क्या एक से हैं जेपी और अन्ना के आंदोलन?

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बिहार में अन्ना हज़ारे के आंदोलन को लोकनायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले वर्ष 1974 के आंदोलन से जोड़कर देखना बहस का विषय बन गया है.

इसमें दो राय नहीं कि जेपी आन्दोलन के केंद्र में रहे इस प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में भ्रष्टाचार विरोधी जन लोकपाल बिल को ज़ोरदार समर्थन मिल रहा है लेकिन ये सवाल भी उठ रहा है कि गांधी और जेपी से अन्ना की तुलना करना, और जन लोकपाल की सीमित मांग वाले आंदोलन को गांधी और जेपी से जुड़े जनांदोलनों की श्रेणी में रखना सही है या नहीं?

अन्ना के अनशन को गांधी के सत्याग्रह जैसा बताए जाने पर भी यहाँ आपत्ति ज़ाहिर की जा रही है. ख़ासकर गांधीवादियों को ऐसी तुलना क़तई पसंद नहीं है.

टीस

बिहार के जाने माने गांधीवादी विचारक रज़ी अहमद का कहना है, "भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जनाक्रोश है और वो सही भी है. लेकिन अन्ना हज़ारे के इर्द-गिर्द जो बड़े-बड़े ग़ैर सरकारी संगठन (एनजीओ) चलाने वाले और कार्पोरेट घराने के प्रतिनिधि सक्रिय हैं, वे अपने फायदे के लिए लगता है अन्ना का इस्तेमाल कर रहे हैं. और ये जो पैसे वाले, खाते-पीते लोगों की मीडिया प्रचारित शहरी भीड़ को वर्ष 74 जैसा व्यापक जन उभार वाला आंदोलन बताया जा रहा है, वो भी सही नहीं है."

रज़ी अहमद से मिलती-जुलती राय बिहार के उन लोगों की भी है जो जन लोकपाल विधेयक मसौदे को हूबहू क़ानूनी शक्ल जल्दी दिये जाने की ज़िद में जान दे देने जैसी धमकी के ख़िलाफ़ हैं.

लेकिन इस तरह की तमाम असहमतियों या आपत्तियों को नकारते हुए जो लोग अन्ना हज़ारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में ज़ोर-शोर से शामिल हो रहे हैं, उनकी तादाद बिहार में भी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है.

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Image caption जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से तत्कालीन इंदिरा सरकार हिल गई थी

लगता है भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार से ही नहीं, नेताओं और अधिकारियों से भी आर-पार की लड़ाई लड़ लेने के मूड में आ चुके लोगों को अन्ना और उनकी टीम ने लोकपाल के बहाने एक माकूल मौक़ा उपलब्ध करा दिया है.

शायद इसलिए बिहारवासियों की भी आँखें अब ना सिर्फ भ्रष्टाचार पर, बल्कि केंद्र और राज्य की क़ानून बनाने वाली सभाओं पर भी ग़ुस्से से लाल हो रही हैं.

बिहार आंदोलनों की भूमि रही है इसलिए यहां लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लड़े गये वर्ष 74 के सफल आंदोलन के विफल नतीजों की पीड़ा रह-रह कर टीसने लगती है.

ज़्यादातर लोग यही मानते हैं कि देश की सत्ता को पलट देने वाले उस आंदोलन के बाद भी हमारी संसद या विधानसभाओं का रंग-ढंग 'बहुजन हिताय' की बजाए 'स्वान्तः सुखाय'वाला ही बना रहा.

'वैसा ही हश्र न हो'

यहां जेपी आंदोलन के दिनों में नुक्कड़ों पर जब पटना के बहुचर्चित कवि सत्यनारायण शब्द-गर्जना करते थे तो सुनने वालों का जोश-ओ-जुनून आसमान छूने लगता था.

ज़ुल्म का चक्कर और तबाही कितने दिन हम पर तुम पर सर्द सियाही कितने दिन! ये गोली, बन्दूक, सिपाही कितने दिन सच कहने की कहो मनाही कितने दिन,कितने दिन!

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Image caption अन्ना हज़ारे के आंदोलन में उमड़ी भीड़ ने लोगों को 74 के आंदोलन की याद दिला दी है

अपनी ऐसी ही ओजस्वी कविताओं से जेपी को भी प्रभावित कर देने वाले कवि सत्यनारायण आज अन्ना हज़ारे के आंदोलन में बिहार के उसी 36 साल पुराने जेपी आंदोलन की झलक पाते हैं.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में कहने लगे, "ये जो अन्ना जी का आंदोलन शुरू हुआ है इससे जेपी की याद आ गई. उस समय भी जनसैलाब उमड़ा था. चार मुद्दे थे उस आंदोलन के - बेरोज़गारी, बदहाल शिक्षा, महंगाई और भ्रष्टाचार. उसी आंदोलन से निकले नेताओं ने बाद में सत्ताधारी बनकर बिहार की जो दुर्गति की वो सबके सामने है."

सत्यनारायण की नज़र में "देश को अन्ना जैसा विश्वसनीय सूत्रधार बहुत दिनों के बाद मिला है. सिर्फ एक ही डर है कि जेपी आंदोलन का जैसा हश्र हुआ उसी तरह फिर केवल सत्ता परिवर्तन को लालायित कोई राजनीतिक दल इस बार भी जनांदोलन को हाईजैक ना कर ले, हड़प ना ले."

फिर जेपी की याद में और अन्ना हज़ारे के समर्थन में सत्यनारायण गुनगुनाने लगे -

'एक बूढा आदमी है मुल्क में, या यूं कहो इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है'

ज़ाहिर है कि जिस तरह बिहार के तमाम छोटे-बड़े शहरों या क़स्बों से लेकर कहीं-कहीं गांवों में भी अन्ना समर्थन की लहरें उठने लगी हैं उनमें वर्ष 74 के आंदोलन जैसा ही जन उभार है.

इसलिए कुछ कारणों से जो अन्ना और उनकी टीम के ख़िलाफ़ मुखर थे वे भी अब देश भर में अन्ना समर्थक जन सैलाब से प्रभावित होकर आम जन भावना के साथ दिखने लगे हैं.

वैसे, यहाँ सत्ताधारी गठबंधन के दोनों दलों, जनता दल यूनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी, ने ख़ुद को अन्ना हज़ारे का प्रबल समर्थक घोषित करने जैसा प्रचार ख़ूब कराया. लेकिन बिहार में इस शासन के दौरान भी फले-फूले भ्रष्टाचार ने उस प्रचार की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है.

राजनीति के कथित भ्रष्टाचार पोषक चरित्र ने जो 'भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा नहीं' जैसा भ्रमजाल रच दिया है वो आज अन्ना आंदोलन की चोट से तहस-नहस होता हुआ दिख रहा है.

हालांकि नस-नस में समाए इस रोग से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिल पाने की पीड़ा महसूस करके ही दुष्यंत ने अपनी एक ग़ज़ल के ज़रिये कहा था -

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीक-ए-जुर्म हैं आदमी या तो ज़मानत पे रिहा है,या फ़रार

जो भी हो जेपी आन्दोलन की भूमि बिहार ने 'बंद करो ये भ्रष्टाचार' के देशव्यापी नारे को अपनी वही वर्ष 74 वाली ताक़त दे दी है.

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