अन्ना का इंतज़ार, गांधीवादी प्रदर्शन और कैमरे का स्वागत...

  • 19 अगस्त 2011
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शुक्रवार की सुबह जब मैं राजधानी दिल्ली की तिहाड़ जेल के बाहर पहुँची तो एक गांधीवादी-शांतिप्रिय प्रदर्शन से कुछ अलग सा ही माहौल दिखा.

ढोल-नगाड़े, थालियां पीटने, तालियों और सीटियों की गूंज के बीच आम लोगों की आवाज़ कुछ दबी सी लगीं.

मैं घर से निकली थी तो वहां कितनी संख्या में लोग जमा हुए हैं, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल था. टीवी चैनलों के क्रेन वाले कैमरे जिस तरह का हुजूम दिखा रहे थे, वहां पहुँच कर उस छवि ने थोड़ा मायूस किया.

फिर जैसे-जैसे दिन बढ़ा भीड़ भी बढ़ी. लेकिन उसमें कई ऐसे लोग दिखे जो आसपास के इलाकों में रहते हैं और बीवी-बच्चों समेत इस कार्यक्रम को देखने आ गए.

एक महिला ने कहा कि 'मेला लगा है, भेड़चाल को ही देखने आए हैं.'

वहां बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों के छात्र दिखे, जो यूनिफॉर्म बदले बग़ैर ही अपने स्कूल से भाग आए थे.

वो नाचते-गाते और 'जय माता दी' जैसे नारे लगाते रहे. इनमें से कई अपनी कमीज़ उतारकर, सीने पर 'आई लव अन्ना' (मैं अन्ना से प्यार करता हूं), लिखा हुए भी दिखा रहे थे.

किसी भी मीडियाकर्मी को देखते ही ये लोग हल्ला करते और कैमरा के सामने आने का हर मुमकिन प्रयास भी करते.

कुछ इनसे उम्रदराज़ लोग भी दिखे, जो नाचने-गाने, सीना पीटने के बाद पेड़ों और बिजली के खम्बों पर चढ़ गए.

अन्ना के इंतज़ार में

अन्ना हज़ारे के आने का इंतज़ार जैसे-जैसे खिंचता गया, लोगों का उत्साह भी बढ़ता गया. उसी दौरान अन्ना के सहयोगी अरविन्द केजरीवाल ये घोषणा करने आए कि अन्ना को आने में कुछ समय लगेगा और तब तक सब लोग भजन गाएं.

दो बार उन्होंने 'रघुपति राघव राजा राम' गाना शुरू भी किया, लेकिन लोग जुड़े नहीं. फिर बिजली के खम्बों से लोगों को उतरने की अपील की गई, जो किसी ने सुनी नहीं.

फिर किसी ने लाउडस्पीकर पर नारे लगाए तब आखिरकार लोगों ने 'वन्दे मातरम' कह कर साथ दिया.

अन्ना को ग्यारह बजे तिहाड़ जेल से बाहर आना था, लेकिन वो पौना घंटा देर से आए. उस बीच कई बार अचानक लोगों के चिल्लाने और तालियां बजाने की आवाज़ आई.

हर बार लगा जैसे अन्ना के स्वागत में ऐसा हो रहा हो, लेकिन कुछ देर में समझ आया कि दरअसल क्रेन का कैमरा जिस तरफ़ अपना मुंह घुमा रहा है, उसी के स्वागत में ये हल्ला हो रहा है.

आखिरकार अन्ना बाहर आए. उनके समर्थन में जुटी ऐसी जुनूनी भीड़ को देखकर उन्हें कैसा लगा ये तो वो ही बेहतर जानते हैं.

लेकिन उनके ट्रक के पीछे चल पड़ी गाड़ियों की छत, बोनेट और खिड़कियों पर बैठे युवाओं को देखकर मुझे लगा मानो ये किसी गंभीर मुद्दे को उठाने का प्रयास नहीं बल्कि किसी जश्न में शामिल होने जा रहे लोगों की भीड़ हो.

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