे.

अनशन के इस तरह से ख़त्म होने को सरकार का 'आत्मसमर्पण' घोषित कर दिया गया.

सरकार के प्रतिनिधियों और हज़ारे के दल के बीच बातचीत में हर चरण पर गतिरोध बना. साथ ही हज़ारे के दल ने इन व्यापक चिंताओं को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया कि जनलोकपाल का उनका प्रस्ताव सत्ता के विभाजन पर गंभीर चोट करता है.

इसका दायरा काफ़ी बड़ा था जिसमें न्यायपालिका और राजनीतिक क्षेत्र के सर्वोच्च लोग भी लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में होंगे. इन दोनों मामलों को लेकर जो भी हिचक थी उसे दूर करने या सुनने में भी इन लोगों ने ज़्यादा धैर्य नहीं दिखाया.

सरकार लगातार इन बातों को लोकपाल विधेयक में लाने से इनकार करती रही और उसी के बाद हज़ारे ने विरोध स्वरूप 16 अगस्त से अनशन फिर से शुरू करने की घोषणा की.

मीडिया का रुख़

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption अन्ना हज़ारे का आंदोलन मीडिया में भी छाया हुआ है

इस धमकी का सरकार ने अनिर्णय और घबराहट से भरे नौकरशाही रवैये से जवाब दिया जिसका नतीजा अन्ना की हिरासत, गिरफ़्तारी के रूप में आया मगर बाद में सरकार ने ख़ुद को उससे दूर करने की कोशिश की.

गिरफ़्तारी के कुछ ही देर के भीतर दिल्ली के समाचार चैनलों ने शहर भर में फैले विरोध प्रदर्शन की बेहिसाब कवरेज शुरू कर दी. लोग जब सड़कों पर उतरे तो शहर के कई हिस्सों में यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ मगर मीडिया को उसकी परवाह कहाँ थी.

देश के सबसे बड़े अँगरेज़ी अख़बार ने अगले दिन 17 अगस्त को हेडलाइन दी- 'जुलूस निकाल रहे लोगों ने शहर में जान फूँकी'.

दूसरी जगह एक शीर्षक था- 'शहर में ज़बरदस्त जाम लगा मगर शिकायत शायद ही किसी को'. अख़बार ने काफ़ी मेहनत करके उन लोगों के बारे में बताया जो शिकायत करने वाले आम लोगों को मामला समझाबुझाकर शांत कराने में लगे थे.

निश्चित तौर पर मीडिया ने हज़ारे के उस आंदोलन पर अपनी मुहर लगा दी थी, उसे वो वैधता दे दी थी जो ट्रे़ड यूनियन के आंदोलन लायक़ नहीं लगी थी. ऐसा क्यों हुआ इसमें कोई बड़ा रहस्य नहीं है, कामगारों में वो आर्थिक ताक़त नहीं है जो मीडिया में विज्ञापन देने वालों की रुचि जगा सके.

और फिर जब विज्ञापन देने वाले ही बादशाह हों तो कामगार लोग सिर्फ़ शांत उपभोक्ता हो सकते हैं समाचार का एजेंडा तय करने वाले सक्रिय लोग नहीं.

हज़ारे की गिरफ़्तारी का विरोध करने वाले लोग कौन थे उनकी सही तस्वीर अभी तक साफ़ नहीं हुई है.

वहाँ से आने वालों की बातों से निष्कर्ष निकाला जाए तो लगता है कि वहाँ बड़ी संख्या में प्रोफ़ेशनल लोग, काफ़ी तादाद में छात्र और ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता मौजूद थे जिनका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लगता है.

संघ इस सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए परेशानी खड़ी करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ेगा. जहाँ तक बाक़ी लोगों की बात है तो वे हज़ारे के समर्थन में निकले थे. वे निश्चित ही उस समूह से हैं जिनकी क्रय क्षमता या आर्थिक ताक़त औसत यूनियन मेंबर से कहीं ज़्यादा है.

मध्य वर्ग का रवैया

इमेज कॉपीरइट Getty
Image caption हज़ारे समर्थकों में बड़ी तादाद में प्रोफ़ेशनल और छात्र शामिल रहे

भारत के ट्रेड यूनियनों ने कामगारों से जुड़े मौजूदा क़ानून बदलने के लिए एक अभियान चलाया है. उन्हें मीडिया से ज़्यादा सहानुभूति नहीं मिली.

हज़ारे का दल एक नया क़ानून चाहता है जो संसदीय लोकतंत्र के मौजूदा स्तंभों को सिद्धांतो पर बनी एक संस्था के तहत ले आएगा और ये भी नहीं पता है कि वह बहुमत का प्रतिनिधित्व करता है या नहीं.

एजेंडा साफ़ है इसलिए उसे समाचारों के एजेंडे पर भी जगह मिल गई है. वैसे इसके लिए जो क़ानून बना है वह संविधान के बाक़ी तत्वों के आपसी संघर्ष की कहानी पहले से ही बयान कर रहा है.

आजकल लोगों की जागरूकता का फ़ोकस बदलता रहता है और भ्रष्टाचार हज़ारे के अभियान में शामिल अधिकतर लोगों की बातचीत में भ्रष्टाचार शब्द आता रहता है.

ये एक ऐसा शब्द है जिसका दायरा काफ़ी है और मध्य वर्ग के मन में इस शब्द ने घर कर लिया है. 2008 से आई आर्थिक मंदी आधिकारिक आँकड़ों में तो दिखाई नहीं देती मगर ये भारत में लोगों के जीवन का हिस्सा है.

आज की तारीख़ में महँगाई पिछले दो दशकों से भी कहीं बड़ा ख़तरा बन चुका है. युवाओं से भरे इस देश में उनकी महत्त्वाकाँक्षा तनाव के घेरे में है और दो साल पहले उन्हें जो सुनहरे ख़्वाब मीडिया के ज़रिए दिखे थे वे सब आज बकवास दिख रहे हैं.

एक तरफ़ दुनिया की अर्थव्यवस्था दूसरी बार मंदी की ओर बढ़ती दिख रही है और ऐसे में दुनिया के मंच पर भारत के एक बड़ी ताक़त के रूप में उभरने की संभावना को भी चोट पहुँची है.

राजनीतिक भ्रष्टाचार एक ऐसा सुलभ लक्ष्य है जिसे सभी की चिंताओं का निशाना बनाया जा सकता है. ऐसे में एक सर्वोच्च संस्था बनाने की त्वरित आवश्यकता उच्च वर्ग के उस दृढ़ विश्वास के अनुरूप ही है कि सभी का प्रतिनिधित्व करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था विफल हो चुकी है.

पर अगर हज़ारे और उनका समूह भारतीय लोकतंत्र की चिंताओं के एकमात्र हल के तौर पर जो चीज़ दिखा रहा है उसके जन्म में ही उसकी विफलता का क़िस्सा छिपा हुआ है तो जब ये सच्चाई नकारी नहीं जा सकेगी तब उन लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी.

ये पूछा जाना चाहिए कि क्या तब निशाना 'भ्रष्टाचार' की जगह सीधे तौर पर 'राजनीति' को बनाया जाएगा. साथ ही क्या तब प्रतिनिधि करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था भी जागरूक हो रहे भारतीय मध्य वर्ग की भेंट चढ़ जाएगी.

संबंधित समाचार